सुजानखेड़ी..में बगिया

सुजानखेड़ी..में बगिया

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

1857 दिलावरे

गंगा यमुना दोआब के यमुना खादर क्षेत्र में 1857 की क्रांति की मशाल जलाने में दिलावरों अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका रही।उस समय शामली तहसील मुख्यालय के साथ साथ आयुधागर भी था।सौरम पंचायत में शामिल क्षेत्र की प्रमुख सामाजिक हस्तियों ने आयुधागर एवं कोषागार को लूटकर अंग्रेजों के विरुद्ध छेडने की योजना बनाई ।योजना का नेता शामली के चौधरी मोहर सिंह को बनाया गया जिन्होंने हथछोया के भजन सिंह दिलावरे को सैन्य नेतृत्व की बागडौर सौंपी।भजन सिंह घुडसवारी के बहुत शौकीन थे। तलवारबाजी और एनफील्ड राइफल चलाना बखूबी जानते थे।योजनानुसार क्रान्तिकारियों ने कोष एवं आयुध लूट को अंजाम दिया और तहसील मुख्यालय पर नियंत्रण स्थापित कर दिया।करों की वसूली स्थगित कर दी गई और स्वतंत्रता की मुनादी कराई गई।लेकिन यह स्वतंत्रता अस्थाई सिध्द हुई।शीघ्र ही मुज़फ्फरनगर से अंग्रेज सेना, शामली रवाना की गई। जिससे बनत में क्रांतिकारियों की मुठभेड़ हुई।क्रांतिकारी सेना प्रशिक्षित नही थी।अतः वह बहुत ज्यादा समय तक अंग्रेजी सेना के प्रशिक्षित रंगरूटों का सामना नही कर पाई। मोहर सिंह की बनत में शहादत से क्रांतिकारियों के पैर उखड़ गए।अनेक क्रांतिकारी शहीद हो गए,अनेक घायल।कई कैदियों को गिरफ्तार कर तत्काल बिना कानूनी प्रक्रिया के ही फांसी दे दी गई।क्रांति को जिंदा रखने के लिए भजन सिंह एवं उनके अन्य साथी भूमिगत हो गए और अगले संघर्ष की तैयारी की योजना बनाने लगे।
क्रांति योजना एवं प्रचार माध्यम:
1857 की क्रांति में गांव दर गांव क्रांति संदेश भेजने के लिए क्रांतिकारियों ने कमल के फूल और रोटी को ढाल बनाया था। इस बात के प्रमाण नही हैं कि रोटी कमल का प्रयोग पहली बार यहीं हुआ था अथवा नही।लेकिन भजन सिंह के प्रपौत्र फूल सिंह दिलावरे एवं मंगल सिंह दिलावरे के अनुसार रोटी कमल की संदेश के रूप में प्रयोग करने की शुरुआत जनपद मुजफ्फरनगर (अब शामली) के गांव हथछोया से हुई थी। इसके लिए हथछोया की लाडो गुर्जरी ने पहली रोटी बनाई थी। 1857 की क्रांति में क्रांतिकारियों का एक नारा था:- "अम्बुजाना रोटी पकाना दरिया पार कराना"। 1824 में सहारनपुर के गांव कुंजा-बहादुरपुर जो कि अब उत्तराखंड के हरिद्वार जनपद के अंतर्गत आता है, में हुए किसान विद्रोह ने ही 1857 की क्रांति के बीज बो दिए थे। इस विद्रोह के दमन से क्षेत्र की जनता को मर्मांतक आघात पहुंचा था। हथछोया- सुजानखेडी के सुजान सिंह दिलावरे के प्रपौत्र रोढ़ा सिंह गुर्जर इस विद्रोह के स्थानीय नेता थे। विद्रोह के नेता विजय सिंह पथिक उनके करीबी रिश्तेदार थे। इस विद्रोह के दमन के दौरान अंग्रेजों ने अनेक गांव नष्ट कर दिए थे।  सुजानखेडी भी पूरी तरह नष्ट कर दिया गया था। आज भी मुजफ्फरनगर, (वर्तमान में शामली) जनपद के राजस्व दस्तावेजों में ऊन तहसील का यह गांव एक गैर आबाद गांव के रूप में दर्ज है। लोगों ने तंग आकर के एक व्यापक क्रांति की योजना बनानी शुरू कर दी थी।
