सुजानखेड़ी..में बगिया

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सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

देवस्थली: सच होंगे सपने।

शिक्षा प्राप्ति के लिए संघर्ष क्या होता है? जद्दोजहद क्या होती है? यह हमने बखूबी देखा है। गांव में कक्षा 6 तक की पढ़ाई करने के बाद सातवीं कक्षा में मेरा एडमिशन ऊन कस्बे के डीएवी इंटर कॉलेज में हुआ था। यहीं से मैंने कक्षा 10 विज्ञान वर्ग से पास की थी। कक्षा नौ में मुझसे बड़ी मेरी बहन बबली का भी एडमिशन इसी डीएवी इंटर कॉलेज में करा दिया गया था। ग्राम से हमारे घर से इस कॉलेज की दूरी पूरे 9 किलोमीटर है। ग्राम से विद्यालय तक जाने के लिए आज की तरह विद्यालय की ओर से कोई परिवहन व्यवस्था उपलब्ध नहीं कराई जाती थी। इसके अतिरिक्त भी गांव से ऊन के बीच कोई नियमित परिवहन व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी, यद्यपि कैराना गंगोह के बीच इस मार्ग पर बहुत पहले से बसे चलती थी लेकिन हमारे अध्ययन के दौरान के वर्षों में शायद ही ऐसा कोई दिन रहा हो जिस दिन विद्यालय जाने के समय हमें उस बस की सेवा प्राप्त हुई हो। इन बसों का भी कोई निर्धारित समय नहीं था। यह कभी किसी समय आती थी तो कभी किसी समय। विद्यालय की छुट्टी के बाद कभी कभार हमें इन बसों की सेवा उपलब्ध हो जाती थी लेकिन उसके लिए भीड़ में घुसकर जगह बनाने या बस के पीछे जाल पर लटक कर गांव तक पहुंचने का जोखिम हमेशा उठाना पड़ता था। यह वह संघर्ष था जिसकी वजह से मैंने और मेरे जैसे कई छात्रों ने गांव से पढ़ने वाली कई छात्राओं ने जिनमें मेरी बहन और अन्य लड़कियां थी, प्रतिदिन घर से पैदल चलकर 9 किलोमीटर जाना और 9 किलोमीटर स्कूल से घर वापस आना के विकल्प को ही चुना था। हमने 18 किलोमीटर के इस प्रतिदिन के सफर को शिक्षा प्राप्ति के लिए अपनी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा मान लिया था। 9 किलोमीटर का एक तरफ का सफर तय करने में हमें एक से डेढ़ घंटा लगता था। यानि घर से विद्यालय जाने और विद्यालय से घर आने के लिए हमें प्रतिदिन न्यूनतम 3 घंटे का समय खर्च करना होता था जबकि कस्बे के बच्चे इस 3 घंटे को अपने अध्ययन अथवा मनोरंजन में लगा सकते थे। इस संघर्ष ने मेरे अंदर बचपन से एक पीड़ा पैदा की। मैं हमेशा सोचता था कि लड़कों के लिए शिक्षा के कई विकल्प रहते हैं, वह विद्यालय पैदल जा सकता है, किसी से लिफ्ट ले सकता है, किसी के वाहन पर लटककर जा सकता है। लेकिन लड़कियों के लिए इस जोखिम उठाने का मतलब है मौत को दावत देना, जिल्लत को दावत देना। अतः मैं हमेशा बालिका शिक्षा को लेकर सोचता था कि हमारा गांव काफी बड़ा है इसके आसपास तीन 3 किलोमीटर की परिधि में पिण्डोरा, सापला, मुंडेट,कच्ची गढ़ी, भाटू,दुल्लाखेडी,जाफरपुर,फुंसगढ़ एवं जहांगीरपुर जैसे कई गांव एवं मजरे अवस्थित हैं। ऐसे में क्यों न गांव में इंटर कॉलेज एवं डिग्री कॉलेज की व्यवस्था होनी चाहिए? मैंने अपने करियर के लिए आईएएस बनने का सपना देखा और उस सपने के साथ साथ बडा हुआ, गांव में महिला शिक्षा को लेकर कुछ रचनात्मक कार्य करने का मेरा संकल्प। जिसको मैंने गांव में बालिका डिग्री कॉलेज की स्थापना से संबंधित कर लिया। कुछ वर्ष पहले गांव में ही बालिका इंटर कॉलेज की स्थापना हुई, तो मुझे बहुत खुशी हुई कि चलो मेरे गांव तथा आसपास की लड़कियों की कम से कम उच्चतर माध्यमिक स्तर की शिक्षा की व्यवस्था तो स्थानीय रूप से गांव में हुई ! इसके बाद मैं हमेशा गांव में गर्ल्स डिग्री कॉलेज खोलने के लिए सपना देखता रहा, मेरा कैरियर का सपना तो