सुजानखेड़ी..में बगिया

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सोमवार, 8 जून 2015

फूल सिंह दिलावरे-अदभुद कर्मयोगी

फ़ूलसिंह दिलावरे.-अदभुद कर्मयोगी

जब आप खुद लेखक हों और अपने किसी सगे पर लिखना हो तो लाख कोसिश करने पर भी पक्षपात की गुंजाइश बची रहती है। यह स्वाभाविक भी होता है क्योंकि लिखने वाला भी आखिर इंसान ही होता है और उसमे समस्त मानवीय अवगुणों का भंडार होता है। पुस्तक का सह-लेखक होने के नाते और साथ ही एक संवेदनशील लेखक के नाते भी, मै पूरा प्रयास करूंगा कि स्वयं को तटस्थ रखकर अपने बाबा चौधरी फूल सिंह दिलावरे का वास्तविक चरित्र चित्रण कर सकूँ।
    सुजानखेड़ी के संस्थापक चौधरी सुजान सिंह की पाँचवी पीढ़ी के प्रतिनिधि मेरे बाबा फूल सिंह दिलावरे अपने पिता चौधरी मामराज सिंह दिलावरे के ज्येष्ठ पुत्र थे। इनके छोटे भाई चौधरी मंगल सिंह दिलावरे थे । दो बहने थी। जिनमे एक बुगली देवी सहारनपुर के घाड़ क्षेत्र के गाँव मेघनमजरा मे और दूसरी बहन गेंदी देवी गंगोह के पास मेनपुरा मे ब्याही थी। युवावस्था मे ही पिता की मृत्यु के बाद घर की ज़िम्मेदारी बड़े पुत्र होने के नाते फूल सिंह के कंधों पर आ गई थी। इस कारण कक्षा चार के बाद स्कूली शिक्षा को अलविदा कहना पड़ा। बचपन मे मासूम कंधों पर पहाड़ सा बोझ लिए दो-दो बहनों की शादी और छोटे भाई की शिक्षा सभी कार्य बड़ी सहजता और कुशलता से सम्पन्न किए। अंग्रेज़ो से टकराव और जंग ने दिलावरे परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ खड़ा कर दिया था। रौढ़ा सिंह दिलावरे और भजन सिंह दिलावरे (दोनों पिता-पुत्र) की शहादत के बाद कोई पुरुष परिवार मे शेष नहीं बचा था। शामली तहसील लूट के बाद बनत मोर्चे मे क्रांतिकारियों की हार सुनिश्चित जानकार भजन सिंह ने भूमिगत हो जाना ही देश और क्रान्ति के हित मे समझा था। भजन सिंह अपने साथियों और पत्नी सहित संदल-नवादा चले गए, जहां से जाकर हरियाणा मे करनाल के पास दिलावरा गाँव बसाया। एक मुखबिर द्वारा अंग्रेज़ हुकूमत को भजन सिंह के दिलावरा गाँव मे छुपे होने की खबर दे दी गई। अंग्रेज़ फौज ने दिलावरा गाँव को चारों और से घेरकर जला दिया। भजन सिंह को गिरफ्तार करके बिना मुकदमा चलाये दिलावरा गाँव मे ही पेड़ पर लटका कर तत्काल फांसी दे दी गई। उनकी गर्भवती पत्नी लाड़ो गूजरी किसी तरह बचकर निकलने मे सफल हो गई। इधर गाँव मे दिलावरे परिवार की सारी संपत्ति अंग्रेज़ सरकार ने हड़प कर अपने चहेतों मे बाँट दी। लगभग दो वर्ष इधर-उधर भटकने के बाद लड़ों अपने एक वर्षीय पुत्र नथवा सिंह को लेकर पुनः हथछोया आ गई, जहां अब रहने के लिए टूटी-फूटी छत के अलावा कुछ शेष नहीं बचा था। लाड़ों ने हार नहीं मानी। गरीबी और अभाव के बावजूद उन्होने पुत्र नथवा की परवरिश की। अब न तो उनके पास जमींदारी बची थी और न ही आजीविका का सुरक्षित साधन। लाड़ो ने बड़ी विषम परिस्थितियों मे दिलावरे परिवार का पुनर्निर्माण किया। अपनी मेहनत से खेती के लिए जंगल साफ करके जमीन जुटाई, घर बनाया, बच्चे को बाप का प्यार भी खुद ही दिया। नथवा सिंह के चार पुत्र हुए बख्तावर सिंह, राजाराम, मामराज सिंह और सूरज सिंह।  जिनमे ममराज सिंह के बड़े पुत्र फूल सिंह थे।
                                 दिलावरो का वंश वृक्ष
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                       सुजान सिंह (सुजान खेड़ी के संस्थापक)
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                   रौढ़ा सिंह (1824 के किसान आंदोलन के सैनिक,फांसी)
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  भजन सिंह दिलावरे( 1857 की क्रांति के शामली क्षेत्र के प्रमुख यौद्धा,फांसी) पत्नी लाडो गुजरी
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                             नथवा सिंह –(पत्नी दरबों देवी)
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बख्तावर सिंह     राजाराम       मामराज सिंह(पत्नी धर्मी देवी)       सूरज सिंह        
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1-बारू सिंह       1-घसीटा राम      1- फूल सिंह                 1-मेहर सिंह
2- मुल्तान सिंह                    2- मंगल सिंह                2-रतन सिंह
                                                             3-पुन्ना सिंह

