पुराना इतिहास है हथछोया का.इसका इतिहास जानने के लिए हमें इतिहास के धूल-धूसरित पन्नो को खंगालना होगा,जो बहुत श्रम साध्य और शौध का विषय है.अपने इतिहास ज्ञान,इतिहास-लेखन की तकनीकियों और जनश्रुतियों का सहारा लेकर भी हम हथछोया के अतीत पर दृष्टिपात कर सकते हैं.
हथछोया का शाब्दिक अर्थ:
हथछोया मूलतः दो शब्दों से मिलकर बना है-
हद (सीमा,अति)+चोया (जल स्तर). यह इस शब्द का संधिविच्छेद न होकर स्थानीय भाषा के दो शब्दों का एक साथ मिलकर प्रयोग है.
अर्थात ऐसा क्षेत्र जहाँ जल स्तर बहुत ऊपर ही उपलब्ध हो. गाँव की वर्तमान बस्ती के स्थान पर विशाल भौगोलिक क्षेत्र पर तालाब होने के कारण भूमिगत जल स्तर (चोया) की हद भूसतह के एकदम समीपस्थ थी.इसी कारण हद्चोया शब्द की उत्पत्ति हुई जो कालांतर में बिगड़कर हथछोया बन गया.
वास्तव में हथछोया के अधिवास का अध्ययन कई पहलुओं पर हमारा ध्यान केन्द्रित कर देता है, जो काफी मजेदार है.
हथछोया के बस्ती प्रारूप और प्रकार का विश्लेषण करे तो हम आसानी से समझ सकते है कि इस गाँव का इतिहास 160-200 वर्षो से अधिक पुराना नहीं होना चाहिए..इसका कारण स्पष्ट रूप से यह है कि यह वह समय है जब भवन निर्माण में लखौरी ईंटो का प्रयोग होता था..लखौरी ईंटो से निर्मित ही कुछ मकान/घर
इस गाँव में मिलते है जो आजकल अवशेष मात्र है.मुख्य रूप से गाँव की प्राचीन चौपाल जो 50 वर्ष से पुरानी नहीं है और लाला गीताराम का घर लखौरी ईंटो से बना है.इसके अतिरिक्त कोई भी ऐसी सरंचना गाँव में नहीं मिलती है जो इसके अपने इतिहास को 160-200 वर्षों से पीछे ले जाती हो.
लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि गाँव की बस्ती से कहीं अधिक पुराना गाँव वासियों का इतिहास है.
हथछोया गाँव की बस्ती की स्थापना के पीछे मै " बस्ती विस्थापन" सिद्धांत को मूल कारण मानता हूँ.हडप्पा सभ्यता के पतन के लिए इतिहासकारों ने अनेक सिद्धांत दिए है. लेकिन इतिहास का जागरूक विद्यार्थी होने के कारण हड़प्पा के पतन को लेकर मेरा अपना मत है जिसे मै "बस्ती-विस्थापन" सिद्धांत कहता हूँ.मेरा मत है कि क्योंकि आज से 3000 से 4000 वर्ष पूर्व चिकित्सा सुविधाएँ सुलभ नहीं थी.उस समय महामारी और बाढ़ जैसी आपदाएं आम थी.महामारी की स्थिति में लोग अपनी बस्ती को छोड़कर समीप के ही अन्य स्थान पर विस्थापित होकर नई बस्ती बसा लेते थे.यदि हम हडप्पा कालीन बस्तियों का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि जहाँ भी हमें हड्प्पाई अधिवासों के अवशेष मिले है उनके 1-10 किलोमीटर की परिधि में ही हमे आधुनिक जीवंत बस्तियां भी मिलती है. उदाहरण के रूप में हम हथछोया और हुलास को ले सकते है. हुलास जो कि सहारनपुर जनपद में हड्प्पाई अधिवास है, के 1-5 किलोमीटर की परिधि में बरसी,टिकरोल,और मनोहरा आदि कई गाँव है.इसी प्रकार हथछोया के समीप ही स्थित "छोटी और बड़ी भेंट" तथा सुजानखेड़ी की स्थिति बस्ती विस्थापन के पक्ष में प्रमाण हैं.हुलास,बड़ी और छोटी भेंट, एवं सुजानखेडी के पतन और बरसी,टिकरोल,मनोहरा तथा हथछोया की उतपत्ति में निकट का सम्बन्ध है.आज हमारे पास यदि अवशिष्ट बस्तियों के पतन के साक्ष्य नहीं है तो इनके समीपस्थ वर्तमान बस्तियों की उत्पत्ति के भी पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है.अतः यह न मानने का कोई कारण नहीं है कि महामारी जैसे कारणों से अवशिष्ट बस्तियों से वर्तमान बस्तियों में बस्ती का विस्थापन होने से अधिकांश वर्तमान अधिवास अस्तित्व में आये.