धौला-कुंआ प्रकरण:
इसी बीच हथछोया का धौला-कुआं प्रकरण हो गया। दूधिया पानी वाले धौले कुएं को अंग्रेजों ने जबरन बंद करा दिया। विरोध प्रदर्शन में हथछोया के अनेक लोग शहीद हुए, जिनमें गांव की सभी जातियों के लोग शामिल थे। यह घटना 1855 के अंत में हुई ।इसी दौरान विद्रोह  का नेतृत्व करने के लिए रोढ़ा सिंह को फांसी की सजा दे दी गई। उनके पुत्र भजन सिंह गुर्जर उर्फ उर्फ भज्जू दिलावरे ने व्यापक क्रांति की योजना बनाने के लिए अपने साथियों से सलाह करनी प्रारंभ कर दी।
रोटी और कमल से सन्देश:
उनकी पत्नी लाड़ो गुर्जरी के सुझाव पर क्रांतिकारियों ने कमल के फूल एवं रोटी को आसपास के क्षेत्रों में क्रांति संदेश पहुंचाने के लिए पहली बार प्रयोग किया था।क्रांति संदेश के लिए पहली रोटी लाडो गुजरी नहीं बनाई थी। कमल का फूल गांव के विशाल तालाब से लिया गया था, जिसे डाबर के नाम से जाना जाता था।
क्रांति संदेश के लिए कमल का फूल एवं रोटी प्रयुक्त किए जाने का कारण बताया गया कि कमल का फूल स्वतंत्रता एवं स्वच्छता तथा रोटी संघर्ष का प्रतीक होती है। यानि कमल के फूल एवं रोटी गांव दर गांव पहुंचाकर यह संदेश देना था कि देश को स्वच्छ एवं स्वतंत्र कराने के लिए संघर्ष होना है। अतः इसमें शामिल होने के लिए आप सभी तैयार हों। इसके लिए संदेश वाहक एक रोटी तथा कमल का फूल लेकर के क्रांति सन्देश प्रसारित करने के लिए गांव दर गांव जाता था। आस-पास के गांव में क्रांति की योजना के संदर्भ में संदेश प्रेषित करने के लिए क्रांतिकारियों द्वारा रोटी एवं कमल के फूल का रूप में इस्तेमाल किया जाता था। क्रांति संदेश के लिए कमल का फूल एवं रोटी प्रयुक्त किए जाने का कारण आप सभी देश के विदेशी परतंत्रता का जुआ उखाड़ फेंकने के लिए होने वाले राष्ट्रीय संघर्ष में शामिल हों। इसके लिए संदेश वाहक एक कूट वाक्य भी कमल एवं रोटी प्राप्त करने वाले क्रांतिकारी को देता था। यह संदेश था अम्बुजना ना रोटी पकाना दरिया पार कराना अर्थात स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करो और अंग्रेजों को समुद्र पार भगाओ। कमल का फूल उपलब्ध न होने के कारण हर जगह पहुंचना संभव नहीं था। इसलिए अधिकांश जगह सिर्फ रोटी से संदेश भेजा जाता था। सामान्यत गांव का चौकीदार जो क्रांतिकारी की भूमिका भूमिका में था, अथवा अन्य कोई जिम्मेदार व्यक्ति अपने गांव से अगले गांव में रोटी भिजवाता था। कमल एवं रोटी द्वारा संदेश भिजवाने के पुरातात्विक साक्ष्य मिलना संभव नहीं है। लेकिन अनेक इतिहासकार इसका वर्णन करते हैं तथा कुछ इतिहासकार इसे सिरे से खारिज भी करते हैं। खड़ंगे ग़दर नाम से 1857 की घटनाओं का आंखों देखा विवरण लिखने वाले पहाड़गंज दिल्ली के उस समय के थानेदार मोइनुद्दीन हसन स्वयं रोटी द्वारा क्रांति भिजवाने का जिक्र करते हैं। वह अपनी पुस्तक में कहते हैं "एक दिन इंद्रपथ का चौकीदार