दिलावरे परिवार ने आज़ादी की लड़ाई की कीमत मुसीबतों और अभावों के रूप मे चुकाई। अपनी मेहनत के बल पर पुनः खेती के लिए जमीन जुटाई। हमारे बाबा जी ने अपनी जमीन के अलावा कुन्दन सिंह और अतर सिंह की जमीन मे बटाई पर खेती की। बाबा जी की शादी गंगोह के पास जुखेड़ी मे हुई थी। दादी बोहती देवी और बाबा फ़ूलसिंह की बारह संतानों ( आठ पुत्र और चार पुत्रियों ) मे से मात्र दो-एक पुत्र (श्री प्रेम सिंह दिलावरे , पुत्री करेशनी देवी) ही जीवित रहे। दस संतानों की अकाल और अपरिपक्व मौत ने बाबा और दादी को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था। इस कारण बाबा जी को प्रभु चरणो मे शांति मिली, बाबा जी श्रीमदभगवदगीता की शरण मे चले गए। बाबा जी अपने साथ हमेशा श्रीमदभगवदगीता रखते थे और इसका नियमित पाठ करते थे। गीता के संस्कार उन्होने मृत्युपर्यंत नहीं छोड़े। अकेले पुत्र की दीर्घायु के लिए बाबा जी ने महीनों तक रात्रि मे “दरिया’ मे जल समाधि लगाई और नियमित अर्घ्य दिया। हनुमान जी के भी बाबा जी पक्के भक्त थे। 
हड्डी उतरने (जोड़ से खिसक जाने) और पैर की मोच के उपचार मे बाबा जी को महारत हासिल थी। पंजाब,हरियाणा,दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों से लोग उपचार के लिए बाबा जी के पास आते थे। बाबा जी हमेशा निस्वार्थ और बिना किसी लालच के बीमार लोगों का उपचार करते थे। अनेक लोगो ने उनसे अपना इलाज कराया। कई बार कुछ लोगों ने आराम मिलने के बाद बाबा जी को बदले मे कीमती उपहार अथवा पैसे देने चाहे तो उन्होने बड़ी विनम्रता से यह कहकर लेने से इनकार कर दिया “ जिस दिन मै अपनी सेवा की कीमत ले लूँगा, मेरी विध्या उसी दिन नष्ट हो जाएगी “ उपचार क्रिया, बाबा जी हमेशा सूर्योदय के बाद एवं सूर्यास्त के पहले तक ही करते थे। वे कहते थे “ मेरी विध्या, सूर्यास्त के बाद काम नहीं करती। रात मे उपचार के लिए आने वालों को बाबा जी अपने पास ही ठहराते थे, उनके रहने एवं भोजन पानी की व्यवस्था भी खुद ही बिना किसी शुल्क के करते थे। 
   उनका शरीर एकदम सधा हुआ था, न पेट न ही शरीर पर अतिरिक्त चर्बी। मुझे याद है कि एक बार बड़े भाई संजय सिंह और उनके मित्र, खेत मे, रस्सी कूद खेल रहे थे। तभी बाबा जी वहाँ आ गए और उन्होने बालको की उस टीम को चुनौती दे डाली “ अगर कूदना ही है तो टोपी के बराबर रस्सी हाथों मे लेकर कूद कर दिखाओ” वहाँ उस समय जितने भी बच्चे थे उनमे कोई भी ऐसा नहीं कर पाया। सब उस समय हैरान रह गए जब बाबा जी ने सिर से अपनी टोपी उतारी और उसे दोनों हाथों मे पकड़कर लगातार 15-20 जंप कर डाले। वह दृश्य आज भी मेरी आँखों के सामने तैरता रहता है। गाँव और पिंडौरा के मेले का हमे बचपन मे बड़ा चाव रहता था। मेले के समय बाबा जी मुझे अक्सर अठन्नी या एक रुपया देते थे ताकि मै मेला देख सकूँ । एक बार मैंने और मेरी बहन बबली ने गुल्लक मे पैसे जोड़ने शुरू किए। पैसे हमसे खर्च न हो जाए, इसलिए हमने अपनी-अपनी गुल्लक अपनी दादी के पास रख दी। हमने बड़ी मेहनत से गुल्लक मे सैंकड़ों रुपये उस मंदे जमाने मे इकट्ठा कर लिए थे। बाबा जी ने खेत मे रामकेला का बाग लगाने की योजना बनाई। तीतरों नर्सरी से पेड़ खरीद कर लाते समय दादी ने हम दोनों बहन भाइयो की गुल्लक तोड़कर सारे पैसे बाबा जी को दे दिये। जब पेड़ लाकर बाग भी लग गया तो हमे पता चला कि हमारे पैसों से भी पेड़ खरीद लिए गए है। हमे बड़ा दुख हुआ और हमने अपनी नाराजगी बाबा जी के सामने ज़ाहिर कर दी। बाबा जी ने बड़े सहज शब्दों मे हमे समझाया “ पैसे तुम्हारे थे तो बाग भी तो तुम्हारे लिए ही लगा है।“ हमे बात समझ मे आ गई और हम बहुत खुश हुए।
अपनी मृत्यु के लगभग एक वर्ष पूर्व बाबा जी ने मेरे सामने गंगा स्नान की इच्छा व्यक्त की, मैंने तुरंत हाँ कर दी। अपनी गाड़ी से बाबा जी को लेकर मै हरिद्वार पहुंचा और बाबा जी को गंगा स्नान कराया। बाबा जी बहुत खुश हुए। परिवार मे सबसे छोटा होने के बावजूद भी बाबा जी अस्थियाँ गंगा मे प्रवाहित करने का अवसर भी मुझे ही मिल गया । यह मेरे लिए और भी बड़ा सौभाग्य था।
       अपने जीवन के संध्या-काल मे बाबा जी परिवार की उपलब्धियों से बहुत संतुष्ट थे। काफी खुश भी रहते थे। सिर्फ मेरा पी.सी.एस. न बन पाना उन्हे हमेशा कष्टकारी लगा रहता था। यह उनका अंतिम सपना था। मैंने उनके संध्याकाल मे कई बार उनसे उनकी अंतिम इच्छा के बारे मे जानना चाहा तो उन्होने- मेरा पी.सी.एस. मे चयन हो जाना, मेरे द्वारा शाकुंभर मे जब कभी संभव हो,एक कमरे का निर्माण करवाये जाने को अपनी अंतिम इच्छा के रूप मे व्यक्त किया। उन्होने एक अंतिम इच्छा मृत्यु के बाद “जोड़ मे लड्डू’ बनवाना, और उनका अंतिम संस्कार गाँव के शमशानों मे करवाने की भी इच्छा व्यक्त की।
        12 अप्रेल 2011 को गिर जाने की वजह से बाबा जी कुल्ली टूट गई जिसके कारण उन्होने चारपाई पकड़ ली। अब घेर मे चारपाई उनका एकमात्र विश्राम स्थल थी।  यह समय उनके लिए काफी पीड़ादायक रहा। ठीक एक महीने बाद 12 मई 2011 को दोपहर को बाबा जी ने घेर से किसी व्यक्ति को घर पर भेज कर “बिब्बी’( हमारी माँ) को बुलवाया, बुलावा मिलते ही बिब्बी उनके पास घेर मे पहुँच गई । बाबा जी ने बिब्बी को अपने अंतिम वचन कहे “ आज मेरा अंतिम समय है, भाई (मेरे पिताजी, जिनहे बाबा जी प्यार से हमेशा भाई ही कहते थे ) को कभी अकेले खेत मत जाने देना, अब खेती करने की जरूरत नहीं है, जमीन ठेके पर दे देना। डंगर (पशु) मत रखना, दूध मोल ले लिया करना। अब भगवान ने तुम्हारे घर मे मोज कर रखी है, उसका शुक्रिया करो, किसी का कभी भूल से भी बुरा मत करना।“ इतनी बात कहकर बाबा जी ने बिब्बी के हाथों मे अपनी अंतिम साँसे पूरी की। उनकी मृत्यु के बाद लगभग एक वर्ष बाद 31 मार्च 2012 को उनका अंतिम सपना भी पूरा हो गया, जब मेरा उत्तर प्रदेश पी.सी.एस. 2009 मे अंतिम चयन वाणिज्य कर विभाग मे असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर हुआ। बाबा जी आज हमारे परिवार की असीम श्रद्धा के केंद्र है और भावी पीढ़ियों को भी हमेशा उनसे प्रेरणा मिलेगी। बाबा जी उस भवन की नींव के पत्थर बने है जिसका निर्माण आगे वाली पीढ़ियों को जारी रखना है।
@ सुनील सत्यम

हथछोया की यादें-कुछ इतिहास, कुछ बातें.



               हथछोया की यादें !
                   कुछ इतिहास, कुछ बातें..
                                 
