सुजानखेड़ी..में बगिया

सुजानखेड़ी..में बगिया

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

संघ से उपजे आदर्श एवं जीवन मूल्य

                                                        वर्ष 1982-83 वह वर्ष था जब मेरी संस्थागत शिक्षा शुरू हुई थी। आरंभिक दिनों मे मै और मेरे कई बाल सखा सैदली ( प्रारम्भिक पाठशाला नंबर-दो) और शिवाले (प्रारम्भिक पाठशाला नंबर-एक के बीच झूलते रहे। जिस दिन जिस स्कूल में जाने का मन होता,उस दिन उसी स्कूल की और हमारा कारवां चल देता। सैदली ( सैयद अली की मजार के कारण प्रारम्भिक पाठशाला नंबर-दो को सैदली के नाम से जानते, यहाँ किसी सैयद अली की एक मजार थी जिस पर कुछ लोग कभी-कभी दिया जलाने जाते थे। मुझे याद नहीं है कि मैंने वहाँ कभी पूजा जैसी कोई चीज कि हो क्योंकि पीर-मजार के प्रति मेरी कोई श्रद्दा नहीं थी और न आज भी ऐसी श्रद्धा कभी जाग्रत हुई। मेरे विचार से इनमे पूजा-आराधना जैसी कोई बात नहीं है, ये सिर्फ कुछ मृत लोगों की कब्र मात्र हैं।) मे मेरी बड़ी बहन प्रमिला पढा करती थी, इसीलिए मै अक्सर उन्ही के साथ इस स्कूल को भी अपना ही समझता था। इस स्कूल मे सुशीला बहन जी प्रधानाध्यापिका थी,जिनकी छवि हमारे बालमन पर बहुत अच्छी बहन जी के रूप मे अंकित थी। एक दिन हम जब सेदली स्कूल मे गए हुए थे तो हमने देखा कि वहाँ  ताजी खुदी हुई मिट्टी का ढेर पड़ा हुआ है।स्कूल चल रहा था रेसिस भी नहीं हुई थी। बहन जी एक कमरे के दरवजे पर इस तरह  सीट लगाकर बैठी हुई थी कि  वहाँ से पूरे स्कूल पर नजर रख सकती थी। लेकिन मै और मेरे बालसखा स्वयं को चतुर सुजान मानकर बारी-बारी अपनी जगह से उठकर उस ढेर पर दौड़कर पहुँच जाते और मिट्टी का आनंद लेकर झट से अपने स्थान पर आकार बैठ जाते। एक प्रकार तहम बहन जी कि आंखो मे धूल झौंक रहे थे। पहले तो बहन जी हमे अनदेखा करती रही लेकिन जब हमारी हरकतें उनकी सहन सीमा को लांघ गई तो उन्होने उठकर हमरी पीठ पर दो-दो डंडे जड़ दिये। हमारा खेल खत्म हो गया और “बहन जी की अच्छाई का हमारे मस्तिष्क मे बना किला “ ध्वस्त हो गया। अगले ही दिन से शिवाले के स्थायी छात्र बन गए। 
    दो-दो डंडे खाने के बाद हम सैदली का रास्ता भूल सही रास्ते पर आ गए। अब शिवाला ही हमारा स्कूल था। इस स्कूल की दीवार से लगा हुआ गाँव का प्राचीन शिव मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण कभी लाला सुरेन्द्र सिंघल जी के पिता श्री लाला गीताराम जी ने कराया था। इस शिवाले से लगे होने के कारण ही प्राथमिक विध्यालय हथछोया नंबर-एक को लोग सिर्फ शिवाला ही कहते थे। स्कूल की चाहारदीवारी एवं प्रवेश द्वार थे लेकिन सभी सभी दीवारों से इंटे चुराकर आस-पास के लोगों ने बड़े-बड़े कई अनधिकृत छिद्रनुमा द्वार भी बना रखे थे। इतना ही नहीं लोगों ने शिवाले की मुख्य दीवारों तक को नहीं छोड़ा था । इस दीवार की इंटे भी उस समय के आस-पास के घरों को मजबूती प्रदान कर रही थी। शिवाले के पीछे तालाब था जहां हम अक्सर समय बिताने के लिए “निवृत्त” होने के बहाने जाते थे। यह कार्य उस समय तक जारी  रहा जब तक कि हमने इस स्कूल से पाँचवी कक्षा पास करके इसे छोड़ नहीं दिया।
सामंती कीड़े:
शिवाले मे जब हम पढ़ते थे तो पिंडौरा के श्री शादीराम शर्मा जी हेड-मास्टर थे। उनके अलावा श्री समय सिंह –दुल्ला खेड़ी,श्री पदम सिंह एवं श्री निरंजन सिंह-गागौर और श्री रामस्वरुप जी –कैल शिकारपुर, सहायक अध्यापक थे। उस समय का ग्रामीण स्कूली जीवन अब समाप्त हो गया है। वह एक ऐसा दौर था जो अब सिर्फ इतिहास और कौतूहल कि बाते है। हम घर से ही बैठने के लिए जूट की बोरी लेकर जाते थे। सुलेख के लिए तख्ती और अभ्यास के लिए स्लेट, हमारी स्कूल किट का जरूरी हिस्सा थी। तख्ती हाथ मे लेकर जाते थे जिसे रोजाना मुलतानी मिट्टी से पोतकर ले जाते थे। तख्ती लेखन दैनिक स्कूल कार्य का जरूरी भाग था। सरकंडे के पौरे से बने कलम के द्वार काली स्याही मे “डौब्भा” लेकर किताब से कुछ लाइने लिखते थे ताकि हमारा हस्त-लेख सुंदर बन सके। इमला (डिक्टेसन) और नकल (किताब से देखकर लिखना ) हमारी स्कूली दिनचर्या का नियमित कार्यक्रम था। कक्षा मे मॉनिटर के लिए मेरा, रवीन्द्र(बीटू) ( पुत्र -मेहर सिंह दिलावरे), अश्वनी शर्मा (बिट्टू) (पुत्र- मास्टर जगरोशन जी) का अघोषित गठबंधन था। हमने कभी किसी अन्य छात्र को कभी अपने अलावा मॉनिटर नहीं बनने दिया। स्कूल मे सफाई कर्मचारी की व्यवस्था नहीं थी। स्कूल मे नियमित सफाई के लिए छात्रों की टौलियां बनाई गई थी, जिनकी ज़िम्मेदारी थी कि वे समय से पहले स्कूल आकर पूरे स्कूल मे झाड़ू लगाए, और पूरे स्कूल को साफ सुथरा रखे। उस समय इस व्यवस्था पर किसी ने सवाल खड़े नहीं किए बल्कि इसे स्कूली अनुशासन का हिस्सा माना जाता था। यह ग्रामीण परिवेश और सामंती पृष्ठभूमि का ही असर था कि उस समय हमारे बालमन मे भी सामंती कीड़े असर रखते थे। हमने कभी भी अपना नंबर आने पर स्कूल मे झाड़ू नहीं लगाई। ऐसा करने मे हम अपना अपमान समझते थे । अक्सर हम दादागिरी के दम पर अन्य लड़कों से झाड़ू लगवाया करते थे। खासकर गैर-खेतिहर जातियों के लड़कों से। आज जब उस समय और सोच के बारे मे सोचता हूँ तो स्वयं से नफरत होने लगती है कि कैसे मै कुछ समय के लिए सामंती और जातीय भावना का शिकार रहा हूँ । भले ही यह मेरा बचपन ही क्यों न था ! इस तरह कि सोच उस समय कि एक कटु सच्छाई भी थी। अच्छी बात यह रही कि यह घटिया सोच मेरे ऊपर ज्यादा दिन तक हवी नहीं रह पाई। कक्षा-तीन तक आते-आते मेरी सोच मे व्यापक बदलाव हुआ । उस समय अतरे चूहड़े का लड़का बिजेन्द्र बाल्मीकी मेरा अच्छा दोस्त बन गया, जिसने बाद मे गाँव छोड़ दिया और परिवार सहित लुधियाना जा बसा, यही वह समय था जब कंवरपल कश्यप से मेरी गहरी दोस्ती हुई।
संघ के संस्कारों ने विकार नही पलने दिए।जाति-भेद अथवा ऊंच-नीच और छुआछूत जैसी कोई विकृत्ति दिमाग मे कभी जगह नही बना पाई।संघी संस्कारों ने विकृत्ति के सभी कीड़ों को समय पर मार दिया।संघ शाखा में दक्ष-आरम करते करते कब व्यक्तित्व में वक्तृव्य कला,नेतृत्व क्षमता,धैर्य,दूरदृष्टि आदि ने जगह बना ली,कभी जान नही पाया।नैतिक शिक्षा और गुणों का जो अभाव विद्यालयी शिक्षा के दौरान रहा उसकी पूर्ति संघ शाखा से हुई।जीवन मूल्य और नैतिक आदर्श निश्चित रूप से संघ के संस्कारों की उपज हैं,जो आज भी जीवन की कंटीली राहों पर कभी विचलित होने नही देते हैं।।

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