पुराना इतिहास है हथछोया का.इसका इतिहास जानने के लिए हमें इतिहास के धूल-धूसरित पन्नो को खंगालना होगा,जो बहुत श्रम साध्य और शौध का विषय है.अपने इतिहास ज्ञान,इतिहास-लेखन की तकनीकियों और जनश्रुतियों का सहारा लेकर भी हम हथछोया के अतीत पर दृष्टिपात कर सकते हैं.
हथछोया का शाब्दिक अर्थ:
हथछोया मूलतः दो शब्दों से मिलकर बना है-
हद (सीमा,अति)+चोया (जल स्तर). यह इस शब्द का संधिविच्छेद न होकर स्थानीय भाषा के दो शब्दों का एक साथ मिलकर प्रयोग है.
अर्थात ऐसा क्षेत्र जहाँ जल स्तर बहुत ऊपर ही उपलब्ध हो. गाँव की वर्तमान बस्ती के स्थान पर विशाल भौगोलिक क्षेत्र पर तालाब होने के कारण भूमिगत जल स्तर (चोया) की हद भूसतह के एकदम समीपस्थ थी.इसी कारण हद्चोया शब्द की उत्पत्ति हुई जो कालांतर में बिगड़कर हथछोया बन गया.
वास्तव में हथछोया के अधिवास का अध्ययन कई पहलुओं पर हमारा ध्यान केन्द्रित कर देता है, जो काफी मजेदार है.
हथछोया के बस्ती प्रारूप और प्रकार का विश्लेषण करे तो हम आसानी से समझ सकते है कि इस गाँव का इतिहास 160-200 वर्षो से अधिक पुराना नहीं होना चाहिए..इसका कारण स्पष्ट रूप से यह है कि यह वह समय है जब भवन निर्माण में लखौरी ईंटो का प्रयोग होता था..लखौरी ईंटो से निर्मित ही कुछ मकान/घर
इस गाँव में मिलते है जो आजकल अवशेष मात्र है.मुख्य रूप से गाँव की प्राचीन चौपाल जो 50 वर्ष से पुरानी नहीं है और लाला गीताराम का घर लखौरी ईंटो से बना है.इसके अतिरिक्त कोई भी ऐसी सरंचना गाँव में नहीं मिलती है जो इसके अपने इतिहास को 160-200 वर्षों से पीछे ले जाती हो.
लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि गाँव की बस्ती से कहीं अधिक पुराना गाँव वासियों का इतिहास है.
हथछोया गाँव की बस्ती की स्थापना के पीछे मै " बस्ती विस्थापन" सिद्धांत को मूल कारण मानता हूँ.हडप्पा सभ्यता के पतन के लिए इतिहासकारों ने अनेक सिद्धांत दिए है. लेकिन इतिहास का जागरूक विद्यार्थी होने के कारण हड़प्पा के पतन को लेकर मेरा अपना मत है जिसे मै "बस्ती-विस्थापन" सिद्धांत कहता हूँ.मेरा मत है कि क्योंकि आज से 3000 से 4000 वर्ष पूर्व चिकित्सा सुविधाएँ सुलभ नहीं थी.उस समय महामारी और बाढ़ जैसी आपदाएं आम थी.महामारी की स्थिति में लोग अपनी बस्ती को छोड़कर समीप के ही अन्य स्थान पर विस्थापित होकर नई बस्ती बसा लेते थे.यदि हम हडप्पा कालीन बस्तियों का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि जहाँ भी हमें हड्प्पाई अधिवासों के अवशेष मिले है उनके 1-10 किलोमीटर की परिधि में ही हमे आधुनिक जीवंत बस्तियां भी मिलती है. उदाहरण के रूप में हम हथछोया और हुलास को ले सकते है. हुलास जो कि सहारनपुर जनपद में हड्प्पाई अधिवास है, के 1-5 किलोमीटर की परिधि में बरसी,टिकरोल,और मनोहरा आदि कई गाँव है.इसी प्रकार हथछोया के समीप ही स्थित "छोटी और बड़ी भेंट" तथा सुजानखेड़ी की स्थिति बस्ती विस्थापन के पक्ष में प्रमाण हैं.हुलास,बड़ी और छोटी भेंट, एवं सुजानखेडी के पतन और बरसी,टिकरोल,मनोहरा तथा हथछोया की उतपत्ति में निकट का सम्बन्ध है.आज हमारे पास यदि अवशिष्ट बस्तियों के पतन के साक्ष्य नहीं है तो इनके समीपस्थ वर्तमान बस्तियों की उत्पत्ति के भी पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है.अतः यह न मानने का कोई कारण नहीं है कि महामारी जैसे कारणों से अवशिष्ट बस्तियों से वर्तमान बस्तियों में बस्ती का विस्थापन होने से अधिकांश वर्तमान अधिवास अस्तित्व में आये.