पूरा हो गया। उत्तर प्रदेश पीसीएस में 2009 की परीक्षा में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर मेरा चयन हो गया। लेकिन गांव में डिग्री कॉलेज की स्थापना का मेरा सपना अभी बाकी था। इसके लिए मैं सतत प्रयत्नशील रहा। जगह की तलाश करता रहा। गांव में ही एक जगह देखी उसके लिए खरीदने की बात करके एक लाख रुपए बयाना भी दे दिया गया। लेकिन कुछ कारणवश मुझे वह अपना फैसला वापस लेना पड़ा और वहां गया हुआ मेरा एक लाख रुपया वापस नहीं आया। इसके बाद भी मेरे प्रयास समाप्त नहीं हुई और अचानक फिर जो हुआ वह जैसे बालिकाओं की उच्चतर शिक्षा के लिए देखे गए मेरे सपने को पंख लगाने वाला कार्य था। गांव के ही श्री राकेश कश्मीर सिंह का मुझे अद्वितीय एवं अद्भुत सहयोग प्राप्त हुआ। जब श्री राकेश कश्मीर सिंह ने मुझे आश्चर्यचकित करते हुए यह तय किया कि वह अपने पास उपलब्ध 12.5 बीघा जमीन कॉलेज को दान देने के लिए तैयार हैं बशर्ते कि मैं उनके आजीवन रहन-सहन, खान-पान एवं सुरक्षा की व्यवस्था करना सुनिश्चित करूँ।  बातें तय हुई कि राकेश को कॉलेज के लिए गठित किए जाने वाले प्रेम कुल मिशन ट्रस्ट में आजीवन ट्रस्टी रखा जाएगा। इसके अतिरिक्त कॉलेज कार्यकारणी के लिए श्री राकेश कश्मीर सिंह को ही कार्यकारिणी का आजीवन अध्यक्ष भी रखा जाएगा। उनके साथ एक कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति कार्यकारिणी कर सकती है। ट्रस्ट द्वारा राकेश को भरण पोषण के लिए जब तक कॉलेज को मान्यता नहीं मिलती और सत्र शुरू नहीं होता है तब तक प्रतिमाह ₹5000 एवं उसके बाद प्रतिमाह ₹10000 आजीवन ट्रस्ट की ओर से दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त कॉलेज से यदि कोई आय होती है तो उसमें भी श्री राकेश को 15% की साझेदारी दी जाएगी। कॉलेज निर्माण में, उसके संचालन में जो भी खर्च आएगा वह केवल ट्रस्ट द्वारा वहन किया जाएगा जिसमें श्री राकेश जी की ओर से कोई खर्च नहीं किया जाएगा। यह सब तय होने के बाद 29 सितंबर 2016 को रजिस्ट्रार कैराना के पास प्रेम कुल मिशन ट्रस्ट पंजीकृत कराया गया। उसके बाद 3 अक्टूबर 2016 को श्री राकेश कश्मीर सिंह ने अपनी 12.5 बीघा जमीन का प्रेम कुल मिशन ट्रस्ट के नाम गिफ्ट डीड के रूप में बैनामा कर दिया। इस प्रकार ग्राम हथछोया में बालिका शिक्षाओं के लिए देवस्थली विद्यापीठ निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके बाद बसंत पंचमी के दिन इस भूमि पर भूमि पूजन के साथ साथ कॉलेज के लिए नींव पूजन कर दिया गया। अप्रैल 2017 में विधिवत तरीके से कॉलेज निर्माण के लिए कार्य शुरु हो गया जो अभी तक चल रहा है। 2017 तक के लिए चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, जिसके अधिकार क्षेत्र में ग्राम हथछोया आता है, ने नए कालेजों के मान्यता देने पर रोक लगाई हुई थी। इसको बाद में 2019 तक बढ़ा दिया गया। लेकिन हाल ही में कुलपति, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय द्वारा एक सकारात्मक फैसला लिया गया जिसके अनुसार 2018-19 के सत्र के लिए पारंपरिक पाठ्यक्रमों के लिए नए कॉलेजों को विश्वविद्यालय द्वारा संबद्धता प्रदान की जाएगी। अतः इस फैसले से यह उम्मीद जगी है कि वर्ष 2018 में जुलाई से देवस्थली विद्यापीठ बालिका डिग्री कॉलेज में 2018-19 के लिए प्रवेश प्रक्रिया प्रारंभ हो जाएगी, और क्षेत्र की बेटियां आसमान छूने के उनके प्रयासों को अंजाम देने के लिए उच्च शिक्षा के अपने सपने को साकार कर पाने का अवसर सामने खड़ा होगा। ऐसा होने से इस क्षेत्र में एक व्यापक सामाजिक शैक्षणिक बदलाव की प्रक्रिया प्रारंभ होगी। गांव की बेटियां तो उचित शिक्षा प्राप्त कर ही पाएंगी, अन्य क्षेत्रों से क्षेत्र में आने वाली बेटियां जो बहू बनकर आती हैं वह भी अपनी आगामी शिक्षा को जारी रख पाने में सफल होंगी। वह भी अपने सपनों को हकीकत में बदलने की ओर उन्नति के कदम बढ़ाएंगे।