थाने में आया और उसने बताया कि मेरे हाथ में जो चपाती है। यह तुम अपने पास रखो और ऐसी ही 5 चपातियां 5 गांव में जहां यह न पहुंची हो पका करके दे आओ। मैंने उस चपाती को स्वयं देखा था। वह हथेली के बराबर दो तोले वजन की गेहूं और जौ की बनी हुई चपाती थी। दिल्ली के तत्कालीन मजिस्ट्रेट जान मेटकाफ ने अपने तमाम थानेदारों को चपाती के बारे में रिपोर्ट देने के लिए लिखा था। जिस रोटी ने देशभर में 1857 की क्रांति का संदेश गांव दर गांव भिजवाया था वह हथछोया से चली थी। हथछोया के भजन सिंह दिलावर एवं अन्य बहुत से क्रांतिकारियों ने 1857 में ही देश की स्वतंत्रता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। लेकिन आज तक इन स्वर्णिम ऐतिहासिक घटनाओं पर कोई न तक कोई अनुसंधान ही हुआ है और न ही शासन प्रशासन स्तर पर इसकी स्मृतियों को सहेजने के लिए कुछ किया। यहां तक कि भजन सिंह जैसे क्रांतिकारियों के स्मारक के नाम पर एक पत्थर भी कहीं नहीं लगा है।

                               @ सुनील सत्यम

सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

देवस्थली: सच होंगे सपने।

शिक्षा प्राप्ति के लिए संघर्ष क्या होता है? जद्दोजहद क्या होती है? यह हमने बखूबी देखा है। गांव में कक्षा 6 तक की पढ़ाई करने के बाद सातवीं कक्षा में मेरा एडमिशन ऊन कस्बे के डीएवी इंटर कॉलेज में हुआ था। यहीं से मैंने कक्षा 10 विज्ञान वर्ग से पास की थी। कक्षा नौ में मुझसे बड़ी मेरी बहन बबली का भी एडमिशन इसी डीएवी इंटर कॉलेज में करा दिया गया था। ग्राम से हमारे घर से इस कॉलेज की दूरी पूरे 9 किलोमीटर है। ग्राम से विद्यालय तक जाने के लिए आज की तरह विद्यालय की ओर से कोई परिवहन व्यवस्था उपलब्ध नहीं कराई जाती थी। इसके अतिरिक्त भी गांव से ऊन के बीच कोई नियमित परिवहन व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी, यद्यपि कैराना गंगोह के बीच इस मार्ग पर बहुत पहले से बसे चलती थी लेकिन हमारे अध्ययन के दौरान के वर्षों में शायद ही ऐसा कोई दिन रहा हो जिस दिन विद्यालय जाने के समय हमें उस बस की सेवा प्राप्त हुई हो। इन बसों का भी कोई निर्धारित समय नहीं था। यह कभी किसी समय आती थी तो कभी किसी समय। विद्यालय की छुट्टी के बाद कभी कभार हमें इन बसों की सेवा उपलब्ध हो जाती थी लेकिन उसके लिए भीड़ में घुसकर जगह बनाने या बस के पीछे जाल पर लटक कर गांव तक पहुंचने का जोखिम हमेशा उठाना पड़ता था। यह वह संघर्ष था जिसकी वजह से मैंने और मेरे जैसे कई छात्रों ने गांव से पढ़ने वाली कई छात्राओं ने जिनमें मेरी बहन और अन्य लड़कियां थी, प्रतिदिन घर से पैदल चलकर 9 किलोमीटर जाना और 9 किलोमीटर स्कूल से घर वापस आना के विकल्प को ही चुना था। हमने 18 किलोमीटर के इस प्रतिदिन के सफर को शिक्षा प्राप्ति के लिए अपनी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा मान लिया था। 9 किलोमीटर का एक तरफ का सफर तय करने में हमें एक से डेढ़ घंटा लगता था। यानि घर से विद्यालय जाने और विद्यालय से घर आने के लिए हमें प्रतिदिन न्यूनतम 3 घंटे का समय खर्च करना होता था जबकि कस्बे के बच्चे इस 3 घंटे को अपने अध्ययन अथवा मनोरंजन में लगा सकते थे। इस संघर्ष ने मेरे अंदर बचपन से एक पीड़ा पैदा की। मैं हमेशा सोचता था कि लड़कों के लिए शिक्षा के कई विकल्प रहते हैं, वह विद्यालय पैदल जा सकता है, किसी से लिफ्ट ले सकता है, किसी के वाहन पर लटककर जा सकता है। लेकिन लड़कियों के लिए इस जोखिम उठाने का मतलब है मौत को दावत देना, जिल्लत को दावत देना। अतः मैं हमेशा बालिका शिक्षा को लेकर सोचता था कि हमारा गांव काफी बड़ा है इसके आसपास तीन 3 किलोमीटर की परिधि में पिण्डोरा, सापला, मुंडेट,कच्ची गढ़ी, भाटू,दुल्लाखेडी,जाफरपुर,फुंसगढ़ एवं जहांगीरपुर जैसे कई गांव एवं मजरे अवस्थित हैं। ऐसे में क्यों न गांव में इंटर कॉलेज एवं डिग्री कॉलेज की व्यवस्था होनी चाहिए? मैंने अपने करियर के लिए आईएएस बनने का सपना देखा और उस सपने के साथ साथ बडा हुआ, गांव में महिला शिक्षा को लेकर कुछ रचनात्मक कार्य करने का मेरा संकल्प। जिसको मैंने गांव में बालिका डिग्री कॉलेज की स्थापना से संबंधित कर लिया। कुछ वर्ष पहले गांव में ही बालिका इंटर कॉलेज की स्थापना हुई, तो मुझे बहुत खुशी हुई कि चलो मेरे गांव तथा आसपास की लड़कियों की कम से कम उच्चतर माध्यमिक स्तर की शिक्षा की व्यवस्था तो स्थानीय रूप से गांव में हुई ! इसके बाद मैं हमेशा गांव में गर्ल्स डिग्री कॉलेज खोलने के लिए सपना देखता रहा, मेरा कैरियर का सपना तो पूरा हो गया। उत्तर प्रदेश पीसीएस में 2009 की परीक्षा में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर मेरा चयन हो गया। लेकिन गांव में डिग्री कॉलेज की स्थापना का मेरा सपना अभी बाकी था। इसके लिए मैं सतत प्रयत्नशील रहा। जगह की तलाश करता रहा। गांव में ही एक जगह देखी उसके लिए खरीदने की बात करके एक लाख रुपए बयाना भी दे दिया गया। लेकिन कुछ कारणवश मुझे वह अपना फैसला वापस लेना पड़ा और वहां गया हुआ मेरा एक लाख रुपया वापस नहीं आया। इसके बाद भी मेरे प्रयास समाप्त नहीं हुई और अचानक फिर जो हुआ वह जैसे बालिकाओं की उच्चतर शिक्षा के लिए देखे गए मेरे सपने को पंख लगाने वाला कार्य था। गांव के ही श्री राकेश कश्मीर सिंह का मुझे अद्वितीय एवं अद्भुत सहयोग प्राप्त हुआ। जब श्री राकेश कश्मीर सिंह ने मुझे आश्चर्यचकित करते हुए यह तय किया कि वह अपने पास उपलब्ध 12.5 बीघा जमीन कॉलेज को दान देने के लिए तैयार हैं बशर्ते कि मैं उनके आजीवन रहन-सहन, खान-पान एवं सुरक्षा की व्यवस्था करना सुनिश्चित करूँ।  