सुजानखेड़ी..में बगिया

सुजानखेड़ी..में बगिया

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

पढाई नहीं चढ़ाई

        कक्षा 6 गाँव के जूनियर हाई स्कूल से पास करने के बाद सन् 1987 में मैंने डीएवी इंटर कालेज ऊन में प्रवेश ले लिया था। दो वर्ष पहले ही मैं बड़ी शल्यक्रिया से गुजरा था। ऊन जाने के लिए साधन बहुत सीमित थे। उन दिनों कैराना-गंगोह बस सेवा हथछोया से होकर गुजरती थी।यद्यपि आज भी यह सेवा जारी है लेकिन इसकी समयबद्धता न तो उस समय ही निश्चित थी और न ही आज। यदा कदा कोई बस यदि समय से आ जाती थी तो गाँव से डीएवी ऊन जाने वाले छात्र उस बस की निशुल्क सेवा का लाभ उठा लेते थे। एकाध बस जब कभी आती थी तो उसमे पैर रखने तक की जगह नहीं होती थी सीट मिलना तो दूर ।
      स्कूल जाने के लिए अक्सर हमे पैदल मार्च ही करना पडता था। घर से डीएवी स्कूल की दूरी एक और से लगभग 9 किलोमीटर पड़ती थी।यानि अध्ययन करने के लिए हमें प्रतिदिन 18 किलोमीटर पैदल चलकर जाना होता था। बरसात क दिनों में बहुत ज्यादा समस्या का सामना करना पडता था। ऊन में घुसते ही एक तरफ जोहड़ में जबरदस्त पानी चढ़ता था तो दूसरी और एल लगभग 30 फुट गहरी झिलनुमा खाई थी । यहाँ 4-4 फुट पानी सड़क के ऊपर चढ़ाना एक सामान्य सी बात थी। यह दरिया भी हमें पैदल चलकर ही पार करना पड़ता था। सारे कपडे भीग जाया करते थे।कई बार पैर फिसल जान पर गिर जाते थे तो सारी किताबे भी पानी में भीग जाती थी। कभी कभी भाग्यवश किसी ट्रेक्टर ट्रॉली में लिफ्ट मिल जाती थी तो लगता था कि जैसे कोई उड़न खटोला मिल गया हो।

बुधवार, 8 जुलाई 2015

लाल सिंह परिवार

चौधरी लाल सिंह के 6 पुत्र व् एक पुत्री थे। चौधरी करता राम,चौ. सरधा राम, चौ. अतर सिंह, चौ. नेमचंद, चौ. आशाराम एवं चौ. बलवंत सिंह । चौधरी अतर सिंह, के प्रयासों से गाँव में कुछ विकास कार्य हुए। उनके प्रयासों से ही गाँव को ऊन के विद्युत  उपकेन्द्र से जोड़ा गया था बाद में तेजपाल गुर्जर के द्वारा गाँव का सम्पूर्ण विद्युतीकरण तब हुआ जब उन्होंने अपनी निजी भूमि पर गाँव के विद्युत उपकेन्द्र का निर्माण करवाया। गाँव में पक्की सड़कों का निर्माण एवं रुहाड़ा (नाला) खुदाई में चौ. अतर सिंह का बहुमूल्य योगदान रहा है।  वह एक दूरदर्शी राजनेता के समस्त गुण रखते थे। ब्लॉक प्रमुख,सरपंच,प्रधान सभी पद उनके रहते किसी अन्य गाँव में नहीं गए। पूर्व राज्यपाल वीरेंद्र वर्मा से उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा। चौ. अतर सिंह की मृत्यु के बाद चौ. आशाराम ग्राम प्रधान तथा मनोनीत जिला पंचायत सदस्य रहे। 1995 में पंचायत राज अधिनियम 1993 के बाद हुए जिला पंचायत के प्रथम चुनाव में वह भारी मतों से विजयी होकर सदस्य चुने गए। चौ. आशाराम जेल विजिटर के पद पर भी मनोनीत हुए। उनके बाद चौ. अतर सिंह के पुत्र सत्यपाल सिंह ग्राम प्रधान चुने गए। वह जिला सहकारी बैंक के डायरेक्टर पद पर भी विराजमान रहे।