गाँव की मूल बस्ती से लगभग 1.5 किलोमीटर दूरी पर सुजानखेड़ी और ",विशाल डाबर (जोहड़) के दूसरी और स्थित हड़प्पा कालीन दो बस्तियों से अलग-अलग कारणों से बस्ती का विस्थापन हुआ और यहाँ के लोग हथछोया के मूल स्थान की भौगोलिक रूप से लाभदायक अवस्थिति के कारण यहाँ आ बसे जिसके पुख्ता प्रमाण हैं.
हथछोया गाँव में जोहड़,गुल्ही,देवावाला और यहाँ से बमुश्किल आधा किलोमीटर की दूरी पर बराला नामक चार विशालकाय तालाबों का 200 बीघे से अधिक का रकबा था, जिसके आज अवशेष मात्र हैं.यह क्षेत्र पूर्व में घने जंगलों से आबाद क्षेत्र था.हड़प्पा कालीन बस्तियों से भयानक महामारी के कारण सम्पूर्ण बस्ती का विस्थापन, विशाल जोहड़ के पश्चिम की और
हो गया, 20 वर्षो पहले तक इन दोनों बस्तियों के अवशेष गाँव में " बड़ी भेंट" और "छोटी भेंट" के नाम से रहा है.ये वास्तव में प्राचीन हड़प्पा कालीन बस्तियों के अवशेष थे जो हरित-क्रान्ति के फलस्वरूप हुए कृषि विकास की भेट चढ़ गये.
जब हम छोटे थे तो चोर सिपाही का खेल खेलते हुए अक्सर जोहड़ के बीच से होकर जाने वाले संकरे मार्ग से निकलकर इन भेंटो की और निकल जाया करते थे.भेंटो के उपर तक चले जाना हमे किसी एडवेंचर से कम नहीं लगता था.परिवार वालो की तरफ से वहां जाने की साफ़ मनाही होती थी क्योंकि ऐसी धारणा गाँव में उस समय प्रचलित थी कि इन "भेंटो" पर जाने से भूत चिपट जाते है.उन दिनों इन भेंटो पर ही शमशान होते थे.छोटी भेंट को चुहड़ो की भेंट कहा जाता था क्योंकि उस समय प्रचलित
भेदभाव के कारण चुहड़ो के मुर्दों का अंतिम संस्कार छोटी भेंट पर ही किया जाता था.
हडप्पा कालीन कुछ इंटे हाल के वर्षो तक गाँव में दिखाई देती रही जो इस बात का प्रमाण है कि इन भेंटो से विस्थापित हुए लोगो ने अपने अधिवासों के निर्माण के लिए पुरानी ईंटो का प्रयोग किया जो वे अपने साथ पुरानी बस्तियों से लाये थे.
दूसरा विस्थापन सुजानखेडी की बस्ती से हथछोया में हुआ जिसके कारण अलग थे.......जारी
@ सुनील सत्यम
हथछोया का शाब्दिक अर्थ:
हथछोया मूलतः दो शब्दों से मिलकर बना है-
हद (सीमा,अति)+चोया (जल स्तर). यह इस शब्द का संधिविच्छेद न होकर स्थानीय भाषा के दो शब्दों का एक साथ मिलकर प्रयोग है.
अर्थात ऐसा क्षेत्र जहाँ जल स्तर बहुत ऊपर ही उपलब्ध हो. गाँव की वर्तमान बस्ती के स्थान पर विशाल भौगोलिक क्षेत्र पर तालाब होने के कारण भूमिगत जल स्तर (चोया) की हद भूसतह के एकदम समीपस्थ थी.इसी कारण हद्चोया शब्द की उत्पत्ति हुई जो कालांतर में बिगड़कर हथछोया बन गया.
वास्तव में हथछोया के अधिवास का अध्ययन कई पहलुओं पर हमारा ध्यान केन्द्रित कर देता है, जो काफी मजेदार है.
हथछोया के बस्ती प्रारूप और प्रकार का विश्लेषण करे तो हम आसानी से समझ सकते है कि इस गाँव का इतिहास 160-200 वर्षो से अधिक पुराना नहीं होना चाहिए..इसका कारण स्पष्ट रूप से यह है कि यह वह समय है जब भवन निर्माण में लखौरी ईंटो का प्रयोग होता था..लखौरी ईंटो से निर्मित ही कुछ मकान/घर
इस गाँव में मिलते है जो आजकल अवशेष मात्र है.मुख्य रूप से गाँव की प्राचीन चौपाल जो 50 वर्ष से पुरानी नहीं है और लाला गीताराम का घर लखौरी ईंटो से बना है.इसके अतिरिक्त कोई भी ऐसी सरंचना गाँव में नहीं मिलती है जो इसके अपने इतिहास को 160-200 वर्षों से पीछे ले जाती हो.
लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि गाँव की बस्ती से कहीं अधिक पुराना गाँव वासियों का इतिहास है.
