सुजानखेड़ी..में बगिया

सुजानखेड़ी..में बगिया

रविवार, 15 अक्टूबर 2017

1857 दिलावरे

गंगा यमुना दोआब के यमुना खादर क्षेत्र में 1857 की क्रांति की मशाल जलाने में दिलावरों अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका रही।उस समय शामली तहसील मुख्यालय के साथ साथ आयुधागर भी था।सौरम पंचायत में शामिल क्षेत्र की प्रमुख सामाजिक हस्तियों ने आयुधागर एवं कोषागार को लूटकर अंग्रेजों के विरुद्ध छेडने की योजना बनाई ।योजना का नेता शामली के चौधरी मोहर सिंह को बनाया गया जिन्होंने हथछोया के भजन सिंह दिलावरे को सैन्य नेतृत्व की बागडौर सौंपी।भजन सिंह घुडसवारी के बहुत शौकीन थे। तलवारबाजी और एनफील्ड राइफल चलाना बखूबी जानते थे।योजनानुसार क्रान्तिकारियों ने कोष एवं आयुध लूट को अंजाम दिया और तहसील मुख्यालय पर नियंत्रण स्थापित कर दिया।करों की वसूली स्थगित कर दी गई और स्वतंत्रता की मुनादी कराई गई।लेकिन यह स्वतंत्रता अस्थाई सिध्द हुई।शीघ्र ही मुज़फ्फरनगर से अंग्रेज सेना, शामली रवाना की गई। जिससे बनत में क्रांतिकारियों की मुठभेड़ हुई।क्रांतिकारी सेना प्रशिक्षित नही थी।अतः वह बहुत ज्यादा समय तक अंग्रेजी सेना के प्रशिक्षित रंगरूटों का सामना नही कर पाई। मोहर सिंह की बनत में शहादत से क्रांतिकारियों के पैर उखड़ गए।अनेक क्रांतिकारी शहीद हो गए,अनेक घायल।कई कैदियों को गिरफ्तार कर तत्काल बिना कानूनी प्रक्रिया के ही फांसी दे दी गई।क्रांति को जिंदा रखने के लिए भजन सिंह एवं उनके अन्य साथी भूमिगत हो गए और अगले संघर्ष की तैयारी की योजना बनाने लगे।
क्रांति योजना एवं प्रचार माध्यम:
1857 की क्रांति में गांव दर गांव क्रांति संदेश भेजने के लिए क्रांतिकारियों ने कमल के फूल और रोटी को ढाल बनाया था। इस बात के प्रमाण नही हैं कि रोटी कमल का प्रयोग पहली बार यहीं हुआ था अथवा नही।लेकिन भजन सिंह के प्रपौत्र फूल सिंह दिलावरे एवं मंगल सिंह दिलावरे के अनुसार रोटी कमल की संदेश के रूप में प्रयोग करने की शुरुआत जनपद मुजफ्फरनगर (अब शामली) के गांव हथछोया से हुई थी। इसके लिए हथछोया की लाडो गुर्जरी ने पहली रोटी बनाई थी। 1857 की क्रांति में क्रांतिकारियों का एक नारा था:- "अम्बुजाना रोटी पकाना दरिया पार कराना"। 1824 में सहारनपुर के गांव कुंजा-बहादुरपुर जो कि अब उत्तराखंड के हरिद्वार जनपद के अंतर्गत आता है, में हुए किसान विद्रोह ने ही 1857 की क्रांति के बीज बो दिए थे। इस विद्रोह के दमन से क्षेत्र की जनता को मर्मांतक आघात पहुंचा था। हथछोया- सुजानखेडी के सुजान सिंह दिलावरे के प्रपौत्र रोढ़ा सिंह गुर्जर इस विद्रोह के स्थानीय नेता थे। विद्रोह के नेता विजय सिंह पथिक उनके करीबी रिश्तेदार थे। इस विद्रोह के दमन के दौरान अंग्रेजों ने अनेक गांव नष्ट कर दिए थे।  सुजानखेडी भी पूरी तरह नष्ट कर दिया गया था। आज भी मुजफ्फरनगर, (वर्तमान में शामली) जनपद के राजस्व दस्तावेजों में ऊन तहसील का यह गांव एक गैर आबाद गांव के रूप में दर्ज है। लोगों ने तंग आकर के एक व्यापक क्रांति की योजना बनानी शुरू कर दी थी।
धौला-कुंआ प्रकरण:
इसी बीच हथछोया का धौला-कुआं प्रकरण हो गया। दूधिया पानी वाले धौले कुएं को अंग्रेजों ने जबरन बंद करा दिया। विरोध प्रदर्शन में हथछोया के अनेक लोग शहीद हुए, जिनमें गांव की सभी जातियों के लोग शामिल थे। यह घटना 1855 के अंत में हुई ।इसी दौरान विद्रोह  का नेतृत्व करने के लिए रोढ़ा सिंह को फांसी की सजा दे दी गई। उनके पुत्र भजन सिंह गुर्जर उर्फ उर्फ भज्जू दिलावरे ने व्यापक क्रांति की योजना बनाने के लिए अपने साथियों से सलाह करनी प्रारंभ कर दी।
