सुजानखेड़ी..में बगिया

सुजानखेड़ी..में बगिया

सोमवार, 31 मार्च 2014

हथछोया:अतीत मंथन © सुनील सत्यम

पुराना इतिहास है हथछोया का.इसका इतिहास जानने के लिए हमें इतिहास के धूल-धूसरित पन्नो को खंगालना होगा,जो बहुत श्रम साध्य और शौध का विषय है.अपने इतिहास ज्ञान,इतिहास-लेखन की तकनीकियों और जनश्रुतियों का सहारा लेकर भी हम हथछोया के अतीत पर दृष्टिपात कर सकते हैं.

हथछोया का शाब्दिक अर्थ:
हथछोया मूलतः दो शब्दों से मिलकर बना है-
हद (सीमा,अति)+चोया (जल स्तर). यह इस शब्द का संधिविच्छेद न होकर स्थानीय भाषा के दो शब्दों का एक साथ मिलकर प्रयोग है.
अर्थात ऐसा क्षेत्र जहाँ जल स्तर बहुत ऊपर ही उपलब्ध हो. गाँव की वर्तमान बस्ती के स्थान पर विशाल भौगोलिक क्षेत्र पर तालाब होने के कारण भूमिगत जल स्तर (चोया) की हद भूसतह के एकदम समीपस्थ थी.इसी कारण हद्चोया शब्द की उत्पत्ति हुई जो कालांतर में बिगड़कर हथछोया बन गया.
वास्तव में हथछोया के अधिवास का अध्ययन कई पहलुओं पर हमारा ध्यान केन्द्रित कर देता है, जो काफी मजेदार है.
हथछोया के बस्ती प्रारूप और प्रकार का विश्लेषण करे तो हम आसानी से समझ सकते है कि इस गाँव का इतिहास 160-200 वर्षो से अधिक पुराना नहीं होना चाहिए..इसका कारण स्पष्ट रूप से यह है कि यह वह समय है जब भवन निर्माण में लखौरी ईंटो का प्रयोग होता था..लखौरी ईंटो से निर्मित ही कुछ मकान/घर
 इस गाँव में मिलते है जो आजकल अवशेष मात्र है.मुख्य रूप से गाँव की प्राचीन चौपाल जो 50 वर्ष से पुरानी नहीं है और लाला गीताराम का घर लखौरी ईंटो से बना है.इसके अतिरिक्त कोई भी ऐसी सरंचना गाँव में नहीं मिलती है जो इसके अपने इतिहास को 160-200 वर्षों से पीछे ले जाती हो.
लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि गाँव की बस्ती से कहीं अधिक पुराना गाँव वासियों का इतिहास है.
हथछोया गाँव की बस्ती की स्थापना के पीछे मै " बस्ती विस्थापन" सिद्धांत को मूल कारण मानता हूँ.हडप्पा सभ्यता के पतन के लिए इतिहासकारों ने अनेक सिद्धांत दिए है. लेकिन इतिहास का जागरूक विद्यार्थी होने के कारण हड़प्पा के पतन को लेकर मेरा अपना मत है जिसे मै "बस्ती-विस्थापन" सिद्धांत कहता हूँ.मेरा मत है कि क्योंकि आज से 3000 से 4000 वर्ष पूर्व चिकित्सा सुविधाएँ सुलभ नहीं थी.उस समय महामारी और बाढ़ जैसी आपदाएं आम थी.महामारी की स्थिति में लोग अपनी बस्ती को छोड़कर समीप के ही अन्य स्थान पर विस्थापित होकर नई बस्ती बसा लेते थे.यदि हम हडप्पा कालीन बस्तियों का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि जहाँ भी हमें हड्प्पाई अधिवासों के अवशेष मिले है उनके 1-10 किलोमीटर की परिधि में ही हमे आधुनिक जीवंत बस्तियां भी मिलती है. उदाहरण के रूप में हम हथछोया और हुलास को ले सकते है. हुलास जो कि सहारनपुर जनपद में हड्प्पाई अधिवास है, के 1-5 किलोमीटर की परिधि में बरसी,टिकरोल,और मनोहरा आदि कई गाँव है.इसी प्रकार हथछोया के समीप ही स्थित "छोटी और बड़ी भेंट" तथा सुजानखेड़ी की स्थिति बस्ती विस्थापन के पक्ष में प्रमाण हैं.हुलास,बड़ी और छोटी भेंट, एवं सुजानखेडी के पतन और बरसी,टिकरोल,मनोहरा तथा हथछोया की उतपत्ति में निकट का सम्बन्ध है.आज हमारे पास यदि अवशिष्ट बस्तियों के पतन के साक्ष्य नहीं है तो इनके समीपस्थ वर्तमान बस्तियों की उत्पत्ति के भी पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है.अतः यह न मानने का कोई कारण नहीं है कि महामारी जैसे कारणों से अवशिष्ट बस्तियों से वर्तमान बस्तियों में बस्ती का विस्थापन होने से अधिकांश वर्तमान अधिवास अस्तित्व में आये.