गाँव की मूल बस्ती से लगभग 1.5 किलोमीटर दूरी पर सुजानखेड़ी और ",विशाल डाबर (जोहड़) के दूसरी और स्थित हड़प्पा कालीन दो बस्तियों से अलग-अलग कारणों से बस्ती का विस्थापन हुआ और यहाँ के लोग हथछोया के मूल स्थान की भौगोलिक रूप से लाभदायक अवस्थिति के कारण यहाँ आ बसे जिसके पुख्ता प्रमाण हैं.
हथछोया गाँव में जोहड़,गुल्ही,देवावाला और यहाँ से बमुश्किल आधा किलोमीटर की दूरी पर बराला नामक चार विशालकाय तालाबों का 200 बीघे से अधिक का रकबा था, जिसके आज अवशेष मात्र हैं.यह क्षेत्र पूर्व में घने जंगलों से आबाद क्षेत्र था.हड़प्पा कालीन बस्तियों से भयानक महामारी के कारण सम्पूर्ण बस्ती का विस्थापन, विशाल जोहड़ के पश्चिम की और
हो गया, 20 वर्षो पहले तक इन दोनों बस्तियों के अवशेष गाँव में " बड़ी भेंट" और "छोटी भेंट" के नाम से रहा है.ये वास्तव में प्राचीन हड़प्पा कालीन बस्तियों के अवशेष थे जो हरित-क्रान्ति के फलस्वरूप हुए कृषि विकास की भेट चढ़ गये.मुझे याद है कि जब गाँव के कुछ लोगों ने इन भेंटो को काटकर अपने खेतों का भाग बनाना शुरू किया था तो वहां से रोजाना मानव अस्थियाँ, कंकाल, छोटे छोटे मिटटी के खिलोने और मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) निकलने की चर्चाएं गाँव में आम हुआ करती थी.वास्तव में यह हड़प्पाई लोगों द्वारा छोड़े गए पुरातात्विक साक्ष्य ही थे जिनके बारे में उस दौरान गाँव के किसी व्यक्ति की कोई एतिहासिक दृष्टि नहीं थी.
जब हम छोटे थे तो चोर सिपाही का खेल खेलते हुए अक्सर जोहड़ के बीच से होकर जाने वाले संकरे मार्ग से निकलकर इन भेंटो की और निकल जाया करते थे.भेंटो के उपर तक चले जाना हमे किसी एडवेंचर से कम नहीं लगता था.परिवार वालो की तरफ से वहां जाने की साफ़ मनाही होती थी क्योंकि ऐसी धारणा गाँव में उस समय प्रचलित थी कि इन "भेंटो" पर जाने से भूत चिपट जाते है.उन दिनों इन भेंटो पर ही शमशान होते थे.छोटी भेंट को चुहड़ो की भेंट कहा जाता था क्योंकि उस समय प्रचलित
भेदभाव के कारण चुहड़ो के मुर्दों का अंतिम संस्कार छोटी भेंट पर ही किया जाता था.
हडप्पा कालीन कुछ इंटे हाल के वर्षो तक गाँव में दिखाई देती रही जो इस बात का प्रमाण है कि इन भेंटो से विस्थापित हुए लोगो ने अपने अधिवासों के निर्माण के लिए पुरानी ईंटो का प्रयोग किया जो वे अपने साथ पुरानी बस्तियों से लाये थे.
दूसरा विस्थापन सुजानखेडी की बस्ती से हथछोया में हुआ जिसके कारण अलग थे......
