सुजानखेड़ी..में बगिया

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बुधवार, 8 जुलाई 2015

लाला गीताराम

लाला गीताराम "रईस" हथछोया की एक महान शख्शियत थे। उनका जन्म सन् 1903 में स्वर्गीय लाला कन्हैयालाल के घर हुआ था।  वह एक शिक्षित एवं दूरदर्शी व्यक्ति थे। पंच फैसलों के लिए लाला गीताराम की ख्याति दूर दूर तक थी। गाँव में कोई भी सरकारी व्यक्ति आता था तो उसका ठहराव लाला जी के पास ही होता था। वह ग्राम की ब्रिटिश न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ थे। सन् 1938 से 1940 तक वह अंग्रेज कलेक्टर (जज) की मुख्य कार्यसमिति में असेसर मनोनीत रहे। जिले की मुख्य कार्यसमिति में कुल 5 असेसर होते थे , जो न्याय-निर्णय के समय जज के साथ बैठते थे तथा जिनका कार्य किसी केस में अपना निर्णय सुनाने से पहले विदेशी (अंग्रेज) जज को स्थानीय रीति रिवाजो,परम्पराओं एवं स्थानीय विधि के बारे में अवगत करना होता था ताकि जज तदनुकूल अपना निर्णय सुना सके। यद्यपि असेसर की राय मानना जज के लिए बाध्यकारी नही होता था । लाला गीताराम एक कुशल आयुर्वेद चिकित्सक भी थे। वह क्षेत्र के लोगों को निशुल्क अपनी चिकित्सा सेवाएं देते थे।
             यदि उनको अपने समय का हथछोया का दानवीर कर्ण कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने गाँव को बड़े पैमाने पर भूदान दिया। गाँव के प्रसिद्द शिवाले (शिव मंदिर) का निर्माण लाला गीताराम द्वारा दान की गई भूमि पर ही हुआ है।इसके अतिरिक्त उन्होंने शिवाले को प्रचुर मात्रा में धन भी दान में दिया। गाँव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र एवं केंद्रीय चौपाल को भी उन्होंने भूमिदान की थी।
निर्धनों की सेवा एवं निर्धन कन्याओं की शादी से उन्हें विशेष सुकून मिलता था। वह अहिंसा के पुजारी एवं गौ-सेवक तथा रक्षक थे। चौधरी कमालुद्दीन के साथ मिलकर उन्होंने गाँव में गौ हत्या एवं पशु कटान पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगवाया जिसके प्रति आज भी हथछोया के हिन्दू-मुस्लिम पूर्णतः कटिबद्ध हैं।
सन् 1980 में लाला गीताराम अपनी यादें एवं सिद्धांत धरोहर के रूप में छोड़कर अपना शरीर पूर्ण कर प्रभु चरणों में चले गए ।

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