सुजानखेड़ी..में बगिया

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गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

खेत में दीपावली पर कुल देवताओं की पूजा

छायाचित्र

सपत्नीक स्वचित्र

दिलावरों का पीरज़ादों पर आक्रमण

पीरज़ादों पर दिलावरों का आक्रमण एवं धर्म रक्षा

@सुनील सत्यम/ डॉ गजेंद्र सिंह

-------अतीत-मंथन--------------------


भारत में इस्लाम के प्रचार का अघोषित विभाग था सूफी फकीरों का।ये सूफी फ़क़ीर अक्सर छल प्रयोग अथवा लालच देकर हिंदुओं का इस्लाम में धर्मान्तरण कराने का कार्य करते थे।धर्मांतरण इनका प्रमुख उद्देश्य था।चिश्ती सिलसिले ने भारत में छल के द्वारा सर्वाधिक हिंदुओं का धर्मांतरण किया।चिश्ती सूफियों की खानकाहे कव्वाली गायन का बड़ा केंद्र होती थी,भारत में कथित गंगा-जमुनी तहजीब इसी सिलसिले की कल्पना की उपज है।इन्होंने हिंदुओं को खानकाहों में लाकर,छल से उन्हें प्रसाद के नाम पर गौ मांस खिलाकर धर्मान्तरण कराया।इसके अतिरिक्त जजिया से बचाव के लालच में कुछ जमींदारों ने धर्मान्तरण स्वीकार किया तो कुछ ने आर्थिक लालच में इस्लाम अपनाया।शासकों ने तलवार को धर्मान्तरण का जरिया बनाया।लेकिन सूफ़ियों ने छल एवं लालच के द्वारा ही अधिकांश धर्मान्तरण कराया।