इस कॉलेज की स्थापना के लिए किए जाने वाले हमारे प्रयासों में कई नकारात्मक सोच के तत्वों द्वारा बाधाएं उत्पन्न करने के प्रयास किए गए लेकिन मैं और मेरे साथी उनके कुत्सित प्रयासों के आगे न तो झुके और न हीं हमारा मनोबल कम हुआ। इस कॉलेज निर्माण में आने वाली बाधाओं को देखकर मुझे एहसास हुआ कि वास्तव में पुराने समय में रामपुर मनिहरण में गोचर महाविद्यालय के संस्थापक आधुनिक शिक्षा गुरु श्री मुल्तान सिंह वर्मा एवं महामना मदन मोहन मालवीय जी जिन्होंने आधुनिक भारत के महत्वपूर्ण शिक्षा मंदिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना रखी थी, को शिक्षा के प्रति आंदोलन खड़ा करने, शिक्षा संस्थान खड़ा करने में कितनी बाधाएं आई होंगी? इसका अनुमान लगाना भी वर्तमान परिस्थितियों में कठिन है। उस समय की परिस्थितियां आज की परिस्थितियों से सर्वथा भिन्न थी। आज संसाधन भी है, उस समय इतने संसाधन नहीं थे। इतने कम संसाधनों में उन महान शिक्षा पुरुषों ने आधुनिक शिक्षा मंदिरों की स्थापना की। यह वास्तव में मुझे और शिक्षा के प्रति समर्पित अन्य व्यक्तियों को निश्चित रूप से प्रेरणा देने वाला है। मेरा यह भी मानना है आज समाज में ऐसी प्रवृत्तियां उपलब्ध हैं कि हर अच्छे कार्य का समाज में विरोध होता है। आज बुरे कार्यों का विरोध करने वालों की संख्या नगण्य है। ऐसे में अब यह संदेह होने लगा है कि यदि किसी कार्य का विरोध ना हो तो कहीं वह अच्छा है भी या नहीं? यह सोचना पड़ता है। इसलिए हमारे इस शिक्षा आंदोलन के प्रति नकारात्मक प्रवृतियों की और से किए जा रहे विरोध को हमने हमेशा सकारात्मक रूप से लिया है। और उससे इस महान एवं पुनीत कार्य को करने के प्रति मेरा और मेरे साथियों का संकल्प पहले से कहीं अधिक दृढ़ हुआ है। विश्वास अटल हुआ है और हमें उम्मीद है कि जब हम नहीं होंगे उस समय आने वाली पीढ़ियां बड़ी विनम्रता और श्रद्धा के साथ शायद हमारा नाम लेंगे। हमें याद करेंगे। उस समय तक तो उनको विरोधियों के न नाम पता होंगे और न उनके काम पता होंगे। क्योंकि कॉलेज निर्माण के इतिहास में कहीं भी किसी भी स्तर पर हमने संकल्प लिया है कि विरोधियों को अमर नहीं होने देना है। कॉलेज के इतिहास में विरोधियों का नाम कहीं दर्ज नहीं होना है आने वाली पीढ़ियां हमारे मरने के बाद भी हमें तो याद रखेंगी, विरोधियों के तो उनको नाम तक भी मालूम न होंगे ।देवस्थली की नींव में कंधे से कंधा मिलाकर आहुति देने वालों में मेरे पिताश्री प्रेम सिंह दिलावरे, बड़े भाई संजय सिंह दिलावरे,महिपाल सिंह और सत्यपाल सिंह तोमर का नाम भी याद रखा जाएगा।हथछोया की दो भू-देवियों को भावी पीढियां श्रद्धा के साथ याद करेंगी जिन्होंने संस्थान की हमारी अवधारणा को भूदान करके जमीन पर उतारा।ये दो देवियां है, श्रीमती प्रेमो कश्मीर सिंह जो राकेश कश्मीर सिंह की माता जी है और उन्होंने 12.5 बीघा जमीन दान की जिस कारण हम अपने सपने को धरातल पर उतार सके।दूसरी भूदेवी हैं मेरी माताजी जिन्होंने 1.5 बीघा जमीन खरीदकर देवस्थली निर्माण हेतु प्रेमकुल मिशन ट्रस्ट को दान की थी।यह सपनों की वह भूमि है जिस पर हमें सुनहरे भविष्य का निर्माण करना है।
#निजिरायसत्यम

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