                                                               # सुनील सत्यम   
       

  कुछ बातें                                               
                                                                                                                              वर्ष 1982-83 वह वर्ष था जब मेरी संस्थागत शिक्षा शुरू हुई थी। आरंभिक दिनों मे मै और मेरे कई बाल सखा सैदली ( प्रारम्भिक पाठशाला नंबर-दो) और शिवाले (प्रारम्भिक पाठशाला नंबर-एक के बीच झूलते रहे। जिस दिन जिस स्कूल मे जाने का मन होता,उस दिन उसी स्कूल की और हमारा कारवां चल देता। सैदली ( सैयद अली की मजार के कारण प्रारम्भिक पाठशाला नंबर-दो को सैदली के नाम से जानते, यहाँ किसी सैयद अली की एक मजार थी जिस पर कुछ लोग कभी-कभी दिया जलाने जाते थे। मुझे याद नहीं है कि मैंने वहाँ कभी पूजा जैसी कोई चीज कि हो क्योंकि पीर-मजार के प्रति मेरी कोई श्रद्दा नहीं थी और न आज भी ऐसी श्रद्धा कभी जाग्रत हुई। मेरे विचार से इनमे पूजा-आराधना जैसी कोई बात नहीं है, ये सिर्फ कुछ मृत लोगों की कब्र मात्र हैं।) मे मेरी बड़ी बहन प्रमिला पढा करती थी, इसीलिए मै अक्सर उन्ही के साथ इस स्कूल को भी अपना ही समझता था। इस स्कूल मे सुशीला बहन जी प्रधानाध्यापिका थी,जिनकी छवि हमारे बालमन पर बहुत अच्छी बहन जी के रूप मे अंकित थी। एक दिन हम जब सेदली स्कूल मे गए हुए थे तो हमने देखा कि वहाँ  ताजी खुदी हुई मिट्टी का ढेर पड़ा हुआ है।स्कूल चल रहा था रेसिस भी नहीं हुई थी। बहन जी एक कमरे के दरवजे पर इस तरह  सीट लगाकर बैठी हुई थी कि  वहाँ से पूरे स्कूल पर नजर रख सकती थी। लेकिन मै और मेरे बालसखा स्वयं को चतुर सुजान मानकर बारी-बारी अपनी जगह से उठकर उस ढेर पर दौड़कर पहुँच जाते और मिट्टी का आनंद लेकर झट से अपने स्थान पर आकार बैठ जाते। एक प्रकार तहम बहन जी कि आंखो मे धूल झौंक रहे थे। पहले तो बहन जी हमे अनदेखा करती रही लेकिन जब हमारी हरकतें उनकी सहन सीमा को लांघ गई तो उन्होने उठकर हमरी पीठ पर दो-दो डंडे जड़ दिये। हमारा खेल खत्म हो गया और “बहन जी की अच्छाई का हमारे मस्तिष्क मे बना किला “ ध्वस्त हो गया। अगले ही दिन से शिवाले के स्थायी छात्र बन गए।  
    दो-दो डंडे खाने के बाद हम सैदली का रास्ता भूल सही रास्ते पर आ गए। अब शिवाला ही हमारा स्कूल था। इस स्कूल की दीवार से लगा हुआ गाँव का प्राचीन शिव मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण कभी लाला सुरेन्द्र सिंघल जी के पिता श्री लाला गीताराम जी ने कराया था। इस शिवाले से लगे होने के कारण ही प्राथमिक विध्यालय हथछोया नंबर-एक को लोग सिर्फ शिवाला ही कहते थे। स्कूल की चाहारदीवारी एवं प्रवेश द्वार थे लेकिन सभी सभी दीवारों से इंटे चुराकर आस-पास के लोगों ने बड़े-बड़े कई अनधिकृत छिद्रनुमा द्वार भी बना रखे थे। इतना ही नहीं लोगों ने शिवाले की मुख्य दीवारों तक को नहीं छोड़ा था । इस दीवार की इंटे भी उस समय के आस-पास के घरों को मजबूती प्रदान कर रही थी। शिवाले के पीछे तालाब था जहां हम अक्सर समय बिताने के लिए “निव्रत्त” होने के बहाने जाते थे। यह कार्य उस समय तक जारी  रहा जब तक कि हमने इस स्कूल से पाँचवी कक्षा पास करके इसे छोड़ नहीं दिया।
सामंती कीड़े:
शिवाले मे जब हम पढ़ते थे तो पिंडौरा के श्री शादीराम शर्मा जी हेड-मास्टर थे। उनके अलावा श्री समय सिंह –दुल्ला खेड़ी,श्री पदम सिंह एवं श्री निरंजन सिंह-गागौर और श्री रामस्वरुप जी –कैल शिकारपुर, सहायक अध्यापक थे। उस समय का ग्रामीण स्कूली जीवन अब समाप्त हो गया है। वह एक ऐसा दौर था जो अब सिर्फ इतिहास और कौतूहल कि बाते है। हम घर से ही बैठने के लिए जूट की बोरी लेकर जाते थे। सुलेख के लिए तख्ती और अभ्यास के लिए स्लेट, हमारी स्कूल किट का जरूरी हिस्सा थी। तख्ती हाथ मे लेकर जाते थे जिसे रोजाना मुलतानी मिट्टी से पोतकर ले जाते थे। तख्ती लेखन दैनिक स्कूल कार्य का जरूरी भाग था। सरकंडे के पौरे से बने कलम के द्वार काली स्याही मे “डौब्भा” लेकर किताब से कुछ लाइने लिखते थे ताकि हमारा हस्त-लेख सुंदर बन सके। इमला (डिक्टेसन) और नकल (किताब से देखकर लिखना ) हमारी स्कूली दिनचर्या का नियमित कार्यक्रम था। कक्षा मे मॉनिटर के लिए मेरा, रवीन्द्र(बीटू) ( पुत्र -मेहर सिंह दिलावरे), अश्वनी शर्मा (बिट्टू) (पुत्र- मास्टर जगरोशन जी) का अघोषित गठबंधन था। हमने कभी किसी अन्य छात्र को कभी अपने अलावा मॉनिटर नहीं बनने दिया। स्कूल मे सफाई कर्मचारी की व्यवस्था नहीं थी। स्कूल मे नियमित सफाई के लिए छात्रों की टौलियां बनाई गई थी, जिनकी ज़िम्मेदारी थी कि वे समय से पहले स्कूल आकर पूरे स्कूल मे झाड़ू लगाए, और पूरे स्कूल को साफ सुथरा रखे। उस समय इस व्यवस्था पर किसी ने सवाल खड़े नहीं किए बल्कि इसे स्कूली अनुशासन का हिस्सा माना जाता था। यह ग्रामीण परिवेश और सामंती पृष्ठभूमि का ही असर था कि उस समय हमारे बालमन मे भी सामंती कीड़े असर रखते थे। हमने कभी भी अपना नंबर आने पर स्कूल मे झाड़ू नहीं लगाई। ऐसा करने मे हम अपना अपमान समझते थे । अक्सर हम दादागिरी के डैम पर अन्य लड़कों से झाड़ू लगवाया करते थे। खासकर गैर-खेतिहर जातियों के लड़कों से। आज जब उस समय और सोच के बारे मे सोचता हूँ तो स्वयं से नफरत होने लगती है कि कैसे मै कुछ समय के लिए सामंती और जातीय भावना का शिकार रहा हूँ । भले ही यह मेरा बचपन ही क्यों न था ! इस तरह कि सोच उस समय कि एक कटु सच्छाई भी थी। अच्छी बात यह रही कि यह घटिया सोच मेरे ऊपर ज्यादा दिन तक हवी नहीं रह पाई। कक्षा-तीन तक आते-आते मेरी सोच मे व्यापक बदलाव हुआ । उस समय अतरे चूहड़े का लड़का बिजेन्द्र बाल्मीकी मेरा अच्छा दोस्त बन गया, जिसने बाद मे गाँव छोड़ दिया और परिवार सहित लुधियाना जा बसा, यही वह समय था जब कंवरपल कश्यप से मेरी गहरी दोस्ती हुई।
डी॰के॰बॉस
मेरे साथ ही सोमपाल बाहमण का लड़का देवेन्द्र कुमार भी पढ़ता था। मुझे और मेरी बहन बबली को पिताजी ने स्कूल मे प्रवेश करने से पहले ही घर पर पढना सीखा दिया था। पिताजी हमे घर पर इंग्लिश भी पढाते थे। उन दिनों प्राइमरी स्कूलों मे इंग्लिश नहीं पढ़ाई जाती थी। जिस समय मै कक्षा तीन मे आया, उस समय मै अङ्ग्रेज़ी भाषा मे नाम लिखना व पढ़ना अच्छी तरह सीख गया था। देवेंद्र कुमार का लघु नामकरण मैंने डी॰के॰ कर दिया और बाद मे उसमे हमने बॉस जोड़ दिया, हम देवेंद्र को डी॰के॰ बॉस कहने लगे। देवेन्द्र मुझे जब भी मिलता मै उसे “ आओ ! बॉस डी॰के॰” कहता । क्योंकि वह उस समय डी॰के॰ का मतलब देवेन्द्र कुमार नहीं समझता थ। कारण साफ था, स्कूल मे इंग्लिश न पढ़ाये जाने के कारण उसे इसकी समझ नहीं थी।अतः “ बॉस डी॰के॰” के सम्बोधन को सुनकर देवेन्द्र इसे गाली समझता था।
वह अक्सर इस सम्बोधन को सुनकर चिढ़ जाता था। फिर मैंने उसे समझाया की डी॰के॰ का मतलब देवेन्द्र कुमार है, और बॉस ,सुभाष चंद्र बॉस वाला,शब्द है। पूरे स्कूल के लड़के अब देवेन्द्र कुमार को बॉस डी॰के॰ कहने लगे। डी॰के॰बॉस, डी॰के॰बॉस, डी॰के॰बॉस नाम अब देवेन्द्र के लिए द्वि-अर्थी शब्द के रूप मे प्रयोग किया जाना आम हो गया । देवेन्द्र अक्सर इस बात की शिकायत अध्यापकों के सामने भी करने लगा। एकाध बार इस शिकायत पर बच्चों की अध्यापक जनों द्वारा पिटाई भी हुई। जब हाल ही मे आमिर खान की एक फिल्म मे “भाग डी॰के॰बॉस “ गाना आया तो मुझे बचपन के वो दिन याद आ गए। तब मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि सोमपाल बाहमण के लड़के को मेरे द्वारा दिया गया सम्बोधन एक दिन किसी फिल्म मे गाना भी बन सकता है। मै और मेरे समय के साथी आज भी देवेन्द्र को डी॰के॰बॉस ही कहते है।