हथछोया गाँव की बस्ती की स्थापना के पीछे मै " बस्ती विस्थापन" सिद्धांत को मूल कारण मानता हूँ.हडप्पा सभ्यता के पतन के लिए इतिहासकारों ने अनेक सिद्धांत दिए है. लेकिन इतिहास का जागरूक विद्यार्थी होने के कारण हड़प्पा के पतन को लेकर मेरा अपना मत है जिसे मै "बस्ती-विस्थापन" सिद्धांत कहता हूँ.मेरा मत है कि क्योंकि आज से 3000 से 4000 वर्ष पूर्व चिकित्सा सुविधाएँ सुलभ नहीं थी.उस समय महामारी और बाढ़ जैसी आपदाएं आम थी.महामारी की स्थिति में लोग अपनी बस्ती को छोड़कर समीप के ही अन्य स्थान पर विस्थापित होकर नई बस्ती बसा लेते थे.यदि हम हडप्पा कालीन बस्तियों का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि जहाँ भी हमें हड्प्पाई अधिवासों के अवशेष मिले है उनके 1-10 किलोमीटर की परिधि में ही हमे आधुनिक जीवंत बस्तियां भी मिलती है. उदाहरण के रूप में हम हथछोया और हुलास को ले सकते है. हुलास जो कि सहारनपुर जनपद में हड्प्पाई अधिवास है, के 1-5 किलोमीटर की परिधि में बरसी,टिकरोल,और मनोहरा आदि कई गाँव है.इसी प्रकार हथछोया के समीप ही स्थित "छोटी और बड़ी भेंट" तथा सुजानखेड़ी की स्थिति बस्ती विस्थापन के पक्ष में प्रमाण हैं.हुलास,बड़ी और छोटी भेंट, एवं सुजानखेडी के पतन और बरसी,टिकरोल,मनोहरा तथा हथछोया की उतपत्ति में निकट का सम्बन्ध है.आज हमारे पास यदि अवशिष्ट बस्तियों के पतन के साक्ष्य नहीं है तो इनके समीपस्थ वर्तमान बस्तियों की उत्पत्ति के भी पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है.अतः यह न मानने का कोई कारण नहीं है कि महामारी जैसे कारणों से अवशिष्ट बस्तियों से वर्तमान बस्तियों में बस्ती का विस्थापन होने से अधिकांश वर्तमान अधिवास अस्तित्व में आये.
गाँव की मूल बस्ती से लगभग 1.5 किलोमीटर दूरी पर सुजानखेड़ी और ",विशाल डाबर (जोहड़) के दूसरी और स्थित हड़प्पा कालीन दो बस्तियों से अलग-अलग कारणों से बस्ती का विस्थापन हुआ और यहाँ के लोग हथछोया के मूल स्थान की भौगोलिक रूप से लाभदायक अवस्थिति के कारण यहाँ आ बसे जिसके पुख्ता प्रमाण हैं.
हथछोया गाँव में जोहड़,गुल्ही,देवावाला और यहाँ से बमुश्किल आधा किलोमीटर की दूरी पर बराला नामक चार विशालकाय तालाबों का 200 बीघे से अधिक का रकबा था, जिसके आज अवशेष मात्र हैं.यह क्षेत्र पूर्व में घने जंगलों से आबाद क्षेत्र था.हड़प्पा कालीन बस्तियों से भयानक महामारी के कारण सम्पूर्ण बस्ती का विस्थापन, विशाल जोहड़ के पश्चिम की और
हो गया, 20 वर्षो पहले तक इन दोनों बस्तियों के अवशेष गाँव में " बड़ी भेंट" और "छोटी भेंट" के नाम से रहा है.ये वास्तव में प्राचीन हड़प्पा कालीन बस्तियों के अवशेष थे जो हरित-क्रान्ति के फलस्वरूप हुए कृषि विकास की भेट चढ़ गये.
जब हम छोटे थे तो चोर सिपाही का खेल खेलते हुए अक्सर जोहड़ के बीच से होकर जाने वाले संकरे मार्ग से निकलकर इन भेंटो की और निकल जाया करते थे.भेंटो के उपर तक चले जाना हमे किसी एडवेंचर से कम नहीं लगता था.परिवार वालो की तरफ से वहां जाने की साफ़ मनाही होती थी क्योंकि ऐसी धारणा गाँव में उस समय प्रचलित थी कि इन "भेंटो" पर जाने से भूत चिपट जाते है.उन दिनों इन भेंटो पर ही शमशान होते थे.छोटी भेंट को चुहड़ो की भेंट कहा जाता था क्योंकि उस समय प्रचलित
भेदभाव के कारण चुहड़ो के मुर्दों का अंतिम संस्कार छोटी भेंट पर ही किया जाता था.
हडप्पा कालीन कुछ इंटे हाल के वर्षो तक गाँव में दिखाई देती रही जो इस बात का प्रमाण है कि इन भेंटो से विस्थापित हुए लोगो ने अपने अधिवासों के निर्माण के लिए पुरानी ईंटो का प्रयोग किया जो वे अपने साथ पुरानी बस्तियों से लाये थे.
दूसरा विस्थापन सुजानखेडी की बस्ती से हथछोया में हुआ जिसके कारण अलग थे.......जारी
@ सुनील सत्यम
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें