सुजानखेड़ी..में बगिया

सुजानखेड़ी..में बगिया

सोमवार, 18 मई 2015

हथछोया मे बस्ती निर्माण ॥

सुजानखेडी से हथछोया में बस्ती-विस्थापन
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सुजानखेडी आज के राजस्व दस्तावेजों में एक गैर-आबाद गाँव के रूप में दर्ज है.यहाँ की अधिकांश भूमि रेतीली है इसलिए इस क्षेत्र को सामान्यतः लोग मारू (मरुभूमि) भी कहते है.इस क्षेत्र की मिट्टी की सरंचना को देखकर यह स्पष्ठ हो जाता है कि 160-200 वर्ष पूर्व भी इस क्षेत्र में सतही जल का अभाव रहा होगा.ऐसा मानने का एक और स्पष्ट कारण यह है कि इस क्षेत्र की लगभग 1 किलोमीटर की परिधि में कोई तालाब नहीं था.किसी राजस्व दस्तावेज से भी इस बात की पुष्टि नहीं होती है कि यहाँ कभी कोई तालाब रहा हो.सुजानखेडी से हथछोया में बस्ती-विस्थापन के दो मूल कारण रहे:-
1. सुजानखेड़ी में जलाभाव
2. 1824 का किसान विद्रोह

सुजानखेड़ी मे जलाभाव -
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सुजानखेड़ी मे जलाभाव इस क्षेत्र से वर्तमान हथछोया की बस्ती के निर्माण के लिए एक बड़ा कारण माना जा सकता है। सुजानखेड़ी के आसपास के लगभग एक किलोमीटर के क्षेत्र मे तालाब के कोई साक्ष्य  नहीं मिलते है, यमुना नदी की यहाँ से दूरी लगभग 15 किलोमीटर है, सुजानखेड़ी की बस्ती का अस्तित्व  दिलावरों (हमारे) खेत के स्थान पर माना जाता है।  एक बात तो तय है कि सुजानखेड़ी से हथछोया मे बस्ती विस्थापन जल्दबाज़ी मे नहीं हुआ था और न ही महामारी फैलाना आदि ही इस विस्थापन का जनक था।  वास्तव मे सुजानखेड़ी के स्थान पर किसी अधिवास के कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं पाये गए है। इस स्थान से कोई मृदभांड या मानव कंकाल जैसा साक्ष्य न मिल पाना इस बात का प्रमाण है कि यहाँ से हथछोया मे बस्ती विस्थापन बड़े आराम से,सुविधाजनक तरीके से और पूर्णतः हुआ था। यानि बस्ती वासी यहाँ से हथछोया विस्थापित होते समय अपने साथ एक एक ईंट तक ले गए और तत्कालीन बस्ती-स्थल पर पीछे बस्ती का कोई अवशेष नहीं छोड़कर गए।
हमारे दादा फूलसिंह दिलावरे बताते थे कि उन्होने अपने दादा से सुना है कि सुजानखेड़ी मे पानी कि भारी किल्लत हो गई थी और आसपास कोई तलब न होने के कारण लोग बहुत परेशान थे। वर्तमान हथछोया के स्थान पर बहुत घने जंगल थे जहां कोई आता जाता नहीं था क्योंकि भयानक जंगली जानवरों का डर हमेशा बना रहता था। बताते है कि एक बार किसी का झौटा ( भैंसा) खुलकर जंगल की और चला गया, जब वह शाम को अपना पेट भर कर वापस लौटा तो गारे-पानी मे सना (भीगा) हुआ था। उसे देखकर लोगो की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। अगले दिन सुबह उस झौटे को फिर से खोला गया और गाँव के लोगो ने समूह बनाकर उसका पीछा किया तो वह वर्तमान हथछोया के जंगलों की और गया और जंगल मे एक विशाल तालाब पर जाकर पानी मे घुस गया। हजारों बीघे के तलब को देखकर सुजानखेडी वासियों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा और उन्होने तत्काल ही उस तलाब के किनारे बस्ती विस्थापन का फैसला ले लिया। यह विस्थापन हथछोया मे सुनियोजित नहीं था क्योंकि जिसको जहां उपयुक्त जगह दिखी उसने वहीं घर बना लिए। हड़प्पा बस्ती जैसी सुनियोजियत बस्ती सुजानखेड़ी वासी नहीं बना पाये। इसका मूल कारण यह था कि वे पानी कि किल्लत के कारण हड़बड़ी मे थे अतः आनन फानन मे जिसको जहां अनुकूलतम जगह दिखी उसने वही पर बस जाने का निर्णय कर लिया। कुछ दिनों मे सुजानखेड़ी से अपने अधिवासों मे प्रयुक्त समग्र निर्माण सामाग्री का उन्होने हथछोया लाकर पुनः प्रयोग अपने अधिवास निर्माण मे कर लिया।

*2 1857 का स्वाधीनता संग्राम
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हथछोया मे सुजानखेड़ी से बस्ती विस्थापन के पीछे 1824 का किसान विद्रोह और 1857 का स्वाधीनता संग्राम भी एक बड़ा कारण माना जा सकता है। सन 1824 मे हुए कुंजा बहादुरपुर किसान विद्रोह की लपटे इस समस्त क्षेत्र मे फैल गई थी। सुजानखेड़ी के रौढ़ा सिंह दिलवारे, कुंजा बहादुरपुर के विजय सिंह के नजदीकी रिश्तेदार थे, रौढ़ा सिंह के पुत्र भजन सिंह कुंजा मे ब्याहे थे। अतः 1824 के किसान विद्रोह मे रौढ़ा सिंह ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। इस विद्रोह के सूत्रधारों मे से एक होने के कारण रौढ़ा सिंह को अंग्रेज़ सरकार ने मौत की सजा सुनाई थी। इस प्रकार रौढ़ा सिंह दिलावरे को 1824 के किसान विद्रोह मे शहीद होने का गौरव प्राप्त है। 1857 के संघर्ष मे रौढ़ा सिंह के पुत्र भजन सिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। शामली तहसील लूट के रणनीतिकार भजन सिंह दिलावरे ही थे। इस क्षेत्र मे 1857 के स्वाधीनता संघर्ष की बागडौर भजन सिंह और मोहर सिंह (शामली) के हाथ मे थी। 1857 के संघर्ष मे भजन सिंह की भूमिका के कारण ही अंग्रेज़ सरकार ने सुजानखेड़ी गाँव को तबाह कर दिया था । फलस्वरूप गाँव वासियों ने हथछोया की आधुनिक बस्ती मे स्थानांतरण कर लिया।
   इस प्रकार हथछोया की वर्तमान बस्ती, सुजानखेड़ी से हथछोया मे बस्ती विस्थापन के कारण अस्तित्व मे आई।          
                                                               # सुनील सत्यम