यमुना खादर का हथछोया गांव चिश्ती सूफी सिलसिले के प्रसिद्ध सूफी शेख सैयद अब्दुल कद्दुस गंगोही के नाती , पीरज़ादा सैयद अली को मिला एक राजस्व ग्राम था।कद्दुस का केंद्र गंगोह था।आज भी गंगोह में उसकी मजार है।इस मजार पर हजारों की संख्या में मूर्ख हिन्दू चादर चढ़ाने जाते हैं। असल में पीरज़ादे, सूफी सन्तों (पीर) की जायज़/नाज़ायज़ औलाद होते थे।अक्सर ये सूफी अपनी इन संतानों को कोई गाँव तत्कालीन हुक्मरानों से दिलवा दिया करते थे जिसकी समस्त मालगुज़ारी इन पीरज़ादों द्वारा ही वसूली जाती थी।
हथछोया में इन पीरज़ादों दो डेरे थे जिनमे पीरज़ादे ठहरा करते थे।एक डेरा गुल्ही के किनारे, पुरानी मस्जिद के स्थान पर था जहाँ आजकल अबलु एवम् मोम्मद का परिवार रहता है।दूसरा डेरा पुरानी डाब्बर के किनारे पर था जो जुगल किशोर दिलावरे के घेर के बराबर में था जहाँ आजकल मामचंद पंडित का परिवार रहता है।इस डेरे को हथछोया एवं सुजानखेड़ी का राजस्व लेने का सनद प्राप्त था।इसका प्रमुख पीरज़ादा शेख सैयद अली था, जो अब्दुल कद्दुस गंगोही का नाती था।पूरा गाँव शेख सैयद अली को देखते ही झुककर सलाम करता था।गाँव के दीवानी और फौजदारी के मामलों का निस्तारण पीरज़ादा सैय्यद अली की निजामत के द्वारा किया जाता था।मुगलकाल में ये लोग "सद्र उस सुदूर" (धार्मिक मामलों का विभाग) के तहत कार्य करते थे जिनका प्रमुख कार्य शरीयत का अनुपालन करवाना होता था।अक्सर पीरज़ादे मुहतसिब के तौर पर नियुक्त होते थे। ‘शरियत’ के प्रतिकूल कार्य करने वालों को रोकना, आम जनता (विषेषकर मुस्लिम ) को दुश्चरित्रता से बचाना, सार्वजनिक सदाचार की देखभाल करना, शराब, भांग के उपयोग पर रोक लगाना, जुए के खेल को प्रतिबन्धत करना, मंदिरों को तुड़वाना (औरंगज़ेब के समय में),हिंदुओं का धर्मपरिवर्तन करवाना आदि मुहतसिब के महत्त्वपूर्ण कार्य थे। इस पद की स्थापना औरंगज़ेब ने की थी। ये पीरज़ादे गाँव में ही अपना कैम्प किया करते थे जिसे अक्सर डेरा कहा जाता था।पीरज़ादों के कैम्प में अक्सर चिश्ती एवं नक्शबंदी सिलसिले के सूफियों का आना होता रहता था।उन दिनों निकटवर्ती कस्बा गंगोह सूफी संतों का बड़ा केंद्र था।गंगोह में चिश्ती सिलसिले के प्रमुख सूफी संत "शेख शाह अब्दुल कद्दुस गंगोही" की खानकाह थी।अब्दुल कद्दुस गंगोही प्राणायाम एवं अन्य यौगिक क्रियाओं में पारंगत था।वह "अलखगिरी" उपनाम से लिखा भी करते था इसलिए "अलख" नाम से भी जाने जाते थे।इस कारण उन्हें हिंदुओं के गोरखपंथी सन्तों से अलग करना सामान्य जन के लिए भ्रमित करने वाला था।गोरखपंथी भी "अलख निरंजन" का उदघोष करते हैं।सूफी संतों ने हिन्दू धर्म से प्राणायाम,यौगिक क्रियाएं एवं हठयोग जैसी पद्दत्तियाँ ज्यों की त्यों अपना ली थी।अब्दुल कद्दुस,शाह साबिर कलियारी का शिष्य था और चिश्ती सिलसिले का सूफी था।सहारनपुर,मुज़फ्फरनगर और शामली के क्षेत्र में चिश्ती सिलसिले ने हिंदुओं के धर्मांतरण की एक बड़ी मुहिम चलाई।धर्मांतरण के औरंगजेबी और सूफी तरीके में एक बड़ा अंतर था कि सूफियों ने छल एवं शांतिपूर्ण तरीके से गरीबों को आर्थिक मदद का लालच देकर धर्मांतरण की प्रक्रिया को सम्पन्न किया ।सूफी अपने इस प्रयास में काफी सफल भी रहे।सूफी निजामुद्दीन औलिया के अलावा कोई भी सूफी अविवाहित नही था।ये गृहस्थ सन्त थे।समस्त मानवीय अवगुणों से ये भी अछूते नही थे।