सोमवार, 18 मई 2015

हथछोया मे बस्ती निर्माण ॥

सुजानखेडी से हथछोया में बस्ती-विस्थापन
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सुजानखेडी आज के राजस्व दस्तावेजों में एक गैर-आबाद गाँव के रूप में दर्ज है.यहाँ की अधिकांश भूमि रेतीली है इसलिए इस क्षेत्र को सामान्यतः लोग मारू (मरुभूमि) भी कहते है.इस क्षेत्र की मिट्टी की सरंचना को देखकर यह स्पष्ठ हो जाता है कि 160-200 वर्ष पूर्व भी इस क्षेत्र में सतही जल का अभाव रहा होगा.ऐसा मानने का एक और स्पष्ट कारण यह है कि इस क्षेत्र की लगभग 1 किलोमीटर की परिधि में कोई तालाब नहीं था.किसी राजस्व दस्तावेज से भी इस बात की पुष्टि नहीं होती है कि यहाँ कभी कोई तालाब रहा हो.सुजानखेडी से हथछोया में बस्ती-विस्थापन के दो मूल कारण रहे:-
1. सुजानखेड़ी में जलाभाव
2. 1824 का किसान विद्रोह

सुजानखेड़ी मे जलाभाव -
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सुजानखेड़ी मे जलाभाव इस क्षेत्र से वर्तमान हथछोया की बस्ती के निर्माण के लिए एक बड़ा कारण माना जा सकता है। सुजानखेड़ी के आसपास के लगभग एक किलोमीटर के क्षेत्र मे तालाब के कोई साक्ष्य  नहीं मिलते है, यमुना नदी की यहाँ से दूरी लगभग 15 किलोमीटर है, सुजानखेड़ी की बस्ती का अस्तित्व  दिलावरों (हमारे) खेत के स्थान पर माना जाता है।  एक बात तो तय है कि सुजानखेड़ी से हथछोया मे बस्ती विस्थापन जल्दबाज़ी मे नहीं हुआ था और न ही महामारी फैलाना आदि ही इस विस्थापन का जनक था।  वास्तव मे सुजानखेड़ी के स्थान पर किसी अधिवास के कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं पाये गए है। इस स्थान से कोई मृदभांड या मानव कंकाल जैसा साक्ष्य न मिल पाना इस बात का प्रमाण है कि यहाँ से हथछोया मे बस्ती विस्थापन बड़े आराम से,सुविधाजनक तरीके से और पूर्णतः हुआ था। यानि बस्ती वासी यहाँ से हथछोया विस्थापित होते समय अपने साथ एक एक ईंट तक ले गए और तत्कालीन बस्ती-स्थल पर पीछे बस्ती का कोई अवशेष नहीं छोड़कर गए।
हमारे दादा फूलसिंह दिलावरे बताते थे कि उन्होने अपने दादा से सुना है कि सुजानखेड़ी मे पानी कि भारी किल्लत हो गई थी और आसपास कोई तलब न होने के कारण लोग बहुत परेशान थे। वर्तमान हथछोया के स्थान पर बहुत घने जंगल थे जहां कोई आता जाता नहीं था क्योंकि भयानक जंगली जानवरों का डर हमेशा बना रहता था। बताते है कि एक बार किसी का झौटा ( भैंसा) खुलकर जंगल की और चला गया, जब वह शाम को अपना पेट भर कर वापस लौटा तो गारे-पानी मे सना (भीगा) हुआ था। उसे देखकर लोगो की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। अगले दिन सुबह उस झौटे को फिर से खोला गया और गाँव के लोगो ने समूह बनाकर उसका पीछा किया तो वह वर्तमान हथछोया के जंगलों की और गया और जंगल मे एक विशाल तालाब पर जाकर पानी मे घुस गया। हजारों बीघे के तलब को देखकर सुजानखेडी वासियों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा और उन्होने तत्काल ही उस तलाब के किनारे बस्ती विस्थापन का फैसला ले लिया। यह विस्थापन हथछोया मे सुनियोजित नहीं था क्योंकि जिसको जहां उपयुक्त जगह दिखी उसने वहीं घर बना लिए। हड़प्पा बस्ती जैसी सुनियोजियत बस्ती सुजानखेड़ी वासी नहीं बना पाये। इसका मूल कारण यह था कि वे पानी कि किल्लत के कारण हड़बड़ी मे थे अतः आनन फानन मे जिसको जहां अनुकूलतम जगह दिखी उसने वही पर बस जाने का निर्णय कर लिया। कुछ दिनों मे सुजानखेड़ी से अपने अधिवासों मे प्रयुक्त समग्र निर्माण सामाग्री का उन्होने हथछोया लाकर पुनः प्रयोग अपने अधिवास निर्माण मे कर लिया।

*2 1857 का स्वाधीनता संग्राम
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हथछोया मे सुजानखेड़ी से बस्ती विस्थापन के पीछे 1824 का किसान विद्रोह और 1857 का स्वाधीनता संग्राम भी एक बड़ा कारण माना जा सकता है। सन 1824 मे हुए कुंजा बहादुरपुर किसान विद्रोह की लपटे इस समस्त क्षेत्र मे फैल गई थी। सुजानखेड़ी के रौढ़ा सिंह दिलवारे, कुंजा बहादुरपुर के विजय सिंह के नजदीकी रिश्तेदार थे, रौढ़ा सिंह के पुत्र भजन सिंह कुंजा मे ब्याहे थे। अतः 1824 के किसान विद्रोह मे रौढ़ा सिंह ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। इस विद्रोह के सूत्रधारों मे से एक होने के कारण रौढ़ा सिंह को अंग्रेज़ सरकार ने मौत की सजा सुनाई थी। इस प्रकार रौढ़ा सिंह दिलावरे को 1824 के किसान विद्रोह मे शहीद होने का गौरव प्राप्त है। 1857 के संघर्ष मे रौढ़ा सिंह के पुत्र भजन सिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। शामली तहसील लूट के रणनीतिकार भजन सिंह दिलावरे ही थे। इस क्षेत्र मे 1857 के स्वाधीनता संघर्ष की बागडौर भजन सिंह और मोहर सिंह (शामली) के हाथ मे थी। 1857 के संघर्ष मे भजन सिंह की भूमिका के कारण ही अंग्रेज़ सरकार ने सुजानखेड़ी गाँव को तबाह कर दिया था । फलस्वरूप गाँव वासियों ने हथछोया की आधुनिक बस्ती मे स्थानांतरण कर लिया।
   इस प्रकार हथछोया की वर्तमान बस्ती, सुजानखेड़ी से हथछोया मे बस्ती विस्थापन के कारण अस्तित्व मे आई।          
                                                               # सुनील सत्यम




 

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

हथछोया की हस्तियाँ-1 "डॉ. सुशील उपाध्याय"

अपने ब्लॉग पर मै "हथछोया की हस्तियाँ"
शीर्षक से  स्तम्भ शुरू करने जा रहा हूँ। आप हथछोया की अपने क्षेत्र में स्वयं के संघर्ष के बल पर आगे बढ़ने वाली हस्ती का साक्षात्कार करके यहाँ पोस्ट कर सकते है। यह जरुरी है ताकि हमारी भावी पीढियां प्रेरणा ले सकें.
इस सीरीज के अंतर्गत आपको हथछोया की एक ऐसी ही हस्ती से परिचित कराया जा रहा है जिसने अपने संघर्ष के दम पर सफलता को मजबूर कर दिया चरण वंदना के लिए, इस हस्ती का नाम है डॉ. सुशील उपाध्याय..

हथछोया की हस्तियां-1
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डॉ.सुशील उपाध्याय
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सुशील जी का जन्म गाँव के उपाध्याय परिवार में श्री सुल्तान सिंह के घर में हुआ था.आपका बचपन एवं किशोरावस्था बेहद अभाव में व्यतीत हुआ.पारिवारिक आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नही थी, सन्घर्ष भी बालक सुशील के साथ-साथ बड़े होने लगे.घर का सबसे बड़ा पुत्र होने के नाते परिवार की आजीविका में सहयोग करने का नैतिक दायित्व भी आपके कंधों पर समय से पहले ही आ गया। आजीविका के नाम पर पिताजी की गाँव में ही किराने की छोटी सी दुकान थी या फिर गाँव के काश्तकारों के खेतों में खेतिहर के रूप में मजदूरी.बालक सुशील स्कूल के बाद का समय अपनी दुकान पर बिताते और छुट्टी में खेत मजदूर के रूप में काम करके परिवार चलाने में अपने पिताजी का हाथ बटाते थे। इस पेट के संघर्ष का परिणाम यह हुआ कि बालक सुशील बाल्यावस्था से सीधे परिपक्वावस्था में जा पहुंचे.जिन कक्षाओं में छात्र पाठ्यक्रम की कविताओं और गद्य का ठीक से अर्थ भी नहीं जान पाते है उस समय सुशील उपाध्याय की रचनाएँ भारत के प्रतिष्ठित अख़बार दैनिक हिंदुस्तान में छपने लगी थी.
   सुशील उपाध्याय ने गाँव से अपनी प्राथमिक एवं जूनियर माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की। शामली जनपद के थानाभवन स्थित लाला लाजपत राय इंटर कालेज से 1987 में 10वीं तथा 1989 में इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की।यही वह समय था जब 1988-89 में दैनिक हिंदुस्तान में आपकी अनेक रचनाएँ प्रकाशित होने लगी थी। पाठक बड़ी रुचि के साथ आपको पढने,समझने लगे। इसी समय आकाशवाणी दिल्ली से भी आपकी कई रचनाएँ प्रसारित हुई,जो मंजे हुए पत्रकारों का भी सिर्फ सपना ही हुआ करती थी।
    1989-90 में सुशील उपाध्याय ने बी.एस.सी. में प्रवेश ले लिया, लेकिन परिवार की ख़राब आर्थिक स्थिति के कारण प्रथम वर्ष में ही कालेज छोड़ना पड़ा. सुशील ने हार नहीं मानी और संघर्ष की कंटीली डगर पर चलते रहने का फैसला किया। फैसला किया कि कमाई के साथ साथ पढाई भी की जाएगी। अब आप दुकान के साथ साथ मजदूरी करके भी आय करने लगे। परिवार का खर्च चलाने के बाद जो भी पैसा बचता
उससे अपने लिए जरुरी पुस्तकें खरीदते और अपनी फ़ीस भरते। साथ ही ट्यूशन से भी अपने संघर्ष के लिए जरुरी उर्जा संजोने का कोई मौका सुशील नही छोड़ते थे।
प्राइवेट बी.ए. करने के बाद सुशील उपाध्याय ने M.A.M.C (पत्रकारिता स्नातकोत्तर) में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, हरयाणा में प्रवेश लिया, और गोल्ड मेडल प्राप्त किया। गुरुकुल कांगड़ी हरद्वार से हिंदी में एम्.ए. किया और उसमे भी स्वर्ण पदक प्राप्त किया।
2006 में सुशील उपाध्याय ने डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त की।
   एक व्यवसायिक पत्रकार के रूप में आपने वर्ष 1994 में दैनिक नवभारत, भोपाल से की। 1995 में आपने दैनिक अमर उजाला, मुज़फ्फरनगर में नौकरी प्राप्त की तथा 1996 में अमर उजाला, मेरठ में आप स्थानांतरित हो गए, कुछ दिन बाद पुनः आप अमर उजाला मुज़फ्फरनगर में आ गए। 1997 में रूडकी में अमर उजाला के ब्यूरो चीफ के रूप में आप को भेजा गया, जहाँ अपनी मेहनत के बल पर आप ने अमर उजाला को प्रथम स्थान पर ला खड़ा किया।पत्रकारिता के साथ सुशील की अध्ययन की भूख भी कम नही हुई।1995 में मेरठ से बी.एड. की उपाधि भी आपने अर्जित की।
पीएच.डी. के दौरान ही आपने जामिया उर्दू अलीगढ संस्थान से उर्दू में स्नातक उपाधि "हबीब ए कामिल" भी प्राप्त की। सन 2008 में पत्रकारिता एवं सन 2010 में हिंदी विषय में आपने UGC-NET की ।
विभिन्न विषयों पर अपने अनेक रचनाएँ की है।
आपकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं:
1 सम्पादकीय-दो टूक (दैनिक हिंदुस्तान)
2 व्यवहारिक पत्रकारिता
3व्यवसायिक पत्रकारिता
4 पाँच एकांकी
                                                                                  परीक्षा पास करके राष्ट्रीय पात्रता प्राप्त की।