 गाँव की मूल बस्ती से लगभग 1.5 किलोमीटर दूरी पर सुजानखेड़ी और ",विशाल डाबर (जोहड़) के दूसरी और स्थित हड़प्पा कालीन दो बस्तियों से अलग-अलग कारणों से बस्ती का विस्थापन हुआ और यहाँ के लोग हथछोया के मूल स्थान की भौगोलिक रूप से लाभदायक अवस्थिति के कारण यहाँ आ बसे जिसके पुख्ता प्रमाण हैं.
हथछोया गाँव में जोहड़,गुल्ही,देवावाला और यहाँ से बमुश्किल आधा किलोमीटर की दूरी पर बराला नामक चार विशालकाय तालाबों का 200 बीघे से अधिक का रकबा था, जिसके आज अवशेष मात्र हैं.यह क्षेत्र पूर्व में घने जंगलों से आबाद क्षेत्र था.हड़प्पा कालीन बस्तियों से भयानक महामारी के कारण सम्पूर्ण बस्ती का विस्थापन, विशाल जोहड़ के पश्चिम की और
हो गया, 20 वर्षो पहले तक इन दोनों बस्तियों के अवशेष गाँव में " बड़ी भेंट" और "छोटी भेंट" के नाम से रहा है.ये वास्तव में प्राचीन हड़प्पा कालीन बस्तियों के अवशेष थे जो हरित-क्रान्ति के फलस्वरूप हुए कृषि विकास की भेट चढ़ गये.मुझे याद है कि जब गाँव के कुछ लोगों ने इन भेंटो को काटकर अपने खेतों का भाग बनाना शुरू किया था तो वहां से रोजाना मानव अस्थियाँ, कंकाल, छोटे छोटे मिटटी के खिलोने और मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) निकलने की चर्चाएं गाँव में आम हुआ करती थी.वास्तव में यह हड़प्पाई लोगों द्वारा छोड़े गए पुरातात्विक साक्ष्य ही थे जिनके बारे में उस दौरान गाँव के किसी व्यक्ति की कोई एतिहासिक दृष्टि नहीं थी.
जब हम छोटे थे तो चोर सिपाही का खेल खेलते हुए अक्सर जोहड़ के बीच से होकर जाने वाले संकरे मार्ग से निकलकर इन भेंटो की और निकल जाया करते थे.भेंटो के उपर तक चले जाना हमे किसी एडवेंचर से कम नहीं लगता था.परिवार वालो की तरफ से वहां जाने की साफ़ मनाही होती थी क्योंकि ऐसी धारणा गाँव में उस समय प्रचलित थी कि इन "भेंटो" पर जाने से भूत चिपट जाते है.उन दिनों इन भेंटो पर ही शमशान होते थे.छोटी भेंट को चुहड़ो की भेंट कहा जाता था क्योंकि उस समय प्रचलित
भेदभाव के कारण चुहड़ो के मुर्दों का अंतिम संस्कार छोटी भेंट पर ही किया जाता था.