लाला गीताराम

लाला गीताराम "रईस" हथछोया की एक महान शख्शियत थे। उनका जन्म सन् 1903 में स्वर्गीय लाला कन्हैयालाल के घर हुआ था।  वह एक शिक्षित एवं दूरदर्शी व्यक्ति थे। पंच फैसलों के लिए लाला गीताराम की ख्याति दूर दूर तक थी। गाँव में कोई भी सरकारी व्यक्ति आता था तो उसका ठहराव लाला जी के पास ही होता था। वह ग्राम की ब्रिटिश न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ थे। सन् 1938 से 1940 तक वह अंग्रेज कलेक्टर (जज) की मुख्य कार्यसमिति में असेसर मनोनीत रहे। जिले की मुख्य कार्यसमिति में कुल 5 असेसर होते थे , जो न्याय-निर्णय के समय जज के साथ बैठते थे तथा जिनका कार्य किसी केस में अपना निर्णय सुनाने से पहले विदेशी (अंग्रेज) जज को स्थानीय रीति रिवाजो,परम्पराओं एवं स्थानीय विधि के बारे में अवगत करना होता था ताकि जज तदनुकूल अपना निर्णय सुना सके। यद्यपि असेसर की राय मानना जज के लिए बाध्यकारी नही होता था । लाला गीताराम एक कुशल आयुर्वेद चिकित्सक भी थे। वह क्षेत्र के लोगों को निशुल्क अपनी चिकित्सा सेवाएं देते थे।
             यदि उनको अपने समय का हथछोया का दानवीर कर्ण कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने गाँव को बड़े पैमाने पर भूदान दिया। गाँव के प्रसिद्द शिवाले (शिव मंदिर) का निर्माण लाला गीताराम द्वारा दान की गई भूमि पर ही हुआ है।इसके अतिरिक्त उन्होंने शिवाले को प्रचुर मात्रा में धन भी दान में दिया। गाँव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र एवं केंद्रीय चौपाल को भी उन्होंने भूमिदान की थी।
निर्धनों की सेवा एवं निर्धन कन्याओं की शादी से उन्हें विशेष सुकून मिलता था। वह अहिंसा के पुजारी एवं गौ-सेवक तथा रक्षक थे। चौधरी कमालुद्दीन के साथ मिलकर उन्होंने गाँव में गौ हत्या एवं पशु कटान पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगवाया जिसके प्रति आज भी हथछोया के हिन्दू-मुस्लिम पूर्णतः कटिबद्ध हैं।
सन् 1980 में लाला गीताराम अपनी यादें एवं सिद्धांत धरोहर के रूप में छोड़कर अपना शरीर पूर्ण कर प्रभु चरणों में चले गए ।