सोमवार, 31 मार्च 2014

हथछोया:अतीत मंथन © सुनील सत्यम

पुराना इतिहास है हथछोया का.इसका इतिहास जानने के लिए हमें इतिहास के धूल-धूसरित पन्नो को खंगालना होगा,जो बहुत श्रम साध्य और शौध का विषय है.अपने इतिहास ज्ञान,इतिहास-लेखन की तकनीकियों और जनश्रुतियों का सहारा लेकर भी हम हथछोया के अतीत पर दृष्टिपात कर सकते हैं.

हथछोया का शाब्दिक अर्थ:
हथछोया मूलतः दो शब्दों से मिलकर बना है-
हद (सीमा,अति)+चोया (जल स्तर). यह इस शब्द का संधिविच्छेद न होकर स्थानीय भाषा के दो शब्दों का एक साथ मिलकर प्रयोग है.
अर्थात ऐसा क्षेत्र जहाँ जल स्तर बहुत ऊपर ही उपलब्ध हो. गाँव की वर्तमान बस्ती के स्थान पर विशाल भौगोलिक क्षेत्र पर तालाब होने के कारण भूमिगत जल स्तर (चोया) की हद भूसतह के एकदम समीपस्थ थी.इसी कारण हद्चोया शब्द की उत्पत्ति हुई जो कालांतर में बिगड़कर हथछोया बन गया.
वास्तव में हथछोया के अधिवास का अध्ययन कई पहलुओं पर हमारा ध्यान केन्द्रित कर देता है, जो काफी मजेदार है.
हथछोया के बस्ती प्रारूप और प्रकार का विश्लेषण करे तो हम आसानी से समझ सकते है कि इस गाँव का इतिहास 160-200 वर्षो से अधिक पुराना नहीं होना चाहिए..इसका कारण स्पष्ट रूप से यह है कि यह वह समय है जब भवन निर्माण में लखौरी ईंटो का प्रयोग होता था..लखौरी ईंटो से निर्मित ही कुछ मकान/घर
 इस गाँव में मिलते है जो आजकल अवशेष मात्र है.मुख्य रूप से गाँव की प्राचीन चौपाल जो 50 वर्ष से पुरानी नहीं है और लाला गीताराम का घर लखौरी ईंटो से बना है.इसके अतिरिक्त कोई भी ऐसी सरंचना गाँव में नहीं मिलती है जो इसके अपने इतिहास को 160-200 वर्षों से पीछे ले जाती हो.
लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि गाँव की बस्ती से कहीं अधिक पुराना गाँव वासियों का इतिहास है.
हथछोया गाँव की बस्ती की स्थापना के पीछे मै " बस्ती विस्थापन" सिद्धांत को मूल कारण मानता हूँ.हडप्पा सभ्यता के पतन के लिए इतिहासकारों ने अनेक सिद्धांत दिए है. लेकिन इतिहास का जागरूक विद्यार्थी होने के कारण हड़प्पा के पतन को लेकर मेरा अपना मत है जिसे मै "बस्ती-विस्थापन" सिद्धांत कहता हूँ.मेरा मत है कि क्योंकि आज से 3000 से 4000 वर्ष पूर्व चिकित्सा सुविधाएँ सुलभ नहीं थी.उस समय महामारी और बाढ़ जैसी आपदाएं आम थी.महामारी की स्थिति में लोग अपनी बस्ती को छोड़कर समीप के ही अन्य स्थान पर विस्थापित होकर नई बस्ती बसा लेते थे.यदि हम हडप्पा कालीन बस्तियों का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि जहाँ भी हमें हड्प्पाई अधिवासों के अवशेष मिले है उनके 1-10 किलोमीटर की परिधि में ही हमे आधुनिक जीवंत बस्तियां भी मिलती है. उदाहरण के रूप में हम हथछोया और हुलास को ले सकते है. हुलास जो कि सहारनपुर जनपद में हड्प्पाई अधिवास है, के 1-5 किलोमीटर की परिधि में बरसी,टिकरोल,और मनोहरा आदि कई गाँव है.इसी प्रकार हथछोया के समीप ही स्थित "छोटी और बड़ी भेंट" तथा सुजानखेड़ी की स्थिति बस्ती विस्थापन के पक्ष में प्रमाण हैं.हुलास,बड़ी और छोटी भेंट, एवं सुजानखेडी के पतन और बरसी,टिकरोल,मनोहरा तथा हथछोया की उतपत्ति में निकट का सम्बन्ध है.आज हमारे पास यदि अवशिष्ट बस्तियों के पतन के साक्ष्य नहीं है तो इनके समीपस्थ वर्तमान बस्तियों की उत्पत्ति के भी पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है.अतः यह न मानने का कोई कारण नहीं है कि महामारी जैसे कारणों से अवशिष्ट बस्तियों से वर्तमान बस्तियों में बस्ती का विस्थापन होने से अधिकांश वर्तमान अधिवास अस्तित्व में आये.

 गाँव की मूल बस्ती से लगभग 1.5 किलोमीटर दूरी पर सुजानखेड़ी और ",विशाल डाबर (जोहड़) के दूसरी और स्थित हड़प्पा कालीन दो बस्तियों से अलग-अलग कारणों से बस्ती का विस्थापन हुआ और यहाँ के लोग हथछोया के मूल स्थान की भौगोलिक रूप से लाभदायक अवस्थिति के कारण यहाँ आ बसे जिसके पुख्ता प्रमाण हैं.
हथछोया गाँव में जोहड़,गुल्ही,देवावाला और यहाँ से बमुश्किल आधा किलोमीटर की दूरी पर बराला नामक चार विशालकाय तालाबों का 200 बीघे से अधिक का रकबा था, जिसके आज अवशेष मात्र हैं.यह क्षेत्र पूर्व में घने जंगलों से आबाद क्षेत्र था.हड़प्पा कालीन बस्तियों से भयानक महामारी के कारण सम्पूर्ण बस्ती का विस्थापन, विशाल जोहड़ के पश्चिम की और
हो गया, 20 वर्षो पहले तक इन दोनों बस्तियों के अवशेष गाँव में " बड़ी भेंट" और "छोटी भेंट" के नाम से रहा है.ये वास्तव में प्राचीन हड़प्पा कालीन बस्तियों के अवशेष थे जो हरित-क्रान्ति के फलस्वरूप हुए कृषि विकास की भेट चढ़ गये.मुझे याद है कि जब गाँव के कुछ लोगों ने इन भेंटो को काटकर अपने खेतों का भाग बनाना शुरू किया था तो वहां से रोजाना मानव अस्थियाँ, कंकाल, छोटे छोटे मिटटी के खिलोने और मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) निकलने की चर्चाएं गाँव में आम हुआ करती थी.वास्तव में यह हड़प्पाई लोगों द्वारा छोड़े गए पुरातात्विक साक्ष्य ही थे जिनके बारे में उस दौरान गाँव के किसी व्यक्ति की कोई एतिहासिक दृष्टि नहीं थी.
जब हम छोटे थे तो चोर सिपाही का खेल खेलते हुए अक्सर जोहड़ के बीच से होकर जाने वाले संकरे मार्ग से निकलकर इन भेंटो की और निकल जाया करते थे.भेंटो के उपर तक चले जाना हमे किसी एडवेंचर से कम नहीं लगता था.परिवार वालो की तरफ से वहां जाने की साफ़ मनाही होती थी क्योंकि ऐसी धारणा गाँव में उस समय प्रचलित थी कि इन "भेंटो" पर जाने से भूत चिपट जाते है.उन दिनों इन भेंटो पर ही शमशान होते थे.छोटी भेंट को चुहड़ो की भेंट कहा जाता था क्योंकि उस समय प्रचलित
भेदभाव के कारण चुहड़ो के मुर्दों का अंतिम संस्कार छोटी भेंट पर ही किया जाता था.
हडप्पा कालीन कुछ इंटे हाल के वर्षो तक गाँव में दिखाई देती रही जो इस बात का प्रमाण है कि इन भेंटो से विस्थापित हुए लोगो ने अपने अधिवासों के निर्माण के लिए पुरानी ईंटो का प्रयोग किया जो वे अपने साथ पुरानी बस्तियों से लाये थे.
दूसरा विस्थापन सुजानखेडी की बस्ती से हथछोया में हुआ जिसके कारण अलग थे......

