सुजानखेड़ी..में बगिया

सुजानखेड़ी..में बगिया

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

बाबा वाला स्कूल!

उनके साथ बिताया जीवन का हर पल कितना कीमती था,इसकी कीमत उनके न होने पर आसमान छूती और अमूल्य लगती है।उनका जीवन  "सादगी का महाग्रंथ" था।उनका संघर्ष उनके आचरण से झलकता था।संपन्नता में विपन्नता को कैसे याद रखें ताकि "धन के दलदल" में अपने आप को फिसलने से बचाया जा सके यह मैंने किसी पुस्तकालय के वृहद ग्रन्थ में नही पढ़ा वरन इसका जीवन्त उदाहरण मेरे जीवन का वह प्रेरक पुरुष था जिससे मैने सीखा कि कैसे संघर्षों के द्वारा असफलताओं को बौना सिद्ध किया जा सकता है? मैंने जब से होश संभाला स्वयं को एक दुबले,जिद्दी,गुस्सैल,स्वाभिमानी,उपकारी और बेहद विनम्र व्यक्तित्व की छाया में पाया।गांव के शिवाले के अलावा मेरा एक चलता फिरता स्कूल था जिसके पाठ्यक्रम में किताबी ज्ञान की बजाय संघर्ष से दो दो हाथ करने का दैनिक प्रशिक्षण था।उस प्रशिक्षक को लोग "फूला" नाम से जानते थे।उनका वास्तविक नाम तो फूल सिंह दिलावरे था लेकिन आज़ादी के सत्तावानी संघर्ष के इनाम में मिली विपन्नता ने उन्हें "फूला' नाम दे दिया।असल में गांव में लोगों का नाम उनकी आर्थिक हैसियत से तय होता है। यदि वे और उनका परिवार धनवान रहे होते तो उनका नाम फूल सिंह के रुप में ही लिया जाता! ख़ैर मैने कभी इससे हीनता का अनुभव नही किया।दुनियावी स्कूल के बाद मेरा वह स्कूल शुरू होता था जिसके हेड मास्टर बाबा फूला थे।
शिवाले ( प्राइमरी स्कूल) से सीधे घर।घर खाना खाने के तत्काल बाद बाबा की रोटी लेकर सुजान खेड़ी खेत में जाना, यह मेरी बाल्यकाल की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा था। घर से खेत की दूरी पूरे दो किलोमीटर है।
     अक्सर मेरे परिवार के मेरे हमउम्र भी खेत में चले जाते थे।गर्मी की दोपहर में सभी व्यस्क अपना दैनिक कृषि कार्य निपटा कर खेत में अक्सर आम के पेड़ों पर खेलते थे।हमारा प्रिय खेल "कुआं डण्डा' होता था।इस खेल में पेड़ के नीचे एक छोटा घेरा बनाकर उसके अंदर एक डण्डा रख दिया जाता था जिसकी रक्षा के लिए एक प्रहरी नियुक्त किया जाता था।बाकी खिलाड़ी पेड़ पर अपनी अपनी जगह लेते थे। प्रहरी खिलाड़ी को डंडे की सुरक्षा करते हुए पेड़ पर बैठे हुआ को छूना होता था।पेड़ पर बैठे हुए खिलाड़ियों का लक्ष्य नीचे कूदकर,प्रहरी से बचते हुए डंडे को पैर के नीचे से निकालकर छूना होता था।इस प्रकार पॉइंट्स बनाने थे।
जब कभी बाबा जी खेत में नही होते थे तो ही मुझे यह खेल खेलने का मौका मिलता था।इस खेल के रोमांच का हम आनंद लेते थे लेकिन बाबा जी इसके खतरों से भिज्ञ थे इसलिए मुझे इससे दूर रखने के लिए वे हमेशा पशु चराने में लगा देते थे और खुद नाली में जमी घास को साफ करने में लगे रहते थे ताकि मैं मौका पाकर पशु खेत मे बांधकर कही खेलने फरार न हो जाऊं।

जीएसटी: अधिकारी तैयार,सिस्टम बीमार

जीएसटी भारत मे आज़ादी के बाद बेहद महत्वाकांक्षी एवं आशावादी कर सुधार कानून है।इस कानून में देश की अर्थव्यवस्था को चार चांद लगाने के लिए सारी खूबियां मौजूद हैं।राज्य कर विभागों के अधिकारी 2016 के प्रारम्भ से ही जीएसटी को प्रभावी तरीके से लागू कराने के लिए वाणिज्यकर विभाग के अधिकारियों ने दिन रात मेहनत की और अपने अपने क्षेत्र में वर्तमान टिन धारक व्यापारियों के पंजीयन को पहले पैन नम्बर के साथ जोड़ा।लाखों व्यापारियों के पैन सम्बंधित आंकड़ों के एनएसडीएल के साथ सम्बद्ध करने के लिए अधिकारियों ने दिन रात मेहनत की ।आई बाल चेकिंग करके कई माह तक पैन अपडेशन का कार्य अभियान के रूप में चलाया गया।सरकारी विभागों की टैन संख्या को उनके टिन से जोड़ा गया।इस कार्य के लिए वाणिज्यकर विभाग के वाणिज्य कर अधिकारी, असिस्टेंट कमिशनर एवं डिप्टी कमिश्नर स्तर के अधिकारियों ने विशेष अभियान चलाया।इसके लिए व्यापारी के प्रतिष्ठानों पर भी अधिकारी गए ताकि कोई भी व्यापारी पैन अपडेशन से छूटे नही।अंततः अधिकारियों ने कर दिखाया। जीएसटी नेटवर्क के पास समस्त व्यापारियों का डेटा पहुंचा और सभी पंजीकृत व्यापारियों को जीएसटी के लिए माइग्रेट कराने के लिए जीएसटी नेटवर्क द्वारा पैन आधारित प्रोविजनल आईडी एवं पासवर्ड सृजित किये गए।यही प्रोविशनल आईडी व्यापारियों का जीएसटी नम्बर होना था।जीएसटी नेटवर्क द्वारा कई चरणों में अधिकारियों के कॉमर्शियल टैक्स लॉगिन पर ये प्रोविजनल आईडी एवं पासवर्ड भेजे गए।अधिकरियों द्वारा इन आईडी को जीएसटी पोर्टल पर एक्टिव एवं माइग्रेट कराने के लिए अपने अपने क्षेत्रानुसार कैम्प आयोजित किये गए,व्यारियों को पूरा सहयोग किया।अधिकरियो ने भरी दोपहरी में डोर टू डोर घूम कर भी प्रोविशनल आईडी वितरित की गई।व्यापारियों को जागरूक करने के लिए प्रचार के अनेक साधनों का अधिकरियों ने प्रयोग किया जैसे पम्पलेट,बैनर,कैम्प, यदि।उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार के वाणिज्य कर विभाग के अधिकरियों ने बिना किसी बजटीय सहायता के यह कार्य अपने वेतन से खर्च करके किया गया।व्यापारियों को जीएसटी पोर्टल पर माइग्रेट करने के लिए व्यापारियों के लिए अनेक प्रशिक्षण का आयोजन भी किया गया।इसके अतिरिक्त अधिकारियों ने अपने दफ्तरों में भी माइग्रेशन का कार्य न केवल निशुल्क किया वरण व्यापारियों को चाय पानी पिलाकर उनके आतिथ्य में भी कोई कमी नही छोड़ी।इसके लिए भी कोई बजटीय प्रावधान नही था।