सुजानखेडी से हथछोया में बस्ती-विस्थापन
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सुजानखेडी आज के राजस्व दस्तावेजों में एक गैर-आबाद गाँव के रूप में दर्ज है.यहाँ की अधिकांश भूमि रेतीली है इसलिए इस क्षेत्र को सामान्यतः लोग मारू (मरुभूमि) भी कहते है.इस क्षेत्र की मिट्टी की सरंचना को देखकर यह स्पष्ठ हो जाता है कि 160-200 वर्ष पूर्व भी इस क्षेत्र में सतही जल का अभाव रहा होगा.ऐसा मानने का एक और स्पष्ट कारण यह है कि इस क्षेत्र की लगभग 1 किलोमीटर की परिधि में कोई तालाब नहीं था.किसी राजस्व दस्तावेज से भी इस बात की पुष्टि नहीं होती है कि यहाँ कभी कोई तालाब रहा हो.सुजानखेडी से हथछोया में बस्ती-विस्थापन के दो मूल कारण रहे:-
1. सुजानखेड़ी में जलाभाव
2. 1824 का किसान विद्रोह
सुजानखेड़ी मे जलाभाव -
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सुजानखेड़ी मे जलाभाव इस क्षेत्र से वर्तमान हथछोया की बस्ती के निर्माण के लिए एक बड़ा कारण माना जा सकता है। सुजानखेड़ी के आसपास के लगभग एक किलोमीटर के क्षेत्र मे तालाब के कोई साक्ष्य नहीं मिलते है, यमुना नदी की यहाँ से दूरी लगभग 15 किलोमीटर है, सुजानखेड़ी की बस्ती का अस्तित्व दिलावरों (हमारे) खेत के स्थान पर माना जाता है। एक बात तो तय है कि सुजानखेड़ी से हथछोया मे बस्ती विस्थापन जल्दबाज़ी मे नहीं हुआ था और न ही महामारी फैलाना आदि ही इस विस्थापन का जनक था। वास्तव मे सुजानखेड़ी के स्थान पर किसी अधिवास के कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं पाये गए है। इस स्थान से कोई मृदभांड या मानव कंकाल जैसा साक्ष्य न मिल पाना इस बात का प्रमाण है कि यहाँ से हथछोया मे बस्ती विस्थापन बड़े आराम से,सुविधाजनक तरीके से और पूर्णतः हुआ था। यानि बस्ती वासी यहाँ से हथछोया विस्थापित होते समय अपने साथ एक एक ईंट तक ले गए और तत्कालीन बस्ती-स्थल पर पीछे बस्ती का कोई अवशेष नहीं छोड़कर गए।
हमारे दादा फूलसिंह दिलावरे बताते थे कि उन्होने अपने दादा से सुना है कि सुजानखेड़ी मे पानी कि भारी किल्लत हो गई थी और आसपास कोई तलब न होने के कारण लोग बहुत परेशान थे। वर्तमान हथछोया के स्थान पर बहुत घने जंगल थे जहां कोई आता जाता नहीं था क्योंकि भयानक जंगली जानवरों का डर हमेशा बना रहता था। बताते है कि एक बार किसी का झौटा ( भैंसा) खुलकर जंगल की और चला गया, जब वह शाम को अपना पेट भर कर वापस लौटा तो गारे-पानी मे सना (भीगा) हुआ था। उसे देखकर लोगो की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। अगले दिन सुबह उस झौटे को फिर से खोला गया और गाँव के लोगो ने समूह बनाकर उसका पीछा किया तो वह वर्तमान हथछोया के जंगलों की और गया और जंगल मे एक विशाल तालाब पर जाकर पानी मे घुस गया। हजारों बीघे के तलब को देखकर सुजानखेडी वासियों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा और उन्होने तत्काल ही उस तलाब के किनारे बस्ती विस्थापन का फैसला ले लिया। यह विस्थापन हथछोया मे सुनियोजित नहीं था क्योंकि जिसको जहां उपयुक्त जगह दिखी उसने वहीं घर बना लिए। हड़प्पा बस्ती जैसी सुनियोजियत बस्ती सुजानखेड़ी वासी नहीं बना पाये। इसका मूल कारण यह था कि वे पानी कि किल्लत के कारण हड़बड़ी मे थे अतः आनन फानन मे जिसको जहां अनुकूलतम जगह दिखी उसने वही पर बस जाने का निर्णय कर लिया। कुछ दिनों मे सुजानखेड़ी से अपने अधिवासों मे प्रयुक्त समग्र निर्माण सामाग्री का उन्होने हथछोया लाकर पुनः प्रयोग अपने अधिवास निर्माण मे कर लिया।
