सुजानखेड़ी..में बगिया
रविवार, 21 मई 2017
सोमवार, 1 मई 2017
नई पौध वाला मेरा गांव
पिता फैसला न करते तो बहनें अनपढ़ होती!
@ डॉ सुशील उपाध्याय
कल आश्चर्य से भर गया। गांव से फोन आया कि चार लड़कियां देहरादून परीक्षा देने आ रही हैं। लौटते वक्त देर हो जाएगी इसलिए उन्हें वहीं रोक लेना। आश्चर्य इसलिए हुआ कि जिस गांव को पीछे छोड़कर आया था, ये उसका नया रूप है। परीक्षा खत्म होने के बाद एक लड़की ने फोन किया तो उसे घर का पता बता दिया और वे चारों बिना राह भटके शाम को घर पहुंच गई। संयोग से मैं उनमें से किसी को नहीं पहचानता था, ये मेरे गांव छोड़ने के बाद पैदा हुई पीढ़ी है। पुराने संदर्भाें के आधार पर मैंने उनसे अपने रिश्ते को समझा और मैं चारों का चाचा निकला। हालांकि, चारों लड़कियां अंकल कहकर संबोधित कर रही थीं। चारों गांव के पास के काॅलेज से बीए कर रही हैं और इससे पहले भी नौकरी से संबंधित इम्तहानों के लिए बड़े शहरों में जाती रही हैं।
ये बड़े बदलाव का संकेत है। इनके परिवारों में से कोई साथ नहीं आया था, लड़कियों पर भरोसा किया गया। ये चारों ही पहली बार देहरादून आई थीं। उन्हें खुद अपना परीक्षा केंद्र ढूंढा और खुद ही वे संपर्क भी तलाशे, जिनसे कोई मदद मिल सकती हो। शहरी समझ के लिहाज से ये कोई बड़ी घटना नहीं दिखती। पर, मुझे लगता कि एक पीढ़ी के भीतर कितना कुछ बदल गया। मेरे पिताजी बताते हैं कि अब से करीब 50 साल पहले जब उन्होंने मेरी बड़ी बहन को स्कूल भेजा था तो मेरे बाबा ने काफी विरोध गया था। ये वो ही बाबा थे, जिन्होंने आजादी से पहले खुद भी अक्षर ज्ञान पाया था और जिन्होंने अपने चारों बेटों को पढ़ाने के लिए भरसक कोशिश की थी, लेकिन वो मेरी बहन की पढ़ाई के खिलाफ थे।
पूरे खानदान मे मेरी बहन पहली ऐसी लड़की थी, जिसने स्कूल का मुंह देखा था। गांव में लाला उग्रसेन और उनके भाई जनार्दन अग्रवाल मेरे पिताजी के मित्र थे, उनकी बेटियां गांव के स्कूल में पढ़ने जाती थीं, मेरे पिता जी ने लाला जी की संगत के कारण बेटी को पढ़ाने का फैसला किया था। बाबा के विरोध के बावजूद न केवल मेरी दोनों बहनें स्कूल गई बल्कि उन्होंने अपनी हमउम्र लड़कियों के लिए भी राह हमवार की। उस पीढ़ी की कुछ ही लड़कियां अपढ़ होने के दाग से बच पाई। हालांकि, उनकी पढ़ाई मिडिल स्कूल से आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि नजदीक का इंटर काॅलेज सात-आठ किलोमीटर दूर था और आने-जाने का कोई साधन उपलब्ध नहीं था। मैं नई-नई अक्ल के जोश में कई बार अपने पिता पर सवाल खड़े करता था, लेकिन अब लगता है कि आधी सदी पहले के जिस माहौल में उन्होंने धारा के विपरीत फैसले गए थे, वे आसान कतई नहीं थे।
गांव में कुछ साल पहले इंटर काॅलेज खुला और अब मेरे मित्र, वाणिज्य कर विभाग में सहायक आयुक्त डाॅ. सुनील सत्यम गांव में डिग्री काॅलेज स्थापित करा रहे हैं। गांव में बंदिशें टूटी हैं। मेरी बहनों की पीढ़ी में ज्यादातर लड़कियों की शादियां 15-17 साल की उम्र में हो जाती थीं, लेकिन अब 22-24 साल तक लड़कियां भी पढ़ाई कर रही हैं और नौकरी पाने की कोशिश में लगी हैं। मेरे घर आई चारों लड़कियां उन परिवारों से थीं, जिनके पास बौद्धिक-शैक्षिक पृष्ठभूमि जैसा कुछ नहीं है, वे महज अपनी लगन के भरोसे जुटी हैं। एक और एक बड़ा बदलाव दिखता है, नई पीढ़ी में शहर और शहरी तौर-तरीकों को लेकर वैसा भय नहीं है, जैसा कि मेरी पीढ़ी में था। चारों लड़कियां सुबह गांव चली गई हैं। यकीन है, आने वाले दिनों में मेरे गांव की और लड़कियां अपनी सीमाओं को नए तौर पर परिभाषित करेंगी।
साभार: डॉ सुशील उपाध्याय की फेसबुक वाल से