सुजानखेडी से हथछोया में बस्ती-विस्थापन
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सुजानखेडी आज के राजस्व दस्तावेजों में एक गैर-आबाद गाँव के रूप में दर्ज है.यहाँ की अधिकांश भूमि रेतीली है इसलिए इस क्षेत्र को सामान्यतः लोग मारू (मरुभूमि) भी कहते है.इस क्षेत्र की मिट्टी की सरंचना को देखकर यह स्पष्ठ हो जाता है कि 160-200 वर्ष पूर्व भी इस क्षेत्र में सतही जल का अभाव रहा होगा.ऐसा मानने का एक और स्पष्ट कारण यह है कि इस क्षेत्र की लगभग 1 किलोमीटर की परिधि में कोई तालाब नहीं था.किसी राजस्व दस्तावेज से भी इस बात की पुष्टि नहीं होती है कि यहाँ कभी कोई तालाब रहा हो.सुजानखेडी से हथछोया में बस्ती-विस्थापन के दो मूल कारण रहे:-
1. सुजानखेड़ी में जलाभाव
2. 1824 का किसान विद्रोह

सुजानखेड़ी मे जलाभाव -
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सुजानखेड़ी मे जलाभाव इस क्षेत्र से वर्तमान हथछोया की बस्ती के निर्माण के लिए एक बड़ा कारण माना जा सकता है। सुजानखेड़ी के आसपास के लगभग एक किलोमीटर के क्षेत्र मे तालाब के कोई साक्ष्य  नहीं मिलते है, यमुना नदी की यहाँ से दूरी लगभग 15 किलोमीटर है, सुजानखेड़ी की बस्ती का अस्तित्व  दिलावरों (हमारे) खेत के स्थान पर माना जाता है।  एक बात तो तय है कि सुजानखेड़ी से हथछोया मे बस्ती विस्थापन जल्दबाज़ी मे नहीं हुआ था और न ही महामारी फैलाना आदि ही इस विस्थापन का जनक था।  वास्तव मे सुजानखेड़ी के स्थान पर किसी अधिवास के कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं पाये गए है। इस स्थान से कोई मृदभांड या मानव कंकाल जैसा साक्ष्य न मिल पाना इस बात का प्रमाण है कि यहाँ से हथछोया मे बस्ती विस्थापन बड़े आराम से,सुविधाजनक तरीके से और पूर्णतः हुआ था। यानि बस्ती वासी यहाँ से हथछोया विस्थापित होते समय अपने साथ एक एक ईंट तक ले गए और तत्कालीन बस्ती-स्थल पर पीछे बस्ती का कोई अवशेष नहीं छोड़कर गए।
हमारे दादा फूलसिंह दिलावरे बताते थे कि उन्होने अपने दादा से सुना है कि सुजानखेड़ी मे पानी कि भारी किल्लत हो गई थी और आसपास कोई तलब न होने के कारण लोग बहुत परेशान थे। वर्तमान हथछोया के स्थान पर बहुत घने जंगल थे जहां कोई आता जाता नहीं था क्योंकि भयानक जंगली जानवरों का डर हमेशा बना रहता था। बताते है कि एक बार किसी का झौटा ( भैंसा) खुलकर जंगल की और चला गया, जब वह शाम को अपना पेट भर कर वापस लौटा तो गारे-पानी मे सना (भीगा) हुआ था। उसे देखकर लोगो की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। अगले दिन सुबह उस झौटे को फिर से खोला गया और गाँव के लोगो ने समूह बनाकर उसका पीछा किया तो वह वर्तमान हथछोया के जंगलों की और गया और जंगल मे एक विशाल तालाब पर जाकर पानी मे घुस गया। हजारों बीघे के तलब को देखकर सुजानखेडी वासियों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा और उन्होने तत्काल ही उस तलाब के किनारे बस्ती विस्थापन का फैसला ले लिया। यह विस्थापन हथछोया मे सुनियोजित नहीं था क्योंकि जिसको जहां उपयुक्त जगह दिखी उसने वहीं घर बना लिए। हड़प्पा बस्ती जैसी सुनियोजियत बस्ती सुजानखेड़ी वासी नहीं बना पाये। इसका मूल कारण यह था कि वे पानी कि किल्लत के कारण हड़बड़ी मे थे अतः आनन फानन मे जिसको जहां अनुकूलतम जगह दिखी उसने वही पर बस जाने का निर्णय कर लिया। कुछ दिनों मे सुजानखेड़ी से अपने अधिवासों मे प्रयुक्त समग्र निर्माण सामाग्री का उन्होने हथछोया लाकर पुनः प्रयोग अपने अधिवास निर्माण मे कर लिया।