* 1857 का स्वाधीनता संग्राम
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हथछोया मे सुजानखेड़ी से बस्ती विस्थापन के पीछे 1824 का किसान विद्रोह और 1857 का स्वाधीनता संग्राम भी एक बड़ा कारण माना जा सकता है। सन 1824 मे हुए कुंजा बहादुरपुर किसान विद्रोह की लपटे इस समस्त क्षेत्र मे फैल गई थी। सुजानखेड़ी के रौढ़ा सिंह दिलवारे, कुंजा बहादुरपुर के विजय सिंह के नजदीकी रिश्तेदार थे, रौढ़ा सिंह के पुत्र भजन सिंह कुंजा मे ब्याहे थे। अतः 1824 के किसान विद्रोह मे रौढ़ा सिंह ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। इस विद्रोह के सूत्रधारों मे से एक होने के कारण रौढ़ा सिंह को अंग्रेज़ सरकार ने मौत की सजा सुनाई थी। इस प्रकार रौढ़ा सिंह दिलावरे को 1824 के किसान विद्रोह मे शहीद होने का गौरव प्राप्त है। 1857 के संघर्ष मे रौढ़ा सिंह के पुत्र भजन सिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। शामली तहसील लूट के रणनीतिकार भजन सिंह दिलावरे ही थे। इस क्षेत्र मे 1857 के स्वाधीनता संघर्ष की बागडौर भजन सिंह और मोहर सिंह (शामली) के हाथ मे थी। 1857 के संघर्ष मे भजन सिंह की भूमिका के कारण ही अंग्रेज़ सरकार ने सुजानखेड़ी गाँव को तबाह कर दिया था । फलस्वरूप गाँव वासियों ने हथछोया की आधुनिक बस्ती मे स्थानांतरण कर लिया।
इस प्रकार हथछोया की वर्तमान बस्ती, सुजानखेड़ी से हथछोया मे बस्ती विस्थापन के कारण अस्तित्व मे आई।
हथछोया का शाब्दिक अर्थ:
हथछोया मूलतः दो शब्दों से मिलकर बना है-
हद (सीमा,अति)+चोया (जल स्तर). यह इस शब्द का संधिविच्छेद न होकर स्थानीय भाषा के दो शब्दों का एक साथ मिलकर प्रयोग है.
अर्थात ऐसा क्षेत्र जहाँ जल स्तर बहुत ऊपर ही उपलब्ध हो. गाँव की वर्तमान बस्ती के स्थान पर विशाल भौगोलिक क्षेत्र पर तालाब होने के कारण भूमिगत जल स्तर (चोया) की हद भूसतह के एकदम समीपस्थ थी.इसी कारण हद्चोया शब्द की उत्पत्ति हुई जो कालांतर में बिगड़कर हथछोया बन गया.
वास्तव में हथछोया के अधिवास का अध्ययन कई पहलुओं पर हमारा ध्यान केन्द्रित कर देता है, जो काफी मजेदार है.
हथछोया के बस्ती प्रारूप और प्रकार का विश्लेषण करे तो हम आसानी से समझ सकते है कि इस गाँव का इतिहास 160-200 वर्षो से अधिक पुराना नहीं होना चाहिए..इसका कारण स्पष्ट रूप से यह है कि यह वह समय है जब भवन निर्माण में लखौरी ईंटो का प्रयोग होता था..लखौरी ईंटो से निर्मित ही कुछ मकान/घर
इस गाँव में मिलते है जो आजकल अवशेष मात्र है.मुख्य रूप से गाँव की प्राचीन चौपाल जो 50 वर्ष से पुरानी नहीं है और लाला गीताराम का घर लखौरी ईंटो से बना है.इसके अतिरिक्त कोई भी ऐसी सरंचना गाँव में नहीं मिलती है जो इसके अपने इतिहास को 160-200 वर्षों से पीछे ले जाती हो.
लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि गाँव की बस्ती से कहीं अधिक पुराना गाँव वासियों का इतिहास है.
