मेरे ग्राम देवता
(हथछोया; कुछ इतिहास, कुछ यादे- के अंश)
@ सुनील सत्यम
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संघ से संपर्क के बाद मेरे बालमन से ऊंच-नीच का भाव बिलकुल ही नष्ट हो गया था। कक्षा 4 तक गाँव के हर वर्ग के लड़के मेरे अच्छे दोस्त बन गए थे। धर्मेंद्र सिंह (यशपाल सिंह)महीपाल सिंह, रणपाल सिंह, जगवीर सिंह, नेत्रपाल सिंह, कुलवीर सिंह, धर्मेन्द्र सिंह (अजमेर सिंह), कंवरपाल कश्यप (मामचंद), बिजेन्द्र बाल्मीकी( अतर सिंह), सुभाष कश्यप, योगेन्द्र कश्यप, तेजपाल सैनी (तेज्जु), सौराज सिंह (इंदराज खेवड़िया), जगपाल गड़रिया (कल्लण), राजवीर सिंह गड़रिया, फरीद अहमद, शकील (छोटा, पुत्र ताऊ फिमू), फुरकान (मंजूर अहमद), आदि से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। साथ खेलना-कूदना, खाना-पीना होता था। जाति भाव ने कभी कोई असर इसकाल के बाद नहीं दिखाया। संघ के कार्यक्रमों मे सहभोज मुझे सबसे प्रिय था। हम गाँव मे अक्सर सहभोज का आयोजन करते थे। सभी के घर से भोजन बनकर आता था, जिसे एक जगह मिलाकर पंगत लगाकर सभी को परोसा जाता था। भोजनमंत्र के बाद सभी एक साथ भोजन करते थे। यह वैसे तो एक छोटा कार्यक्रम होता था। लेकिन दिलों-दिमाग पर से इसका प्रभाव आज तक नहीं गया। समरसता और समानता का जो भाव सहभोज के समय मन मे उत्पन्न होता था,वह आज तक यथावत है। बड़ी कक्षाओं मे जाने के बाद गाँव मे मेरे मित्रों की सूची और भी ज्यादा लंबी हो गई थी। अब इस सूची मे अनिल खेवड़िया, नरेश खेवड़िया, मुनेश खेवड़िया जैसे अजीज मित्र भी जुड़ गए थे, इन सभी के साथ एक साथ खाना पीना मेरे लिए आम बात थी। कुछ लोग इस बारे मे दबे कानो बात भी करते थे। कुछ ने तो बाकायदा मुझे इसके लिए मना भी किया था जिनके नाम यहाँ उल्लेख करना ठीक नहीं होगा।अनिल खेवड़िया तो थानाभावन मे कुछ दिन मेरे साथ रूम पार्टनर भी रहे।
यहाँ बचपन की दो रोचक रोचक बातें उल्लखित करना चाहूँगा जो आज भी मेरे जेहन मे हैं। कंटू चूहड़ा (बाल्मीकी) हमारा पारिवारिक सफ़ाई कर्मचारी था। कंटू मुझसे बेहद प्यार करता था। एक बार उसने किसी फेरि वाले से बुरादा बर्फ खाने के लिए खरीदा।मै पास मे ही खड़ा था। कंटू बर्फ खाने ही वाला था कि उसकी मुझ पर निगाह पड़ी। उसने मुझसे पूछा “ बर्फ खाओगे, लंबरदार ?” मैंने हाँ कहने मे तनिक भी देर नहीं की। मेरे हाँ कहते ही कंटू ने बर्फ मेरे हाथ मे थमा दिया और मै बड़े मजे से बर्फ खाने लगा। जब थोड़ा सा बर्फ बचा तो कंटू ने देखा कि मै तो सारा ही बर्फ खा जाऊंगा। उसने याचनात्म्क लहजे मे कहा “ थोड़ा सा बर्फ मेरे लिए भी छोड़ दियो लंबरदार !” मैंने बचा हुआ बर्फ कंटू के हाथ मे दे दिया । कंटू ने वह बचा हुआ बर्फ खाया और मुझे आशीर्वाद देकर चला गया। उस समय मेरी उम्र लगभग 8-10 वर्ष रही होगी।
कंटू की लड़की बती जो मुझसे उम्र मे लगभग 10-12 वर्ष बड़ी रही होगी, भी मुझसे बहुत लगाव रखती थी। वह अपने परिवार के लिए गाँव से रोटियाँ मांग कर लाती थी। उन दिनों गाँव मे कोई भी बाल्मीकी परिवार अपने घर पर खाना नहीं बनाता था। अपने यजमानों के घर से मांग कर ही वे अपने दोनों वक्त के भोजन का प्रबंध करते थे। बती अपने भोजन संग्रह के क्रम मे जब भी हमारे घर आती थी, मुझसे जरूर पूछती थी कि “ खाना खाओगे ?” जब भी उसके पास कोई अच्छी चीज होती तो मै कभी मना नहीं करता था। शादी विवाह के समय वह किसी के घर से रसगुल्ले आदि मिठाई लेकर आती, तो मुझसे जरूर पूछती। मै बड़े चाव से खाता था, बती मुझे कुछ भी खिलाने के बाद बड़ा अच्छा महसूस करती थी। मेरे घर वालों ने मुझे कभी यह नहीं सिखाया कि बती से लेकर खाना नहीं खाना है। बचपन के संस्कार आज और भी ज्यादा सुदृढ़ हो चुके है। जातीय भाव मुझे गौरवान्वित नहीं करता है, मेरा गाँव, मेरा सर्वसमाज मुझे सबसे प्यारा है। हर ग्रामवासी मेरा “ देवता” है और गाँव का हर घर “मेरा मंदिर” ।
सुजानखेड़ी..में बगिया
शुक्रवार, 26 जून 2015
मेरे ग्राम देवता..
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