हडप्पा कालीन कुछ इंटे हाल के वर्षो तक गाँव में दिखाई देती रही जो इस बात का प्रमाण है कि इन भेंटो से विस्थापित हुए लोगो ने अपने अधिवासों के निर्माण के लिए पुरानी ईंटो का प्रयोग किया जो वे अपने साथ पुरानी बस्तियों से लाये थे.
दूसरा विस्थापन सुजानखेडी की बस्ती से हथछोया में हुआ जिसके कारण अलग थे......

सुजानखेडी से हथछोया में बस्ती-विस्थापन
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सुजानखेडी आज के राजस्व दस्तावेजों में एक गैर-आबाद गाँव के रूप में दर्ज है.यहाँ की अधिकांश भूमि रेतीली है इसलिए इस क्षेत्र को सामान्यतः लोग मारू (मरुभूमि) भी कहते है.इस क्षेत्र की मिट्टी की सरंचना को देखकर यह स्पष्ठ हो जाता है कि 160-200 वर्ष पूर्व भी इस क्षेत्र में सतही जल का अभाव रहा होगा.ऐसा मानने का एक और स्पष्ट कारण यह है कि इस क्षेत्र की लगभग 1 किलोमीटर की परिधि में कोई तालाब नहीं था.किसी राजस्व दस्तावेज से भी इस बात की पुष्टि नहीं होती है कि यहाँ कभी कोई तालाब रहा हो.सुजानखेडी से हथछोया में बस्ती-विस्थापन के दो मूल कारण रहे:-
1. सुजानखेड़ी में जलाभाव
2. 1824 का किसान विद्रोह

सुजानखेड़ी मे जलाभाव -
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सुजानखेड़ी मे जलाभाव इस क्षेत्र से वर्तमान हथछोया की बस्ती के निर्माण के लिए एक बड़ा कारण माना जा सकता है। सुजानखेड़ी के आसपास के लगभग एक किलोमीटर के क्षेत्र मे तालाब के कोई साक्ष्य  नहीं मिलते है, यमुना नदी की यहाँ से दूरी लगभग 15 किलोमीटर है, सुजानखेड़ी की बस्ती का अस्तित्व  दिलावरों (हमारे) खेत के स्थान पर माना जाता है।  एक बात तो तय है कि सुजानखेड़ी से हथछोया मे बस्ती विस्थापन जल्दबाज़ी मे नहीं हुआ था और न ही महामारी फैलाना आदि ही इस विस्थापन का जनक था।  वास्तव मे सुजानखेड़ी के स्थान पर किसी अधिवास के कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं पाये गए है। इस स्थान से कोई मृदभांड या मानव कंकाल जैसा साक्ष्य न मिल पाना इस बात का प्रमाण है कि यहाँ से हथछोया मे बस्ती विस्थापन बड़े आराम से,सुविधाजनक तरीके से और पूर्णतः हुआ था। यानि बस्ती वासी यहाँ से हथछोया विस्थापित होते समय अपने साथ एक एक ईंट तक ले गए और तत्कालीन बस्ती-स्थल पर पीछे बस्ती का कोई अवशेष नहीं छोड़कर गए।
हमारे दादा फूलसिंह दिलावरे बताते थे कि उन्होने अपने दादा से सुना है कि सुजानखेड़ी मे पानी कि भारी किल्लत हो गई थी और आसपास कोई तलब न होने के कारण लोग बहुत परेशान थे। वर्तमान हथछोया के स्थान पर बहुत घने जंगल थे जहां कोई आता जाता नहीं था क्योंकि भयानक जंगली जानवरों का डर हमेशा बना रहता था। बताते है कि एक बार किसी का झौटा ( भैंसा) खुलकर जंगल की और चला गया, जब वह शाम को अपना पेट भर कर वापस लौटा तो गारे-पानी मे सना (भीगा) हुआ था। उसे देखकर लोगो की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। अगले दिन सुबह उस झौटे को फिर से खोला गया और गाँव के लोगो ने समूह बनाकर उसका पीछा किया तो वह वर्तमान हथछोया के जंगलों की और गया और जंगल मे एक विशाल तालाब पर जाकर पानी मे घुस गया। हजारों बीघे के तलब को देखकर सुजानखेडी वासियों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा और उन्होने तत्काल ही उस तलाब के किनारे बस्ती विस्थापन का फैसला ले लिया। यह विस्थापन हथछोया मे सुनियोजित नहीं था क्योंकि जिसको जहां उपयुक्त जगह दिखी उसने वहीं घर बना लिए। हड़प्पा बस्ती जैसी सुनियोजियत बस्ती सुजानखेड़ी वासी नहीं बना पाये। इसका मूल कारण यह था कि वे पानी कि किल्लत के कारण हड़बड़ी मे थे अतः आनन फानन मे जिसको जहां अनुकूलतम जगह दिखी उसने वही पर बस जाने का निर्णय कर लिया। कुछ दिनों मे सुजानखेड़ी से अपने अधिवासों मे प्रयुक्त समग्र निर्माण सामाग्री का उन्होने हथछोया लाकर पुनः प्रयोग अपने अधिवास निर्माण मे कर लिया।

* 1857 का स्वाधीनता संग्राम
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हथछोया मे सुजानखेड़ी से बस्ती विस्थापन के पीछे 1824 का किसान विद्रोह और 1857 का स्वाधीनता संग्राम भी एक बड़ा कारण माना जा सकता है। सन 1824 मे हुए कुंजा बहादुरपुर किसान विद्रोह की लपटे इस समस्त क्षेत्र मे फैल गई थी। सुजानखेड़ी के रौढ़ा सिंह दिलवारे, कुंजा बहादुरपुर के विजय सिंह के नजदीकी रिश्तेदार थे, रौढ़ा सिंह के पुत्र भजन सिंह कुंजा मे ब्याहे थे। अतः 1824 के किसान विद्रोह मे रौढ़ा सिंह ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। इस विद्रोह के सूत्रधारों मे से एक होने के कारण रौढ़ा सिंह को अंग्रेज़ सरकार ने मौत की सजा सुनाई थी। इस प्रकार रौढ़ा सिंह दिलावरे को 1824 के किसान विद्रोह मे शहीद होने का गौरव प्राप्त है। 1857 के संघर्ष मे रौढ़ा सिंह के पुत्र भजन सिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। शामली तहसील लूट के रणनीतिकार भजन सिंह दिलावरे ही थे। इस क्षेत्र मे 1857 के स्वाधीनता संघर्ष की बागडौर भजन सिंह और मोहर सिंह (शामली) के हाथ मे थी। 1857 के संघर्ष मे भजन सिंह की भूमिका के कारण ही अंग्रेज़ सरकार ने सुजानखेड़ी गाँव को तबाह कर दिया था । फलस्वरूप गाँव वासियों ने हथछोया की आधुनिक बस्ती मे स्थानांतरण कर लिया।
   इस प्रकार हथछोया की वर्तमान बस्ती, सुजानखेड़ी से हथछोया मे बस्ती विस्थापन के कारण अस्तित्व मे आई।      
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मुगलकाल में हथछोया:
परवर्ती मुगलकाल में हथछोया मुगल शासक द्वारा सूफी संत अब्दुल कद्दुस गंगोही को सनद के रूप में प्राप्त एक राजस्व ग्राम था।शेख कद्दूस ने अपने नाती पीरजादा शेख सैय्यद अली को सौंपा था ताकि वह यहां से खराज (भू राजस्व) की वसूली कर सके।हथछोया का लगभग 16000 बीघे का रकबा था जिसमें करीब 3000 बीघा का रकबा जमींदार रोढ़ा सिंह की मिल्कियत था।
    पीरज़ादों पर दिलावरों का आक्रमण एवं धर्म रक्ष------------

     भारत में इस्लाम के प्रचार का अघोषित विभाग था सूफी फकीरों का।ये सूफी फ़क़ीर अक्सर छल प्रयोग अथवा लालच देकर हिंदुओं का इस्लाम में धर्मान्तरण कराने का कार्य करते थे।धर्मांतरण इनका प्रमुख उद्देश्य था।चिश्ती सिलसिले ने भारत में छल के द्वारा सर्वाधिक हिंदुओं का धर्मांतरण किया।चिश्ती सूफियों की खानकाहे कव्वाली गायन का बड़ा केंद्र होती थी,भारत में कथित गंगा-जमुनी तहजीब इसी सिलसिले की कल्पना की उपज है।इन्होंने हिंदुओं को खानकाहों में लाकर,छल से उन्हें प्रसाद के नाम पर गौ मांस खिलाकर धर्मान्तरण कराया।इसके अतिरिक्त जजिया से बचाव के लालच में कुछ जमींदारों ने धर्मान्तरण स्वीकार किया तो कुछ ने आर्थिक लालच में इस्लाम अपनाया।शासकों ने तलवार को धर्मान्तरण का जरिया बनाया।लेकिन सूफ़ियों ने छल एवं लालच के द्वारा ही अधिकांश धर्मान्तरण कराया।

यमुना खादर का हथछोया गांव चिश्ती सूफी सिलसिले के प्रसिद्ध सूफी शेख सैयद अब्दुल कद्दुस गंगोही के नाती , पीरज़ादा सैयद अली को मिला एक राजस्व ग्राम था।कद्दुस का केंद्र गंगोह था।आज भी गंगोह में उसकी मजार है।इस मजार पर हजारों की संख्या में मूर्ख हिन्दू चादर चढ़ाने जाते हैं। असल में पीरज़ादे, सूफी सन्तों (पीर) की जायज़/नाज़ायज़ औलाद होते थे।अक्सर ये सूफी अपनी इन संतानों को कोई गाँव तत्कालीन हुक्मरानों से दिलवा दिया करते थे जिसकी समस्त मालगुज़ारी इन पीरज़ादों द्वारा ही वसूली जाती थी।
हथछोया में इन पीरज़ादों दो डेरे थे जिनमे पीरज़ादे ठहरा करते थे।एक डेरा गुल्ही के किनारे, पुरानी मस्जिद के स्थान पर था जहाँ आजकल अबलु एवम् मोम्मद का परिवार रहता है।दूसरा डेरा पुरानी डाब्बर के किनारे पर था जो जुगल किशोर दिलावरे के घेर के बराबर में था जहाँ आजकल मामचंद पंडित का परिवार रहता है।इस डेरे को हथछोया एवं सुजानखेड़ी का राजस्व लेने का सनद प्राप्त था।इसका प्रमुख पीरज़ादा शेख सैयद अली था, जो अब्दुल कद्दुस गंगोही का नाती था।पूरा गाँव शेख सैयद अली को देखते ही झुककर सलाम करता था।गाँव के दीवानी और फौजदारी के मामलों का निस्तारण पीरज़ादा सैय्यद अली की निजामत के द्वारा किया जाता था।मुगलकाल में ये लोग "सद्र उस सुदूर" (धार्मिक मामलों का विभाग) के तहत कार्य करते थे जिनका प्रमुख कार्य शरीयत का अनुपालन करवाना होता था।