हथछोया गाँव की बस्ती की स्थापना के पीछे मै " बस्ती विस्थापन" सिद्धांत को मूल कारण मानता हूँ.हडप्पा सभ्यता के पतन के लिए इतिहासकारों ने अनेक सिद्धांत दिए है. लेकिन इतिहास का जागरूक विद्यार्थी होने के कारण हड़प्पा के पतन को लेकर मेरा अपना मत है जिसे मै "बस्ती-विस्थापन" सिद्धांत कहता हूँ.मेरा मत है कि क्योंकि आज से 3000 से 4000 वर्ष पूर्व चिकित्सा सुविधाएँ सुलभ नहीं थी.उस समय महामारी और बाढ़ जैसी आपदाएं आम थी.महामारी की स्थिति में लोग अपनी बस्ती को छोड़कर समीप के ही अन्य स्थान पर विस्थापित होकर नई बस्ती बसा लेते थे.यदि हम हडप्पा कालीन बस्तियों का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि जहाँ भी हमें हड्प्पाई अधिवासों के अवशेष मिले है उनके 1-10 किलोमीटर की परिधि में ही हमे आधुनिक जीवंत बस्तियां भी मिलती है. उदाहरण के रूप में हम हथछोया और हुलास को ले सकते है. हुलास जो कि सहारनपुर जनपद में हड्प्पाई अधिवास है, के 1-5 किलोमीटर की परिधि में बरसी,टिकरोल,और मनोहरा आदि कई गाँव है.इसी प्रकार हथछोया के समीप ही स्थित "छोटी और बड़ी भेंट" तथा सुजानखेड़ी की स्थिति बस्ती विस्थापन के पक्ष में प्रमाण हैं.हुलास,बड़ी और छोटी भेंट, एवं सुजानखेडी के पतन और बरसी,टिकरोल,मनोहरा तथा हथछोया की उतपत्ति में निकट का सम्बन्ध है.आज हमारे पास यदि अवशिष्ट बस्तियों के पतन के साक्ष्य नहीं है तो इनके समीपस्थ वर्तमान बस्तियों की उत्पत्ति के भी पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है.अतः यह न मानने का कोई कारण नहीं है कि महामारी जैसे कारणों से अवशिष्ट बस्तियों से वर्तमान बस्तियों में बस्ती का विस्थापन होने से अधिकांश वर्तमान अधिवास अस्तित्व में आये.
गाँव की मूल बस्ती से लगभग 1.5 किलोमीटर दूरी पर सुजानखेड़ी और ",विशाल डाबर (जोहड़) के दूसरी और स्थित हड़प्पा कालीन दो बस्तियों से अलग-अलग कारणों से बस्ती का विस्थापन हुआ और यहाँ के लोग हथछोया के मूल स्थान की भौगोलिक रूप से लाभदायक अवस्थिति के कारण यहाँ आ बसे जिसके पुख्ता प्रमाण हैं.
हथछोया गाँव में जोहड़,गुल्ही,देवावाला और यहाँ से बमुश्किल आधा किलोमीटर की दूरी पर बराला नामक चार विशालकाय तालाबों का 200 बीघे से अधिक का रकबा था, जिसके आज अवशेष मात्र हैं.यह क्षेत्र पूर्व में घने जंगलों से आबाद क्षेत्र था.हड़प्पा कालीन बस्तियों से भयानक महामारी के कारण सम्पूर्ण बस्ती का विस्थापन, विशाल जोहड़ के पश्चिम की और
हो गया, 20 वर्षो पहले तक इन दोनों बस्तियों के अवशेष गाँव में " बड़ी भेंट" और "छोटी भेंट" के नाम से रहा है.ये वास्तव में प्राचीन हड़प्पा कालीन बस्तियों के अवशेष थे जो हरित-क्रान्ति के फलस्वरूप हुए कृषि विकास की भेट चढ़ गये.मुझे याद है कि जब गाँव के कुछ लोगों ने इन भेंटो को काटकर अपने खेतों का भाग बनाना शुरू किया था तो वहां से रोजाना मानव अस्थियाँ, कंकाल, छोटे छोटे मिटटी के खिलोने और मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) निकलने की चर्चाएं गाँव में आम हुआ करती थी.वास्तव में यह हड़प्पाई लोगों द्वारा छोड़े गए पुरातात्विक साक्ष्य ही थे जिनके बारे में उस दौरान गाँव के किसी व्यक्ति की कोई एतिहासिक दृष्टि नहीं थी.