बातें तय हुई कि राकेश को कॉलेज के लिए गठित किए जाने वाले प्रेम कुल मिशन ट्रस्ट में आजीवन ट्रस्टी रखा जाएगा। इसके अतिरिक्त कॉलेज कार्यकारणी के लिए श्री राकेश कश्मीर सिंह को ही कार्यकारिणी का आजीवन अध्यक्ष भी रखा जाएगा। उनके साथ एक कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति कार्यकारिणी कर सकती है। ट्रस्ट द्वारा राकेश को भरण पोषण के लिए जब तक कॉलेज को मान्यता नहीं मिलती और सत्र शुरू नहीं होता है तब तक प्रतिमाह ₹5000 एवं उसके बाद प्रतिमाह ₹10000 आजीवन ट्रस्ट की ओर से दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त कॉलेज से यदि कोई आय होती है तो उसमें भी श्री राकेश को 15% की साझेदारी दी जाएगी। कॉलेज निर्माण में, उसके संचालन में जो भी खर्च आएगा वह केवल ट्रस्ट द्वारा वहन किया जाएगा जिसमें श्री राकेश जी की ओर से कोई खर्च नहीं किया जाएगा। यह सब तय होने के बाद 29 सितंबर 2016 को रजिस्ट्रार कैराना के पास प्रेम कुल मिशन ट्रस्ट पंजीकृत कराया गया। उसके बाद 3 अक्टूबर 2016 को श्री राकेश कश्मीर सिंह ने अपनी 12.5 बीघा जमीन का प्रेम कुल मिशन ट्रस्ट के नाम गिफ्ट डीड के रूप में बैनामा कर दिया। इस प्रकार ग्राम हथछोया में बालिका शिक्षाओं के लिए देवस्थली विद्यापीठ निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके बाद बसंत पंचमी के दिन इस भूमि पर भूमि पूजन के साथ साथ कॉलेज के लिए नींव पूजन कर दिया गया। अप्रैल 2017 में विधिवत तरीके से कॉलेज निर्माण के लिए कार्य शुरु हो गया जो अभी तक चल रहा है। 2017 तक के लिए चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, जिसके अधिकार क्षेत्र में ग्राम हथछोया आता है, ने नए कालेजों के मान्यता देने पर रोक लगाई हुई थी। इसको बाद में 2019 तक बढ़ा दिया गया। लेकिन हाल ही में कुलपति, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय द्वारा एक सकारात्मक फैसला लिया गया जिसके अनुसार 2018-19 के सत्र के लिए पारंपरिक पाठ्यक्रमों के लिए नए कॉलेजों को विश्वविद्यालय द्वारा संबद्धता प्रदान की जाएगी। अतः इस फैसले से यह उम्मीद जगी है कि वर्ष 2018 में जुलाई से देवस्थली विद्यापीठ बालिका डिग्री कॉलेज में 2018-19 के लिए प्रवेश प्रक्रिया प्रारंभ हो जाएगी, और क्षेत्र की बेटियां आसमान छूने के उनके प्रयासों को अंजाम देने के लिए उच्च शिक्षा के अपने सपने को साकार कर पाने का अवसर सामने खड़ा होगा। ऐसा होने से इस क्षेत्र में एक व्यापक सामाजिक शैक्षणिक बदलाव की प्रक्रिया प्रारंभ होगी। गांव की बेटियां तो उचित शिक्षा प्राप्त कर ही पाएंगी, अन्य क्षेत्रों से क्षेत्र में आने वाली बेटियां जो बहू बनकर आती हैं वह भी अपनी आगामी शिक्षा को जारी रख पाने में सफल होंगी। वह भी अपने सपनों को हकीकत में बदलने की ओर उन्नति के कदम बढ़ाएंगे।
इस कॉलेज की स्थापना के लिए किए जाने वाले हमारे प्रयासों में कई नकारात्मक सोच के तत्वों द्वारा बाधाएं उत्पन्न करने के प्रयास किए गए लेकिन मैं और मेरे साथी उनके कुत्सित प्रयासों के आगे न तो झुके और न हीं हमारा मनोबल कम हुआ। इस कॉलेज निर्माण में आने वाली बाधाओं को देखकर मुझे एहसास हुआ कि वास्तव में पुराने समय में रामपुर मनिहरण में गोचर महाविद्यालय के संस्थापक आधुनिक शिक्षा गुरु श्री मुल्तान सिंह वर्मा एवं महामना मदन मोहन मालवीय जी जिन्होंने