अक्सर पीरज़ादे मुहतसिब के तौर पर नियुक्त होते थे। ‘शरियत’ के प्रतिकूल कार्य करने वालों को रोकना, आम जनता (विषेषकर मुस्लिम ) को दुश्चरित्रता से बचाना, सार्वजनिक सदाचार की देखभाल करना, शराब, भांग के उपयोग पर रोक लगाना, जुए के खेल को प्रतिबन्धत करना, मंदिरों को तुड़वाना (औरंगज़ेब के समय में),हिंदुओं का धर्मपरिवर्तन करवाना आदि मुहतसिब के महत्त्वपूर्ण कार्य थे। इस पद की स्थापना औरंगज़ेब ने की थी। ये पीरज़ादे गाँव में ही अपना कैम्प किया करते थे जिसे अक्सर डेरा कहा जाता था।पीरज़ादों के कैम्प में अक्सर चिश्ती एवं नक्शबंदी सिलसिले के सूफियों का आना होता रहता था।उन दिनों निकटवर्ती कस्बा गंगोह सूफी संतों का बड़ा केंद्र था।गंगोह में चिश्ती सिलसिले के प्रमुख सूफी संत "शेख शाह अब्दुल कद्दुस गंगोही" की खानकाह थी।अब्दुल कद्दुस गंगोही प्राणायाम एवं अन्य यौगिक क्रियाओं में पारंगत था।वह "अलखगिरी" उपनाम से लिखा भी करते था इसलिए "अलख" नाम से भी जाने जाते थे।इस कारण उन्हें हिंदुओं के गोरखपंथी सन्तों से अलग करना सामान्य जन के लिए भ्रमित करने वाला था।गोरखपंथी भी "अलख निरंजन" का उदघोष करते हैं।सूफी संतों ने हिन्दू धर्म से प्राणायाम,यौगिक क्रियाएं एवं हठयोग जैसी पद्दत्तियाँ ज्यों की त्यों अपना ली थी।अब्दुल कद्दुस,शाह साबिर कलियारी का शिष्य था और चिश्ती सिलसिले का सूफी था।सहारनपुर,मुज़फ्फरनगर और शामली के क्षेत्र में चिश्ती सिलसिले ने हिंदुओं के धर्मांतरण की एक बड़ी मुहिम चलाई।धर्मांतरण के औरंगजेबी और सूफी तरीके में एक बड़ा अंतर था कि सूफियों ने छल एवं शांतिपूर्ण तरीके से गरीबों को आर्थिक मदद का लालच देकर धर्मांतरण की प्रक्रिया को सम्पन्न किया ।सूफी अपने इस प्रयास में काफी सफल भी रहे।सूफी निजामुद्दीन औलिया के अलावा कोई भी सूफी अविवाहित नही था।ये गृहस्थ सन्त थे।समस्त मानवीय अवगुणों से ये भी अछूते नही थे।अतः धर्म प्रचार के सिलसिले में भ्रमण के दौरान इन्होंने विवाहेत्तर संबंध स्थापित किये जिससे पैदा संताने पीरज़ादा कहलाये।बादशाही दरबार मे अपने संबंधों का लाभ उठाकर इन्होंने अपनी उन नाजायज़ संतान "पीरज़ादों" को छोटी छोटी जागीर आवंटित करा दी।जागीरी इलाके में ही रहकर ये पीरज़ादे लगान वसूली के साथ साथ जोर जबरदस्ती स्थानीय लोगों का धर्मान्तरण करते थे।हथछोया में भी इन्हीं पीरज़ादों द्वारा कई हिन्दू गुर्जर परिवारों को छल एवं लालच के द्वारा इस्लाम धर्म मे परिवर्तित किया।लेकिन जमींदार रोढ़ा सिंह के प्रबल प्रतिरोध के कारण पीरज़ादों को हथछोया के एक हिन्दू परिवार के अलावा धर्म परिवर्तन में अधिक सफलता नही मिल पाई।वे गांव के एक गुर्जर परिवारों को छोड़कर अन्य किसी भी बिरादरी के किसी भी परिवार के इस्लाम मे धर्मान्तरण में सफलता प्राप्त नही कर पाए।