जब हम छोटे थे तो चोर सिपाही का खेल खेलते हुए अक्सर जोहड़ के बीच से होकर जाने वाले संकरे मार्ग से निकलकर इन भेंटो की और निकल जाया करते थे.भेंटो के उपर तक चले जाना हमे किसी एडवेंचर से कम नहीं लगता था.परिवार वालो की तरफ से वहां जाने की साफ़ मनाही होती थी क्योंकि ऐसी धारणा गाँव में उस समय प्रचलित थी कि इन "भेंटो" पर जाने से भूत चिपट जाते है.उन दिनों इन भेंटो पर ही शमशान होते थे.छोटी भेंट को चुहड़ो की भेंट कहा जाता था क्योंकि उस समय प्रचलित
भेदभाव के कारण चुहड़ो के मुर्दों का अंतिम संस्कार छोटी भेंट पर ही किया जाता था.
हडप्पा कालीन कुछ इंटे हाल के वर्षो तक गाँव में दिखाई देती रही जो इस बात का प्रमाण है कि इन भेंटो से विस्थापित हुए लोगो ने अपने अधिवासों के निर्माण के लिए पुरानी ईंटो का प्रयोग किया जो वे अपने साथ पुरानी बस्तियों से लाये थे.
दूसरा विस्थापन सुजानखेडी की बस्ती से हथछोया में हुआ जिसके कारण अलग थे......
सुजानखेडी से हथछोया में बस्ती-विस्थापन
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सुजानखेडी आज के राजस्व दस्तावेजों में एक गैर-आबाद गाँव के रूप में दर्ज है.यहाँ की अधिकांश भूमि रेतीली है इसलिए इस क्षेत्र को सामान्यतः लोग मारू (मरुभूमि) भी कहते है.इस क्षेत्र की मिट्टी की सरंचना को देखकर यह स्पष्ठ हो जाता है कि 160-200 वर्ष पूर्व भी इस क्षेत्र में सतही जल का अभाव रहा होगा.ऐसा मानने का एक और स्पष्ट कारण यह है कि इस क्षेत्र की लगभग 1 किलोमीटर की परिधि में कोई तालाब नहीं था.किसी राजस्व दस्तावेज से भी इस बात की पुष्टि नहीं होती है कि यहाँ कभी कोई तालाब रहा हो.सुजानखेडी से हथछोया में बस्ती-विस्थापन के दो मूल कारण रहे:-
1. सुजानखेड़ी में जलाभाव
2. 1824 का किसान विद्रोह
सुजानखेड़ी मे जलाभाव -
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सुजानखेड़ी मे जलाभाव इस क्षेत्र से वर्तमान हथछोया की बस्ती के निर्माण के लिए एक बड़ा कारण माना जा सकता है। सुजानखेड़ी के आसपास के लगभग एक किलोमीटर के क्षेत्र मे तालाब के कोई साक्ष्य नहीं मिलते है, यमुना नदी की यहाँ से दूरी लगभग 15 किलोमीटर है, सुजानखेड़ी की बस्ती का अस्तित्व दिलावरों (हमारे) खेत के स्थान पर माना जाता है। एक बात तो तय है कि सुजानखेड़ी से हथछोया मे बस्ती विस्थापन जल्दबाज़ी मे नहीं हुआ था और न ही महामारी फैलाना आदि ही इस विस्थापन का जनक था। वास्तव मे सुजानखेड़ी के स्थान पर किसी अधिवास के कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं पाये गए है। इस स्थान से कोई मृदभांड या मानव कंकाल जैसा साक्ष्य न मिल पाना इस बात का प्रमाण है कि यहाँ से हथछोया मे बस्ती विस्थापन बड़े आराम से,सुविधाजनक तरीके से और पूर्णतः हुआ था। यानि बस्ती वासी यहाँ से हथछोया विस्थापित होते समय अपने साथ एक एक ईंट तक ले गए और तत्कालीन बस्ती-स्थल पर पीछे बस्ती का कोई अवशेष नहीं छोड़कर गए।
हमारे दादा फूलसिंह दिलावरे बताते थे कि उन्होने अपने दादा से सुना है कि सुजानखेड़ी मे पानी कि भारी किल्लत हो गई थी और आसपास कोई तलब न होने के कारण लोग बहुत परेशान थे। वर्तमान हथछोया के स्थान पर बहुत घने जंगल थे जहां कोई आता जाता नहीं था क्योंकि भयानक जंगली जानवरों का डर हमेशा बना रहता था। बताते है कि एक बार किसी का झौटा ( भैंसा) खुलकर जंगल की और चला गया, जब वह शाम को अपना पेट भर कर वापस लौटा तो गारे-पानी मे सना (भीगा) हुआ था। उसे देखकर लोगो की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। अगले दिन सुबह उस झौटे को फिर से खोला गया और गाँव के लोगो ने समूह बनाकर उसका पीछा किया तो वह वर्तमान हथछोया के जंगलों की और गया और जंगल मे एक विशाल तालाब पर जाकर पानी मे घुस गया। हजारों बीघे के तलब को देखकर सुजानखेडी वासियों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा और उन्होने तत्काल ही उस तलाब के किनारे बस्ती विस्थापन का फैसला ले लिया। यह विस्थापन हथछोया मे सुनियोजित नहीं था क्योंकि जिसको जहां उपयुक्त जगह दिखी उसने वहीं घर बना लिए। हड़प्पा बस्ती जैसी सुनियोजियत बस्ती सुजानखेड़ी वासी नहीं बना पाये। इसका मूल कारण यह था कि वे पानी कि किल्लत के कारण हड़बड़ी मे थे अतः आनन फानन मे जिसको जहां अनुकूलतम जगह दिखी उसने वही पर बस जाने का निर्णय कर लिया। कुछ दिनों मे सुजानखेड़ी से अपने अधिवासों मे प्रयुक्त समग्र निर्माण सामाग्री का उन्होने हथछोया लाकर पुनः प्रयोग अपने अधिवास निर्माण मे कर लिया।
* 1857 का स्वाधीनता संग्राम
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हथछोया मे सुजानखेड़ी से बस्ती विस्थापन के पीछे 1824 का किसान विद्रोह और 1857 का स्वाधीनता संग्राम भी एक बड़ा कारण माना जा सकता है। सन 1824 मे हुए कुंजा बहादुरपुर किसान विद्रोह की लपटे इस समस्त क्षेत्र मे फैल गई थी। सुजानखेड़ी के रौढ़ा सिंह दिलवारे, कुंजा बहादुरपुर के विजय सिंह के नजदीकी रिश्तेदार थे, रौढ़ा सिंह के पुत्र भजन सिंह कुंजा मे ब्याहे थे। अतः 1824 के किसान विद्रोह मे रौढ़ा सिंह ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। इस विद्रोह के सूत्रधारों मे से एक होने के कारण रौढ़ा सिंह को अंग्रेज़ सरकार ने मौत की सजा सुनाई थी। इस प्रकार रौढ़ा सिंह दिलावरे को 1824 के किसान विद्रोह मे शहीद होने का गौरव प्राप्त है। 1857 के संघर्ष मे रौढ़ा सिंह के पुत्र भजन सिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। शामली तहसील लूट के रणनीतिकार भजन सिंह दिलावरे ही थे। इस क्षेत्र मे 1857 के स्वाधीनता संघर्ष की बागडौर भजन सिंह और मोहर सिंह (शामली) के हाथ मे थी। 1857 के संघर्ष मे भजन सिंह की भूमिका के कारण ही अंग्रेज़ सरकार ने सुजानखेड़ी गाँव को तबाह कर दिया था । फलस्वरूप गाँव वासियों ने हथछोया की आधुनिक बस्ती मे स्थानांतरण कर लिया।
इस प्रकार हथछोया की वर्तमान बस्ती, सुजानखेड़ी से हथछोया मे बस्ती विस्थापन के कारण अस्तित्व मे आई।
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मुगलकाल में हथछोया:
परवर्ती मुगलकाल में हथछोया मुगल शासक द्वारा सूफी संत अब्दुल कद्दुस गंगोही को सनद के रूप में प्राप्त एक राजस्व ग्राम था।शेख कद्दूस ने अपने नाती पीरजादा शेख सैय्यद अली को सौंपा था ताकि वह यहां से खराज (भू राजस्व) की वसूली कर सके।हथछोया का लगभग 16000 बीघे का रकबा था जिसमें करीब 3000 बीघा का रकबा जमींदार रोढ़ा सिंह की मिल्कियत था।
पीरज़ादों पर दिलावरों का आक्रमण एवं धर्म रक्ष------------
# सुनील सत्यम