आधुनिक भारत के महत्वपूर्ण शिक्षा मंदिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना रखी थी, को शिक्षा के प्रति आंदोलन खड़ा करने, शिक्षा संस्थान खड़ा करने में कितनी बाधाएं आई होंगी? इसका अनुमान लगाना भी वर्तमान परिस्थितियों में कठिन है। उस समय की परिस्थितियां आज की परिस्थितियों से सर्वथा भिन्न थी। आज संसाधन भी है, उस समय इतने संसाधन नहीं थे। इतने कम संसाधनों में उन महान शिक्षा पुरुषों ने आधुनिक शिक्षा मंदिरों की स्थापना की। यह वास्तव में मुझे और शिक्षा के प्रति समर्पित अन्य व्यक्तियों को निश्चित रूप से प्रेरणा देने वाला है। मेरा यह भी मानना है आज समाज में ऐसी प्रवृत्तियां उपलब्ध हैं कि हर अच्छे कार्य का समाज में विरोध होता है। आज बुरे कार्यों का विरोध करने वालों की संख्या नगण्य है। ऐसे में अब यह संदेह होने लगा है कि यदि किसी कार्य का विरोध ना हो तो कहीं वह अच्छा है भी या नहीं? यह सोचना पड़ता है। इसलिए हमारे इस शिक्षा आंदोलन के प्रति नकारात्मक प्रवृतियों की और से किए जा रहे विरोध को हमने हमेशा सकारात्मक रूप से लिया है। और उससे इस महान एवं पुनीत कार्य को करने के प्रति मेरा और मेरे साथियों का संकल्प पहले से कहीं अधिक दृढ़ हुआ है। विश्वास अटल हुआ है और हमें उम्मीद है कि जब हम नहीं होंगे उस समय आने वाली पीढ़ियां बड़ी विनम्रता और श्रद्धा के साथ शायद हमारा नाम लेंगे। हमें याद करेंगे। उस समय तक तो उनको विरोधियों के न नाम पता होंगे और न उनके काम पता होंगे। क्योंकि कॉलेज निर्माण के इतिहास में कहीं भी किसी भी स्तर पर हमने संकल्प लिया है कि विरोधियों को अमर नहीं होने देना है। कॉलेज के इतिहास में विरोधियों का नाम कहीं दर्ज नहीं होना है आने वाली पीढ़ियां हमारे मरने के बाद भी हमें तो याद रखेंगी, विरोधियों के तो उनको नाम तक भी मालूम न होंगे ।देवस्थली की नींव में कंधे से कंधा मिलाकर आहुति देने वालों में मेरे पिताश्री प्रेम सिंह दिलावरे, बड़े भाई संजय सिंह दिलावरे,महिपाल सिंह और सत्यपाल सिंह तोमर का नाम भी याद रखा जाएगा।हथछोया की दो भू-देवियों को भावी पीढियां श्रद्धा के साथ याद करेंगी जिन्होंने संस्थान की हमारी अवधारणा को भूदान करके जमीन पर उतारा।ये दो देवियां है, श्रीमती प्रेमो कश्मीर सिंह जो राकेश कश्मीर सिंह की माता जी है और उन्होंने 12.5 बीघा जमीन दान की जिस कारण हम अपने सपने को धरातल पर उतार सके।दूसरी भूदेवी हैं मेरी माताजी जिन्होंने 1.5 बीघा जमीन खरीदकर देवस्थली निर्माण हेतु प्रेमकुल मिशन ट्रस्ट को दान की थी।यह सपनों की वह भूमि है जिस पर हमें सुनहरे भविष्य का निर्माण करना है।
#निजिरायसत्यम

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

संघ से उपजे आदर्श एवं जीवन मूल्य