रोटी और कमल से सन्देश:
उनकी पत्नी लाड़ो गुर्जरी के सुझाव पर क्रांतिकारियों ने कमल के फूल एवं रोटी को आसपास के क्षेत्रों में क्रांति संदेश पहुंचाने के लिए पहली बार प्रयोग किया था।क्रांति संदेश के लिए पहली रोटी लाडो गुजरी नहीं बनाई थी। कमल का फूल गांव के विशाल तालाब से लिया गया था, जिसे डाबर के नाम से जाना जाता था।
क्रांति संदेश के लिए कमल का फूल एवं रोटी प्रयुक्त किए जाने का कारण बताया गया कि कमल का फूल स्वतंत्रता एवं स्वच्छता तथा रोटी संघर्ष का प्रतीक होती है। यानि कमल के फूल एवं रोटी गांव दर गांव पहुंचाकर यह संदेश देना था कि देश को स्वच्छ एवं स्वतंत्र कराने के लिए संघर्ष होना है। अतः इसमें शामिल होने के लिए आप सभी तैयार हों। इसके लिए संदेश वाहक एक रोटी तथा कमल का फूल लेकर के क्रांति सन्देश प्रसारित करने के लिए गांव दर गांव जाता था। आस-पास के गांव में क्रांति की योजना के संदर्भ में संदेश प्रेषित करने के लिए क्रांतिकारियों द्वारा रोटी एवं कमल के फूल का रूप में इस्तेमाल किया जाता था। क्रांति संदेश के लिए कमल का फूल एवं रोटी प्रयुक्त किए जाने का कारण आप सभी देश के विदेशी परतंत्रता का जुआ उखाड़ फेंकने के लिए होने वाले राष्ट्रीय संघर्ष में शामिल हों। इसके लिए संदेश वाहक एक कूट वाक्य भी कमल एवं रोटी प्राप्त करने वाले क्रांतिकारी को देता था। यह संदेश था अम्बुजना ना रोटी पकाना दरिया पार कराना अर्थात स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करो और अंग्रेजों को समुद्र पार भगाओ। कमल का फूल उपलब्ध न होने के कारण हर जगह पहुंचना संभव नहीं था। इसलिए अधिकांश जगह सिर्फ रोटी से संदेश भेजा जाता था। सामान्यत गांव का चौकीदार जो क्रांतिकारी की भूमिका भूमिका में था, अथवा अन्य कोई जिम्मेदार व्यक्ति अपने गांव से अगले गांव में रोटी भिजवाता था। कमल एवं रोटी द्वारा संदेश भिजवाने के पुरातात्विक साक्ष्य मिलना संभव नहीं है। लेकिन अनेक इतिहासकार इसका वर्णन करते हैं तथा कुछ इतिहासकार इसे सिरे से खारिज भी करते हैं। खड़ंगे ग़दर नाम से 1857 की घटनाओं का आंखों देखा विवरण लिखने वाले पहाड़गंज दिल्ली के उस समय के थानेदार मोइनुद्दीन हसन स्वयं रोटी द्वारा क्रांति भिजवाने का जिक्र करते हैं। वह अपनी पुस्तक में कहते हैं "एक दिन इंद्रपथ का चौकीदार थाने में आया और उसने बताया कि मेरे हाथ में जो चपाती है। यह तुम अपने पास रखो और ऐसी ही 5 चपातियां 5 गांव में जहां यह न पहुंची हो पका करके दे आओ। मैंने उस चपाती को स्वयं देखा था। वह हथेली के बराबर दो तोले वजन की गेहूं और जौ की बनी हुई चपाती थी। दिल्ली के तत्कालीन मजिस्ट्रेट जान मेटकाफ ने अपने तमाम थानेदारों को चपाती के बारे में रिपोर्ट देने के लिए लिखा था। जिस रोटी ने देशभर में 1857 की क्रांति का संदेश गांव दर गांव भिजवाया था वह हथछोया से चली थी। हथछोया के भजन सिंह दिलावर एवं अन्य बहुत से क्रांतिकारियों ने 1857 में ही देश की स्वतंत्रता की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। लेकिन आज तक इन स्वर्णिम ऐतिहासिक घटनाओं पर कोई न तक कोई अनुसंधान ही हुआ है और न ही शासन प्रशासन स्तर पर इसकी स्मृतियों को सहेजने के लिए कुछ किया। यहां तक कि भजन सिंह जैसे क्रांतिकारियों के स्मारक के नाम पर एक पत्थर भी कहीं नहीं लगा है।

                               @ सुनील सत्यम

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