सुजानखेड़ी..में बगिया

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गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

हथछोया की हस्तियाँ-1 "डॉ. सुशील उपाध्याय"

अपने ब्लॉग पर मै "हथछोया की हस्तियाँ"
शीर्षक से  स्तम्भ शुरू करने जा रहा हूँ। आप हथछोया की अपने क्षेत्र में स्वयं के संघर्ष के बल पर आगे बढ़ने वाली हस्ती का साक्षात्कार करके यहाँ पोस्ट कर सकते है। यह जरुरी है ताकि हमारी भावी पीढियां प्रेरणा ले सकें.
इस सीरीज के अंतर्गत आपको हथछोया की एक ऐसी ही हस्ती से परिचित कराया जा रहा है जिसने अपने संघर्ष के दम पर सफलता को मजबूर कर दिया चरण वंदना के लिए, इस हस्ती का नाम है डॉ. सुशील उपाध्याय..

हथछोया की हस्तियां-1
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डॉ.सुशील उपाध्याय
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सुशील जी का जन्म गाँव के उपाध्याय परिवार में श्री सुल्तान सिंह के घर में हुआ था.आपका बचपन एवं किशोरावस्था बेहद अभाव में व्यतीत हुआ.पारिवारिक आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नही थी, सन्घर्ष भी बालक सुशील के साथ-साथ बड़े होने लगे.घर का सबसे बड़ा पुत्र होने के नाते परिवार की आजीविका में सहयोग करने का नैतिक दायित्व भी आपके कंधों पर समय से पहले ही आ गया। आजीविका के नाम पर पिताजी की गाँव में ही किराने की छोटी सी दुकान थी या फिर गाँव के काश्तकारों के खेतों में खेतिहर के रूप में मजदूरी.बालक सुशील स्कूल के बाद का समय अपनी दुकान पर बिताते और छुट्टी में खेत मजदूर के रूप में काम करके परिवार चलाने में अपने पिताजी का हाथ बटाते थे। इस पेट के संघर्ष का परिणाम यह हुआ कि बालक सुशील बाल्यावस्था से सीधे परिपक्वावस्था में जा पहुंचे.जिन कक्षाओं में छात्र पाठ्यक्रम की कविताओं और गद्य का ठीक से अर्थ भी नहीं जान पाते है उस समय सुशील उपाध्याय की रचनाएँ भारत के प्रतिष्ठित अख़बार दैनिक हिंदुस्तान में छपने लगी थी.
   सुशील उपाध्याय ने गाँव से अपनी प्राथमिक एवं जूनियर माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की। शामली जनपद के थानाभवन स्थित लाला लाजपत राय इंटर कालेज से 1987 में 10वीं तथा 1989 में इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की।यही वह समय था जब 1988-89 में दैनिक हिंदुस्तान में आपकी अनेक रचनाएँ प्रकाशित होने लगी थी। पाठक बड़ी रुचि के साथ आपको पढने,समझने लगे। इसी समय आकाशवाणी दिल्ली से भी आपकी कई रचनाएँ प्रसारित हुई,जो मंजे हुए पत्रकारों का भी सिर्फ सपना ही हुआ करती थी।
    1989-90 में सुशील उपाध्याय ने बी.एस.सी. में प्रवेश ले लिया, लेकिन परिवार की ख़राब आर्थिक स्थिति के कारण प्रथम वर्ष में ही कालेज छोड़ना पड़ा. सुशील ने हार नहीं मानी और संघर्ष की कंटीली डगर पर चलते रहने का फैसला किया। फैसला किया कि कमाई के साथ साथ पढाई भी की जाएगी। अब आप दुकान के साथ साथ मजदूरी करके भी आय करने लगे। परिवार का खर्च चलाने के बाद जो भी पैसा बचता
उससे अपने लिए जरुरी पुस्तकें खरीदते और अपनी फ़ीस भरते। साथ ही ट्यूशन से भी अपने संघर्ष के लिए जरुरी उर्जा संजोने का कोई मौका सुशील नही छोड़ते थे।
प्राइवेट बी.ए. करने के बाद सुशील उपाध्याय ने M.A.M.C (पत्रकारिता स्नातकोत्तर) में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, हरयाणा में प्रवेश लिया, और गोल्ड मेडल प्राप्त किया। गुरुकुल कांगड़ी हरद्वार से हिंदी में एम्.ए. किया और उसमे भी स्वर्ण पदक प्राप्त किया।
2006 में सुशील उपाध्याय ने डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त की।
   एक व्यवसायिक पत्रकार के रूप में आपने वर्ष 1994 में दैनिक नवभारत, भोपाल से की। 1995 में आपने दैनिक अमर उजाला, मुज़फ्फरनगर में नौकरी प्राप्त की तथा 1996 में अमर उजाला, मेरठ में आप स्थानांतरित हो गए, कुछ दिन बाद पुनः आप अमर उजाला मुज़फ्फरनगर में आ गए। 1997 में रूडकी में अमर उजाला के ब्यूरो चीफ के रूप में आप को भेजा गया, जहाँ अपनी मेहनत के बल पर आप ने अमर उजाला को प्रथम स्थान पर ला खड़ा किया।पत्रकारिता के साथ सुशील की अध्ययन की भूख भी कम नही हुई।1995 में मेरठ से बी.एड. की उपाधि भी आपने अर्जित की।
पीएच.डी. के दौरान ही आपने जामिया उर्दू अलीगढ संस्थान से उर्दू में स्नातक उपाधि "हबीब ए कामिल" भी प्राप्त की। सन 2008 में पत्रकारिता एवं सन 2010 में हिंदी विषय में आपने UGC-NET की ।
विभिन्न विषयों पर अपने अनेक रचनाएँ की है।
आपकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं:
1 सम्पादकीय-दो टूक (दैनिक हिंदुस्तान)
2 व्यवहारिक पत्रकारिता
3व्यवसायिक पत्रकारिता
4 पाँच एकांकी
                                                                                  परीक्षा पास करके राष्ट्रीय पात्रता प्राप्त की।