चौधरी कमालुदीन "लम्बरदार"
------------@ सरवेज चौधरी
"जब जब हथछोया का ग्राम इतिहास पढ़ा जायेगा, चौधरी कमालुदीन का नाम जरूर जरूर लिया जायेगा"
कल्लु वंश मे जन्मे कमालुदीन बेहद दयालु स्वाभाव के व्यक्ति थे| इनके पिता का नाम ज़नाब साबर चौधरी एवं माता का नाम मोहतरमा सरिया था । इनके पिता ज़नाब साबर चौधरी एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते थे । चौ.कमालुदीन ने अपने पिता से ईमानदारी और अनुशाशन का गुण विरासत में प्राप्त किया था तो अपनी माता से ईश्वर में आस्था तथा करुणा का उपहार |
इनकी शादी बचपन में ही कर दी गयी थी । चौ. कमालुदीन में गज़ब की नेतृत्व क्षमता थी ।अपनी नेतृत्व क्षमता के चलते ही उन्हें ग्राम समाज में दी जाने वाली "लंबरदार"जैसी उपाधि से नवाज़ा गया| ग्राम में कोई भी पंचायत हो या सभा, उनकी अध्यक्षता में ही होती थी |
चौधरी कमालुदीन की ईमानदारी के किस्से आज भी हथछोया एवं आस-पास के गाँवो में मशहूर है। बताया जाता है की एक बार कच्ची गढ़ी के लाला महावीर के लड़के की शादी के समय, बारात में जाते वक़्त "बरी का सामान" जिसमे सोने की मोहरे एवं अन्य कीमती समान था, रास्ते में कहीं गिर गया । चौधरी कामालुद्दीन पीछे से अपनी घोड़ी पर सवार होकर विवाह में शामिल होने जा रहे थे । उनकी नज़र रास्ते में पड़े "बरी" के समान पर पड़ी । उन्होंने घोड़ी से उतरकर वह सामन उठाया और अपनी घोड़ी के ऊपर रखकर विवाह स्थल की तरफ चलपड़े । उधर जब बरी की रश्म निभाने की तैयारी हुई तो बरी का समान न देखकर वर पक्ष व्याकुल हो उठा । लाला महावीर ने कमालुदीन से सोने की मोहरे और बरी के लिए जरुरी अन्य समान का प्रबन्ध करने का अनुरोध किया|तब कमालुदीन ने अपनी घोड़ी से उतारकर वह कीमती समान उसके सही मालिक लाला महावीर को सौप दिया । उसी दिन से उनकी ईमान्दारी की चर्चा पूरे क्षेत्र में फ़ैल गई और लोग उनकी ईमानदारी के कायल हो गए ।उसके बाद पूरे कल्लू वंश में बरी प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया, जिसे आज भी पूरा कल्लुवंश निभा रहा है।
वह हिन्दू-मुस्लिम एकता के दूत थे। उन्होंने हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि गाँव के हिन्दू भाइयों की धार्मिक भावनाएं किसी भी कीमत पर आहत न होने पाये। इसी बात को ध्यान में रखकर उन्होंने ग्राम में पशु कटान पर प्रतिबन्ध लगाया था जिस परम्परा को आज भी पूरा गाँव निभा रहा है।
ग्राम का भूमि कर (मालगुजारी)भी चौधरी कामालुद्दीन के पास इकट्ठा होता था जो तहसील में उनके द्वारा ही जमा किया जाता था।
एक बार गाँव के कुछ लोगों ने चौधरी कमालुदीन की लोकप्रियता से डर कर उनकी हत्या का षडयंत्र रचा। वर्तमान में जहाँ हाज़ी अशरफ अली का खेत है वहां उस समय नागर बनिये की आम की बगीची थी । उस बगीची में षडयंत्रकारी चौ.कमालुदीन की हत्या के इरादे से घात लगाये बैठे थे । चौधरी फूल सिंह दिलावरे, जो उनके करीबी मित्र थे, को इस षडयंत्र की भनक लग गई । उन्होंने अपनी जान पर खेलकर उस षडयंत्र की सूचना चौधरी कमालुदीन को दी और उनकी जान बचाई। चौधरी फूल सिंह दिलावरे से उनके पारिवारिक सम्बंध थे और वो उनके घनिष्टम मित्रो में से एक थे । इस घटना के बाद उनके समबन्ध और भी अधिक मजबूत हो गए। आज भी दोनों परिवारों के घनिष्ट समबन्ध किसी भी प्रकार से कमजोर नहीं हुए है। चौधरी कुंदन सिंह और "रईस" लाल गीता राम, जो उस समय तहसील में मुख़्य न्याय अधिकारियो में से एक थे ,भी उनके घनिष्टम मित्रो में से एक थे । उस समय ग्राम हथछोया की न्यायिक प्रक्रिया इन तीनो के ऊपर ही निर्भर थी। वीरेंद्र वर्मा जो शामली से सांसद और पंजाब के पूर्व राज्यपाल भी रहे, के साथ भी उनके अच्छे सम्बन्ध थे । उनके ग्राम के हर वर्ग के साथ अच्छे सम्बन्ध थे ।ऊंच-नीच, जातिपक्ष कोई बेदभाव उनके मन में नही रहता था । कट्टरता के वह धुर विरोधी थे।
जब पहली बार चौधरी चरण सिंह ग्राम हथछोया में आये तो उस समय ग्राम की बागडोर चौधरी कमालुद्दीन के हाथो में थी। चौधरी चरण सिंह उस समय अपनी राजनितिक पारी की शुरुवात ही कर रहे थे । उन्होंने ग्राम के प्राइमरी स्कूल (शिवाला) में आयोजित कार्क्रम में चौधरी कामालुद्दीन से चुनाव में सहयोग की अपील की थी। चौधरी कमालुदीन बहुत परिश्रमी थे। वह अपने खेतो में भी बहुत मेहनत किया करते थे।कुछ समय पश्चात बीमारी के चलते इनकी मौत हो गयी।अपने पीछे ये पांच पुत्र छोड़ गए|
1-मरहूम दिन्ना चौधरी
2- हाजी नूरा चौधरी
3-मरहूम हाजी फिमु चौधरी
4-मरहूम हाजी असगर चौधरी
5-चौधरी हाजी अनवर अली
(इस लेख के तथ्य स्वर्गीय फूल सिंह दिलावरे और रोशनलाल हरिजन तथा चौधरी कामालुद्दीन के सबसे छोटे पुत्र हाजी अनवर अली एव हाजी नूरा से की गई वार्ता पर आधारित हैं)
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