अतः धर्म प्रचार के सिलसिले में भ्रमण के दौरान इन्होंने विवाहेत्तर संबंध स्थापित किये जिससे पैदा संताने पीरज़ादा कहलाये।बादशाही दरबार मे अपने संबंधों का लाभ उठाकर इन्होंने अपनी उन नाजायज़ संतान "पीरज़ादों" को छोटी छोटी जागीर आवंटित करा दी।जागीरी इलाके में ही रहकर ये पीरज़ादे लगान वसूली के साथ साथ जोर जबरदस्ती स्थानीय लोगों का धर्मान्तरण करते थे।हथछोया में भी इन्हीं पीरज़ादों द्वारा कई हिन्दू गुर्जर परिवारों को छल एवं लालच के द्वारा इस्लाम धर्म मे परिवर्तित किया।लेकिन जमींदार रोढ़ा सिंह के प्रबल प्रतिरोध के कारण पीरज़ादों को हथछोया के एक हिन्दू परिवार के अलावा धर्म परिवर्तन में अधिक सफलता नही मिल पाई।वे गांव के एक गुर्जर परिवारों को छोड़कर अन्य किसी भी बिरादरी के किसी भी परिवार के इस्लाम मे धर्मान्तरण में सफलता प्राप्त नही कर पाए।
जमींदार रोढ़ा सिंह का परिवार अपने अक्खड़पन एवम् दबंगई के लिए दूर दूर तक मशहूर था।उन्होंने कभी भी पीरजादों के सामने सिर नहीं झुकाया ।इतना ही नहीं वे हमेशा पीरज़ादों के हुक्मों की नाफरमानी करते थे।पीरज़ादों ने लालच,दबंगई,जोर जबरदस्ती समस्त नैतिक अनैतिक तरीकों से जमींदार रोढ़ा सिंह को इस्लाम मे धर्मांतरित करने के प्रयास किये।रोढ़ा सिंह की दबंगई एवं अक्खड़पन के कारण पीरज़ादों का विश्वास था कि यदि वे उनका धर्म परिवर्तन करने में सफल हो गए तो क्षेत्र में इस बात का एक बड़ा सन्देश जाएगा और पीरज़ादों को धर्मांतरण की मुहिम चलाने के लिए एक बड़ा नैतिक बल प्राप्त होगा।पीरज़ादों का कोई हथकंडा जमींदार परिवार के धर्मपरिवर्तन के लिए काम नही आया। इस कारण पीरज़ादा सैय्यद अली, जमींदार रोढ़ा सिंह परिवार को नापसंद करने लगा और उसने अपनी सारी शक्ति उनके परिवार के उत्पीड़न एवं सार्वजनिक रुप से अपमानित करने पर लगा दी।सैय्यद अली ने जमींदार के लिए फरमान जारी किया कि वह उनके डेरे पर हाज़िरी दे और उन्हें सलाम करे तथा उनके हुक्म की तामीली करें।लेकिन जमींदार किसी भी कीमत पर झुकने को तैयार नही था।
रोढ़ा सिंह परिवार के पास एक लगभग 50 मीटर लम्बी दहलीज़ (गैलरी) थी।वे शरणागत वत्सल थे अर्थात उनके पास यदि किसी ने शरण लेली तो उसकी रक्षा वे अपनी जान पर खेलकर करते थे।यदि किसी ने किसी व्यक्ति की हत्या करने के बाद भी उनके पास आकर शरण लेली तो किसी की मज़ाल नहीं थी कि उस शरणार्थी का कोई बाल भी बांका कर सके।लम्बी दहलीज़ अक्सर एक सुरक्षित शरणगाह का काम करती थी। इस बात से पीरज़ादा सैय्यद अली न केवल परेशान था बल्कि जमींदार के बागी तेवर से अपनी सुरक्षा को लेकर सजग भी रहता था।
बहुत सोच विचार करने के बाद पीरज़ादों ने तय किया कि गाँव के मुख्यद्वार, जो डेरे के पास ही था, पर एक दीवार का निर्माण कराया जाये जिसमे एक मोरी (छोटा दरवाजा) बनवाई जाए ताकि गाँव के अंदर बाहर जाने के लिए हर किसी को मोरी से गुजरना पड़े और मोरी से गुजरते समय हर किसी को अपना सिर झुकाना पड़े।इस बात की खबर जब जमींदार रोढ़ा सिंह को लगी तो उन्होंने तय किया कि मोरी में से पार निकलने के लिए सिर की बजाय पैर के बल घुसा जाये ताकि उन्हें सिर न झुकाना पड़े।इस प्रकार दिलावरों ने कभी भी पीरज़ादों के सामने समर्पण करना और धर्मपरिवर्तन करना स्वीकार नही किया।