                                                        वर्ष 1982-83 वह वर्ष था जब मेरी संस्थागत शिक्षा शुरू हुई थी। आरंभिक दिनों मे मै और मेरे कई बाल सखा सैदली ( प्रारम्भिक पाठशाला नंबर-दो) और शिवाले (प्रारम्भिक पाठशाला नंबर-एक के बीच झूलते रहे। जिस दिन जिस स्कूल में जाने का मन होता,उस दिन उसी स्कूल की और हमारा कारवां चल देता। सैदली ( सैयद अली की मजार के कारण प्रारम्भिक पाठशाला नंबर-दो को सैदली के नाम से जानते, यहाँ किसी सैयद अली की एक मजार थी जिस पर कुछ लोग कभी-कभी दिया जलाने जाते थे। मुझे याद नहीं है कि मैंने वहाँ कभी पूजा जैसी कोई चीज कि हो क्योंकि पीर-मजार के प्रति मेरी कोई श्रद्दा नहीं थी और न आज भी ऐसी श्रद्धा कभी जाग्रत हुई। मेरे विचार से इनमे पूजा-आराधना जैसी कोई बात नहीं है, ये सिर्फ कुछ मृत लोगों की कब्र मात्र हैं।) मे मेरी बड़ी बहन प्रमिला पढा करती थी, इसीलिए मै अक्सर उन्ही के साथ इस स्कूल को भी अपना ही समझता था। इस स्कूल मे सुशीला बहन जी प्रधानाध्यापिका थी,जिनकी छवि हमारे बालमन पर बहुत अच्छी बहन जी के रूप मे अंकित थी। एक दिन हम जब सेदली स्कूल मे गए हुए थे तो हमने देखा कि वहाँ  ताजी खुदी हुई मिट्टी का ढेर पड़ा हुआ है।स्कूल चल रहा था रेसिस भी नहीं हुई थी। बहन जी एक कमरे के दरवजे पर इस तरह  सीट लगाकर बैठी हुई थी कि  वहाँ से पूरे स्कूल पर नजर रख सकती थी। लेकिन मै और मेरे बालसखा स्वयं को चतुर सुजान मानकर बारी-बारी अपनी जगह से उठकर उस ढेर पर दौड़कर पहुँच जाते और मिट्टी का आनंद लेकर झट से अपने स्थान पर आकार बैठ जाते। एक प्रकार तहम बहन जी कि आंखो मे धूल झौंक रहे थे। पहले तो बहन जी हमे अनदेखा करती रही लेकिन जब हमारी हरकतें उनकी सहन सीमा को लांघ गई तो उन्होने उठकर हमरी पीठ पर दो-दो डंडे जड़ दिये। हमारा खेल खत्म हो गया और “बहन जी की अच्छाई का हमारे मस्तिष्क मे बना किला “ ध्वस्त हो गया। अगले ही दिन से शिवाले के स्थायी छात्र बन गए। 
    दो-दो डंडे खाने के बाद हम सैदली का रास्ता भूल सही रास्ते पर आ गए। अब शिवाला ही हमारा स्कूल था। इस स्कूल की दीवार से लगा हुआ गाँव का प्राचीन शिव मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण कभी लाला सुरेन्द्र सिंघल जी के पिता श्री लाला गीताराम जी ने कराया था। इस शिवाले से लगे होने के कारण ही प्राथमिक विध्यालय हथछोया नंबर-एक को लोग सिर्फ शिवाला ही कहते थे। स्कूल की चाहारदीवारी एवं प्रवेश द्वार थे लेकिन सभी सभी दीवारों से इंटे चुराकर आस-पास के लोगों ने बड़े-बड़े कई अनधिकृत छिद्रनुमा द्वार भी बना रखे थे। इतना ही नहीं लोगों ने शिवाले की मुख्य दीवारों तक को नहीं छोड़ा था । इस दीवार की इंटे भी उस समय के आस-पास के घरों को मजबूती प्रदान कर रही थी। शिवाले के पीछे तालाब था जहां हम अक्सर समय बिताने के लिए “निवृत्त” होने के बहाने जाते थे। यह कार्य उस समय तक जारी  रहा जब तक कि हमने इस स्कूल से पाँचवी कक्षा पास करके इसे छोड़ नहीं दिया।
सामंती कीड़े:
शिवाले मे जब हम पढ़ते थे तो पिंडौरा के श्री शादीराम शर्मा जी हेड-मास्टर थे। उनके अलावा श्री समय सिंह –दुल्ला खेड़ी,श्री पदम सिंह एवं श्री निरंजन सिंह-गागौर और श्री रामस्वरुप जी –कैल शिकारपुर, सहायक अध्यापक थे। उस समय का ग्रामीण स्कूली जीवन अब समाप्त हो गया है। वह एक ऐसा दौर था जो अब सिर्फ इतिहास और कौतूहल कि बाते है। हम घर से ही बैठने के लिए जूट की बोरी लेकर जाते थे। सुलेख के लिए तख्ती और अभ्यास के लिए स्लेट, हमारी स्कूल किट का जरूरी हिस्सा थी। तख्ती हाथ मे लेकर जाते थे जिसे रोजाना मुलतानी मिट्टी से पोतकर ले जाते थे। तख्ती लेखन दैनिक स्कूल कार्य का जरूरी भाग था। सरकंडे के पौरे से बने कलम के द्वार काली स्याही मे “डौब्भा” लेकर किताब से कुछ लाइने लिखते थे ताकि हमारा हस्त-लेख सुंदर बन सके। इमला (डिक्टेसन) और नकल (किताब से देखकर लिखना ) हमारी स्कूली दिनचर्या का नियमित कार्यक्रम था। कक्षा मे मॉनिटर के लिए मेरा, रवीन्द्र(बीटू) ( पुत्र -मेहर सिंह दिलावरे), अश्वनी शर्मा (बिट्टू) (पुत्र- मास्टर जगरोशन जी) का अघोषित गठबंधन था। हमने कभी किसी अन्य छात्र को कभी अपने अलावा मॉनिटर नहीं बनने दिया। स्कूल मे सफाई कर्मचारी की व्यवस्था नहीं थी। स्कूल मे नियमित सफाई के लिए छात्रों की टौलियां बनाई गई थी, जिनकी ज़िम्मेदारी थी कि वे समय से पहले स्कूल आकर पूरे स्कूल मे झाड़ू लगाए, और पूरे स्कूल को साफ सुथरा रखे। उस समय इस व्यवस्था पर किसी ने सवाल खड़े नहीं किए बल्कि इसे स्कूली अनुशासन का हिस्सा माना जाता था। यह ग्रामीण परिवेश और सामंती पृष्ठभूमि का ही असर था कि उस समय हमारे बालमन मे भी सामंती कीड़े असर रखते थे। हमने कभी भी अपना नंबर आने पर स्कूल मे झाड़ू नहीं लगाई। ऐसा करने मे हम अपना अपमान समझते थे । अक्सर हम दादागिरी के दम पर अन्य लड़कों से झाड़ू लगवाया करते थे। खासकर गैर-खेतिहर जातियों के लड़कों से। आज जब उस समय और सोच के बारे मे सोचता हूँ तो स्वयं से नफरत होने लगती है कि कैसे मै कुछ समय के लिए सामंती और जातीय भावना का शिकार रहा हूँ । भले ही यह मेरा बचपन ही क्यों न था ! इस तरह कि सोच उस समय कि एक कटु सच्छाई भी थी। अच्छी बात यह रही कि यह घटिया सोच मेरे ऊपर ज्यादा दिन तक हवी नहीं रह पाई। कक्षा-तीन तक आते-आते मेरी सोच मे व्यापक बदलाव हुआ । उस समय अतरे चूहड़े का लड़का बिजेन्द्र बाल्मीकी मेरा अच्छा दोस्त बन गया, जिसने बाद मे गाँव छोड़ दिया और परिवार सहित लुधियाना जा बसा, यही वह समय था जब कंवरपल कश्यप से मेरी गहरी दोस्ती हुई।
संघ के संस्कारों ने विकार नही पलने दिए।जाति-भेद अथवा ऊंच-नीच और छुआछूत जैसी कोई विकृत्ति दिमाग मे कभी जगह नही बना पाई।संघी संस्कारों ने विकृत्ति के सभी कीड़ों को समय पर मार दिया।संघ शाखा में दक्ष-आरम करते करते कब व्यक्तित्व में वक्तृव्य कला,नेतृत्व क्षमता,धैर्य,दूरदृष्टि आदि ने जगह बना ली,कभी जान नही पाया।नैतिक शिक्षा और गुणों का जो अभाव विद्यालयी शिक्षा के दौरान रहा उसकी पूर्ति संघ शाखा से हुई।जीवन मूल्य और नैतिक आदर्श निश्चित रूप से संघ के संस्कारों की उपज हैं,जो आज भी जीवन की कंटीली राहों पर कभी विचलित होने नही देते हैं।।