जमींदार रोढ़ा सिंह का परिवार अपने अक्खड़पन एवम् दबंगई के लिए दूर दूर तक मशहूर था।उन्होंने कभी भी पीरजादों के सामने सिर नहीं झुकाया ।इतना ही नहीं वे हमेशा पीरज़ादों के हुक्मों की नाफरमानी करते थे।पीरज़ादों ने लालच,दबंगई,जोर जबरदस्ती समस्त नैतिक अनैतिक तरीकों से जमींदार रोढ़ा सिंह को इस्लाम मे धर्मांतरित करने के प्रयास किये।रोढ़ा सिंह की दबंगई एवं अक्खड़पन के कारण पीरज़ादों का विश्वास था कि यदि वे उनका धर्म परिवर्तन करने में सफल हो गए तो क्षेत्र में इस बात का एक बड़ा सन्देश जाएगा और पीरज़ादों को धर्मांतरण की मुहिम चलाने के लिए एक बड़ा नैतिक बल प्राप्त होगा।पीरज़ादों का कोई हथकंडा जमींदार परिवार के धर्मपरिवर्तन के लिए काम नही आया। इस कारण पीरज़ादा सैय्यद अली, जमींदार रोढ़ा सिंह परिवार को नापसंद करने लगा और उसने अपनी सारी शक्ति उनके परिवार के उत्पीड़न एवं सार्वजनिक रुप से अपमानित करने पर लगा दी।सैय्यद अली ने जमींदार के लिए फरमान जारी किया कि वह उनके डेरे पर हाज़िरी दे और उन्हें सलाम करे तथा उनके हुक्म की तामीली करें।लेकिन जमींदार किसी भी कीमत पर झुकने को तैयार नही था।
रोढ़ा सिंह परिवार के पास एक लगभग 50 मीटर लम्बी दहलीज़ (गैलरी) थी।वे शरणागत वत्सल थे अर्थात उनके पास यदि किसी ने शरण लेली तो उसकी रक्षा वे अपनी जान पर खेलकर करते थे।यदि किसी ने किसी व्यक्ति की हत्या करने के बाद भी उनके पास आकर शरण लेली तो किसी की मज़ाल नहीं थी कि उस शरणार्थी का कोई बाल भी बांका कर सके।लम्बी दहलीज़ अक्सर एक सुरक्षित शरणगाह का काम करती थी। इस बात से पीरज़ादा सैय्यद अली न केवल परेशान था बल्कि जमींदार के बागी तेवर से अपनी सुरक्षा को लेकर सजग भी रहता था।
बहुत सोच विचार करने के बाद पीरज़ादों ने तय किया कि गाँव के मुख्यद्वार, जो डेरे के पास ही था, पर एक दीवार का निर्माण कराया जाये जिसमे एक मोरी (छोटा दरवाजा) बनवाई जाए ताकि गाँव के अंदर बाहर जाने के लिए हर किसी को मोरी से गुजरना पड़े और मोरी से गुजरते समय हर किसी को अपना सिर झुकाना पड़े।इस बात की खबर जब जमींदार रोढ़ा सिंह को लगी तो उन्होंने तय किया कि मोरी में से पार निकलने के लिए सिर की बजाय पैर के बल घुसा जाये ताकि उन्हें सिर न झुकाना पड़े।इस प्रकार दिलावरों ने कभी भी पीरज़ादों के सामने समर्पण करना और धर्मपरिवर्तन करना स्वीकार नही किया।
इस घटना से पीरज़ादों और जमींदार के बीच काफी कड़वाहट आ गई।रोढ़ा सिंह भी पीरज़ादों से गांव को हमेशा के लिए मुक्त कराने की योजना पर कार्य कर रहे थे। पीरज़ादों के घर पीसने के लिए गाँव की दलित महिलाएं सुबह सुबह जाया करती थी।रोढ़ा सिंह एवं उनके पुत्र भजन सिंह ने एक योजना बनाई।उन्होंने पिसाई करने वाली एक दलित महिला को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि जब वह सुबह पीरज़ादे के घर गेंहू पीसने जायेगी तो उसे शौर मचाना है कि पीरज़ादा उसके साथ जबरदस्ती कर बलात्कार करने की कोशिश कर रहा है। उस महिला ने अगले दिन सुबह ऐसा ही किया। पहले से तैयार बैठे जमींदार रोढ़ा सिंह परिवार के लोगों ने योजनाबध्द तरीके से अन्य ग्रामीण जनों के साथ उस महिला की मदद के करने के लिए हथियारों सहित पीरज़ादों के डेरे पर आक्रमण कर दिया जिससे उनमे हड़कम्प मच गया। पीरज़ादा शेख सैयद अली ने भागकर जान बचानी चाही लेकिन मौके पर मारा गया बाकी ने भागकर अपनी प्राणरक्षा की।