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

चौधरी कमालुद्दीन

चौधरी कमालुदीन "लम्बरदार"
------------@ सरवेज चौधरी
"जब जब हथछोया का ग्राम इतिहास पढ़ा जायेगा, चौधरी कमालुदीन का नाम जरूर जरूर लिया जायेगा"
कल्लु वंश मे जन्मे कमालुदीन बेहद दयालु स्वाभाव  के व्यक्ति थे| इनके पिता का नाम ज़नाब साबर चौधरी एवं माता का नाम मोहतरमा सरिया था । इनके पिता ज़नाब साबर चौधरी एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते थे । चौ.कमालुदीन ने अपने पिता से ईमानदारी और अनुशाशन का गुण विरासत में प्राप्त किया था तो अपनी माता से ईश्वर में आस्था तथा करुणा का उपहार |
इनकी शादी बचपन में ही कर दी गयी थी । चौ. कमालुदीन में गज़ब की नेतृत्व क्षमता थी ।अपनी नेतृत्व क्षमता  के चलते  ही उन्हें ग्राम समाज  में दी जाने वाली "लंबरदार"जैसी उपाधि से नवाज़ा गया| ग्राम में कोई भी पंचायत हो या सभा, उनकी अध्यक्षता में ही होती थी |
चौधरी कमालुदीन की ईमानदारी के किस्से आज भी हथछोया एवं आस-पास के गाँवो में मशहूर है। बताया जाता है की एक बार कच्ची गढ़ी के लाला महावीर के लड़के की शादी के समय,  बारात में जाते वक़्त "बरी का सामान" जिसमे सोने की मोहरे एवं अन्य कीमती समान था, रास्ते में कहीं गिर गया । चौधरी कामालुद्दीन पीछे से अपनी घोड़ी पर सवार होकर विवाह में  शामिल होने जा रहे थे । उनकी नज़र रास्ते में पड़े "बरी" के समान पर पड़ी । उन्होंने घोड़ी से  उतरकर वह सामन उठाया और अपनी घोड़ी के ऊपर रखकर विवाह स्थल की तरफ चलपड़े । उधर जब बरी की रश्म निभाने की तैयारी हुई तो बरी का समान न देखकर वर पक्ष व्याकुल हो उठा । लाला महावीर ने कमालुदीन से सोने की मोहरे और बरी के लिए जरुरी अन्य समान का प्रबन्ध करने का अनुरोध किया|तब कमालुदीन ने अपनी घोड़ी से उतारकर वह कीमती समान उसके सही मालिक लाला महावीर को सौप दिया । उसी दिन से उनकी ईमान्दारी की चर्चा पूरे क्षेत्र में फ़ैल गई और लोग उनकी ईमानदारी के कायल हो गए ।उसके बाद  पूरे कल्लू वंश में बरी प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया, जिसे आज भी पूरा कल्लुवंश निभा रहा है।
    वह हिन्दू-मुस्लिम एकता के दूत थे। उन्होंने हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि गाँव के हिन्दू भाइयों की धार्मिक भावनाएं किसी भी कीमत पर आहत न होने पाये। इसी बात को ध्यान में रखकर उन्होंने ग्राम में पशु कटान पर प्रतिबन्ध लगाया था जिस परम्परा को आज भी पूरा गाँव निभा रहा है।
         ग्राम का भूमि कर (मालगुजारी)भी चौधरी कामालुद्दीन के पास  इकट्ठा होता था जो तहसील में उनके द्वारा ही जमा किया जाता था।
       एक बार गाँव के कुछ लोगों ने चौधरी कमालुदीन की लोकप्रियता से डर कर उनकी हत्या का षडयंत्र रचा। वर्तमान में जहाँ हाज़ी अशरफ अली का खेत है वहां उस समय नागर बनिये की आम की बगीची थी । उस बगीची में षडयंत्रकारी चौ.कमालुदीन की हत्या के इरादे से घात लगाये बैठे थे । चौधरी फूल सिंह दिलावरे, जो उनके करीबी मित्र थे, को इस षडयंत्र की भनक लग गई । उन्होंने अपनी जान पर खेलकर उस षडयंत्र की सूचना चौधरी कमालुदीन को दी और उनकी जान बचाई। चौधरी फूल सिंह दिलावरे  से उनके पारिवारिक सम्बंध थे और वो उनके घनिष्टम मित्रो में से एक थे । इस घटना के बाद उनके समबन्ध और भी अधिक मजबूत हो गए। आज भी दोनों परिवारों के घनिष्ट समबन्ध किसी भी प्रकार से कमजोर नहीं हुए है। चौधरी कुंदन सिंह और "रईस" लाल गीता राम, जो उस समय तहसील में मुख़्य न्याय अधिकारियो में से एक थे ,भी उनके घनिष्टम मित्रो में से एक थे । उस समय ग्राम हथछोया की न्यायिक प्रक्रिया इन तीनो के ऊपर ही निर्भर थी। वीरेंद्र वर्मा जो शामली से सांसद और पंजाब के पूर्व राज्यपाल भी रहे, के साथ भी उनके अच्छे सम्बन्ध थे । उनके ग्राम के हर वर्ग के साथ अच्छे सम्बन्ध थे ।ऊंच-नीच, जातिपक्ष कोई बेदभाव उनके मन में नही रहता था । कट्टरता के वह धुर विरोधी थे।

जब पहली बार  चौधरी चरण सिंह ग्राम हथछोया में आये तो उस समय ग्राम की बागडोर चौधरी कमालुद्दीन के हाथो में थी। चौधरी चरण सिंह  उस समय अपनी राजनितिक पारी की शुरुवात ही कर रहे थे । उन्होंने ग्राम के प्राइमरी स्कूल (शिवाला) में आयोजित कार्क्रम में चौधरी कामालुद्दीन से चुनाव में सहयोग की अपील की थी। चौधरी कमालुदीन बहुत परिश्रमी थे। वह अपने खेतो में भी बहुत मेहनत किया करते थे।कुछ समय पश्चात बीमारी के चलते इनकी मौत हो गयी।अपने पीछे ये पांच पुत्र छोड़ गए|
1-मरहूम  दिन्ना चौधरी
2- हाजी नूरा चौधरी
3-मरहूम हाजी फिमु चौधरी
4-मरहूम  हाजी असगर चौधरी
5-चौधरी हाजी अनवर अली

(इस लेख के तथ्य स्वर्गीय फूल सिंह दिलावरे और रोशनलाल हरिजन तथा चौधरी कामालुद्दीन के सबसे छोटे पुत्र हाजी अनवर अली एव हाजी नूरा से की गई वार्ता पर आधारित हैं)