इस घटना से पीरज़ादों और जमींदार के बीच काफी कड़वाहट आ गई।रोढ़ा सिंह भी पीरज़ादों से गांव को हमेशा के लिए मुक्त कराने की योजना पर कार्य कर रहे थे। पीरज़ादों के घर पीसने के लिए गाँव की दलित महिलाएं सुबह सुबह जाया करती थी।रोढ़ा सिंह एवं उनके पुत्र भजन सिंह ने एक योजना बनाई।उन्होंने पिसाई करने वाली एक दलित महिला को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि जब वह सुबह पीरज़ादे के घर गेंहू पीसने जायेगी तो उसे शौर मचाना है कि पीरज़ादा उसके साथ जबरदस्ती कर बलात्कार करने की कोशिश कर रहा है। उस महिला ने अगले दिन सुबह ऐसा ही किया। पहले से तैयार बैठे जमींदार रोढ़ा सिंह परिवार के लोगों ने योजनाबध्द तरीके से अन्य ग्रामीण जनों के साथ उस महिला की मदद के करने के लिए हथियारों सहित पीरज़ादों के डेरे पर आक्रमण कर दिया जिससे उनमे हड़कम्प मच गया। पीरज़ादा शेख सैयद अली ने भागकर जान बचानी चाही लेकिन मौके पर मारा गया बाकी ने भागकर अपनी प्राणरक्षा की।तय योजनानुसार दोनों डेरों पर एक साथ आक्रमण किया गया था। सुबह होने तक दोनों डेरों से पीरज़ादे भाग चुके थे।ग्रामीणों ने डेरों में जमकर लूटपाट की।शेख सैयद अली की लाश कई दिन तक जंगल में पड़ी रही।आते जाते लोग उसकी लाश को ठोकर मारते थे।इसी कारण इस जगह का नाम भी "ठोकरों वाला जंगल" (बाद में टोखरों) पड़ गया। कोई सैयद अली की लाश तक लेने के लिए नही आया।कई दिन बाद, जमींदार रोढ़ा सिंह और उनके साथी,सैय्यद अली की लाश को घसीटकर लाये और नाले के किनारे गड्ढा खोदकर दबा दिया तथा उसके ऊपर ईंट रख दी।कालान्तर में वर्षों बाद कुछ लोगों ने उसे मजार समझकर पूजना ही शुरू कर दिया।सैयद अली की मजार बिगड़कर सैदली कहलाने लगी।पीरजादों पर आक्रमण और शेख सैय्यद अली की हत्या की घटना के बाद पीरज़ादों ने दोबारा से कभी हथछोया में वापस आने का प्रयास नही किया। इस घटना के बाद हथछोया को पीरज़ादों के आतंक से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई और जमींदार रोढ़ा सिंह की ख्याति दूर दूर तक फ़ैल गई।इसी घटना के कारण गांव के लोगों ने जमींदार रोढ़ा सिंह को "दिलावरा-अर्थात दिल वाला" की उपाधि से नवाजा।इसके बाद जमींदार परिवार दिलावरे नाम से जाना जाने लगा।
हथछोया में कुछ गुर्जर परिवारों का धर्म परिवर्तन क्योंकि सूफियों द्वारा करवाया गया था अतः सूफीमत में हिन्दू एवं बौद्ध पद्दतियों जैसे प्रणायाम,बौद्ध,पीरी-मुरीदी, रहस्यवाद, हठयोग, ध्यान,संगीत(समा) आदि का मिश्रण था इसलिए इस्लाम मे परिवर्तित गुर्जर परिवारों में कभी धार्मिक कट्टरपन जगह नही बना पाया।फलस्वरूप हिन्दू गुर्जर और धर्मांतरित मुस्लिम गुर्जर परिवारों में आज भी वही समन्वय एवं प्यार देखने को मिलता है।भारतीय इस्लाम पर सूफी आंदोलन का एक सकारात्मक प्रभाव यह है कि भारतीय मुस्लिम आज भी शांति एवं अमन पसन्द है एवं भाई चारे में विश्वास रखता है।आजकल कुछ नवयुवक जरूर कट्टर इस्लामी पन्थ "अहले-हदीस/सल्फी/वहाबी की चपेट में आकर नफरत की विचारधारा को गले लगा रहे हैं।तमाम नकरात्मताओं के बावजूद हिंदुत्व के अतिरिक्त सूफ़ियत में ही वह ताकत है जो दुनिया को कट्टर इस्लामी वहाबी आतंकवाद के साये से बाहर निकाल सकता है।सूफीमत धार्मिक समन्वय का प्रतिफल है जिसमें हिंदुत्व, इस्लाम और बौद्ध धर्म का वह सारतत्व निहित है जो दुनिया को शांति का संदेश देता है।।

(प्रस्तुत लेख लेखक द्वय का संयुक्त शौध-पत्र है)