तय योजनानुसार दोनों डेरों पर एक साथ आक्रमण किया गया था। सुबह होने तक दोनों डेरों से पीरज़ादे भाग चुके थे।ग्रामीणों ने डेरों में जमकर लूटपाट की।शेख सैयद अली की लाश कई दिन तक जंगल में पड़ी रही।आते जाते लोग उसकी लाश को ठोकर मारते थे।इसी कारण इस जगह का नाम भी "ठोकरों वाला जंगल" (बाद में टोखरों) पड़ गया। कोई सैयद अली की लाश तक लेने के लिए नही आया।कई दिन बाद, जमींदार रोढ़ा सिंह और उनके साथी,सैय्यद अली की लाश को घसीटकर लाये और नाले के किनारे गड्ढा खोदकर दबा दिया तथा उसके ऊपर ईंट रख दी।कालान्तर में वर्षों बाद कुछ लोगों ने उसे मजार समझकर पूजना ही शुरू कर दिया।सैयद अली की मजार बिगड़कर सैदली कहलाने लगी।पीरजादों पर आक्रमण और शेख सैय्यद अली की हत्या की घटना के बाद पीरज़ादों ने दोबारा से कभी हथछोया में वापस आने का प्रयास नही किया। इस घटना के बाद हथछोया को पीरज़ादों के आतंक से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई और जमींदार रोढ़ा सिंह की ख्याति दूर दूर तक फ़ैल गई।इसी घटना के कारण गांव के लोगों ने जमींदार रोढ़ा सिंह को "दिलावरा-अर्थात दिल वाला" की उपाधि से नवाजा।इसके बाद जमींदार परिवार दिलावरे नाम से जाना जाने लगा।
हथछोया में कुछ गुर्जर परिवारों का धर्म परिवर्तन क्योंकि सूफियों द्वारा करवाया गया था अतः सूफीमत में हिन्दू एवं बौद्ध पद्दतियों जैसे प्रणायाम,बौद्ध,पीरी-मुरीदी, रहस्यवाद, हठयोग, ध्यान,संगीत(समा) आदि का मिश्रण था इसलिए इस्लाम मे परिवर्तित गुर्जर परिवारों में कभी धार्मिक कट्टरपन जगह नही बना पाया।फलस्वरूप हिन्दू गुर्जर और धर्मांतरित मुस्लिम गुर्जर परिवारों में आज भी वही समन्वय एवं प्यार देखने को मिलता है।भारतीय इस्लाम पर सूफी आंदोलन का एक सकारात्मक प्रभाव यह है कि भारतीय मुस्लिम आज भी शांति एवं अमन पसन्द है एवं भाई चारे में विश्वास रखता है।आजकल कुछ नवयुवक जरूर कट्टर इस्लामी पन्थ "अहले-हदीस/सल्फी/वहाबी की चपेट में आकर नफरत की विचारधारा को गले लगा रहे हैं।तमाम नकरात्मताओं के बावजूद हिंदुत्व के अतिरिक्त सूफ़ियत में ही वह ताकत है जो दुनिया को कट्टर इस्लामी वहाबी आतंकवाद के साये से बाहर निकाल सकता है।सूफीमत धार्मिक समन्वय का प्रतिफल है जिसमें हिंदुत्व, इस्लाम और बौद्ध धर्म का वह सारतत्व निहित है जो दुनिया को शांति का संदेश देता है।।

(प्रस्तुत लेख लेखक द्वय का संयुक्त शौध-पत्र है)


  
                                                               # सुनील सत्यम