* 1857 का स्वाधीनता संग्राम
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हथछोया मे सुजानखेड़ी से बस्ती विस्थापन के पीछे 1824 का किसान विद्रोह और 1857 का स्वाधीनता संग्राम भी एक बड़ा कारण माना जा सकता है। सन 1824 मे हुए कुंजा बहादुरपुर किसान विद्रोह की लपटे इस समस्त क्षेत्र मे फैल गई थी। सुजानखेड़ी के रौढ़ा सिंह दिलवारे, कुंजा बहादुरपुर के विजय सिंह के नजदीकी रिश्तेदार थे, रौढ़ा सिंह के पुत्र भजन सिंह कुंजा मे ब्याहे थे। अतः 1824 के किसान विद्रोह मे रौढ़ा सिंह ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। इस विद्रोह के सूत्रधारों मे से एक होने के कारण रौढ़ा सिंह को अंग्रेज़ सरकार ने मौत की सजा सुनाई थी। इस प्रकार रौढ़ा सिंह दिलावरे को 1824 के किसान विद्रोह मे शहीद होने का गौरव प्राप्त है। 1857 के संघर्ष मे रौढ़ा सिंह के पुत्र भजन सिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। शामली तहसील लूट के रणनीतिकार भजन सिंह दिलावरे ही थे। इस क्षेत्र मे 1857 के स्वाधीनता संघर्ष की बागडौर भजन सिंह और मोहर सिंह (शामली) के हाथ मे थी। 1857 के संघर्ष मे भजन सिंह की भूमिका के कारण ही अंग्रेज़ सरकार ने सुजानखेड़ी गाँव को तबाह कर दिया था । फलस्वरूप गाँव वासियों ने हथछोया की आधुनिक बस्ती मे स्थानांतरण कर लिया।
   इस प्रकार हथछोया की वर्तमान बस्ती, सुजानखेड़ी से हथछोया मे बस्ती विस्थापन के कारण अस्तित्व मे आई।      
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मुगलकाल में हथछोया:
परवर्ती मुगलकाल में हथछोया मुगल शासक द्वारा सूफी संत अब्दुल कद्दुस गंगोही को सनद के रूप में प्राप्त एक राजस्व ग्राम था।शेख कद्दूस ने अपने नाती पीरजादा शेख सैय्यद अली को सौंपा था ताकि वह यहां से खराज (भू राजस्व) की वसूली कर सके।हथछोया का लगभग 16000 बीघे का रकबा था जिसमें करीब 3000 बीघा का रकबा जमींदार रोढ़ा सिंह की मिल्कियत था।
    पीरज़ादों पर दिलावरों का आक्रमण एवं धर्म रक्ष------------

     भारत में इस्लाम के प्रचार का अघोषित विभाग था सूफी फकीरों का।ये सूफी फ़क़ीर अक्सर छल प्रयोग अथवा लालच देकर हिंदुओं का इस्लाम में धर्मान्तरण कराने का कार्य करते थे।धर्मांतरण इनका प्रमुख उद्देश्य था।चिश्ती सिलसिले ने भारत में छल के द्वारा सर्वाधिक हिंदुओं का धर्मांतरण किया।चिश्ती सूफियों की खानकाहे कव्वाली गायन का बड़ा केंद्र होती थी,भारत में कथित गंगा-जमुनी तहजीब इसी सिलसिले की कल्पना की उपज है।इन्होंने हिंदुओं को खानकाहों में लाकर,छल से उन्हें प्रसाद के नाम पर गौ मांस खिलाकर धर्मान्तरण कराया।इसके अतिरिक्त जजिया से बचाव के लालच में कुछ जमींदारों ने धर्मान्तरण स्वीकार किया तो कुछ ने आर्थिक लालच में इस्लाम अपनाया।शासकों ने तलवार को धर्मान्तरण का जरिया बनाया।लेकिन सूफ़ियों ने छल एवं लालच के द्वारा ही अधिकांश धर्मान्तरण कराया।

यमुना खादर का हथछोया गांव चिश्ती सूफी सिलसिले के प्रसिद्ध सूफी शेख सैयद अब्दुल कद्दुस गंगोही के नाती , पीरज़ादा सैयद अली को मिला एक राजस्व ग्राम था।कद्दुस का केंद्र गंगोह था।आज भी गंगोह में उसकी मजार है।इस मजार पर हजारों की संख्या में मूर्ख हिन्दू चादर चढ़ाने जाते हैं। असल में पीरज़ादे, सूफी सन्तों (पीर) की जायज़/नाज़ायज़ औलाद होते थे।अक्सर ये सूफी अपनी इन संतानों को कोई गाँव तत्कालीन हुक्मरानों से दिलवा दिया करते थे जिसकी समस्त मालगुज़ारी इन पीरज़ादों द्वारा ही वसूली जाती थी।
हथछोया में इन पीरज़ादों दो डेरे थे जिनमे पीरज़ादे ठहरा करते थे।एक डेरा गुल्ही के किनारे, पुरानी मस्जिद के स्थान पर था जहाँ आजकल अबलु एवम् मोम्मद का परिवार रहता है।दूसरा डेरा पुरानी डाब्बर के किनारे पर था जो जुगल किशोर दिलावरे के घेर के बराबर में था जहाँ आजकल मामचंद पंडित का परिवार रहता है।इस डेरे को हथछोया एवं सुजानखेड़ी का राजस्व लेने का सनद प्राप्त था।इसका प्रमुख पीरज़ादा शेख सैयद अली था, जो अब्दुल कद्दुस गंगोही का नाती था।पूरा गाँव शेख सैयद अली को देखते ही झुककर सलाम करता था।गाँव के दीवानी और फौजदारी के मामलों का निस्तारण पीरज़ादा सैय्यद अली की निजामत के द्वारा किया जाता था।मुगलकाल में ये लोग "सद्र उस सुदूर" (धार्मिक मामलों का विभाग) के तहत कार्य करते थे जिनका प्रमुख कार्य शरीयत का अनुपालन करवाना होता था।अक्सर पीरज़ादे मुहतसिब के तौर पर नियुक्त होते थे। ‘शरियत’ के प्रतिकूल कार्य करने वालों को रोकना, आम जनता (विषेषकर मुस्लिम ) को दुश्चरित्रता से बचाना, सार्वजनिक सदाचार की देखभाल करना, शराब, भांग के उपयोग पर रोक लगाना, जुए के खेल को प्रतिबन्धत करना, मंदिरों को तुड़वाना (औरंगज़ेब के समय में),हिंदुओं का धर्मपरिवर्तन करवाना आदि मुहतसिब के महत्त्वपूर्ण कार्य थे। इस पद की स्थापना औरंगज़ेब ने की थी। ये पीरज़ादे गाँव में ही अपना कैम्प किया करते थे जिसे अक्सर डेरा कहा जाता था।पीरज़ादों के कैम्प में अक्सर चिश्ती एवं नक्शबंदी सिलसिले के सूफियों का आना होता रहता था।उन दिनों निकटवर्ती कस्बा गंगोह सूफी संतों का बड़ा केंद्र था।गंगोह में चिश्ती सिलसिले के प्रमुख सूफी संत "शेख शाह अब्दुल कद्दुस गंगोही" की खानकाह थी।अब्दुल कद्दुस गंगोही प्राणायाम एवं अन्य यौगिक क्रियाओं में पारंगत था।वह "अलखगिरी" उपनाम से लिखा भी करते था इसलिए "अलख" नाम से भी जाने जाते थे।इस कारण उन्हें हिंदुओं के गोरखपंथी सन्तों से अलग करना सामान्य जन के लिए भ्रमित करने वाला था।गोरखपंथी भी "अलख निरंजन" का उदघोष करते हैं।सूफी संतों ने हिन्दू धर्म से प्राणायाम,यौगिक क्रियाएं एवं हठयोग जैसी पद्दत्तियाँ ज्यों की त्यों अपना ली थी।अब्दुल कद्दुस,शाह साबिर कलियारी का शिष्य था और चिश्ती सिलसिले का सूफी था।सहारनपुर,मुज़फ्फरनगर और शामली के क्षेत्र में चिश्ती सिलसिले ने हिंदुओं के धर्मांतरण की एक बड़ी मुहिम चलाई।धर्मांतरण के औरंगजेबी और सूफी तरीके में एक बड़ा अंतर था कि सूफियों ने छल एवं शांतिपूर्ण तरीके से गरीबों को आर्थिक मदद का लालच देकर धर्मांतरण की प्रक्रिया को सम्पन्न किया ।सूफी अपने इस प्रयास में काफी सफल भी रहे।सूफी निजामुद्दीन औलिया के अलावा कोई भी सूफी अविवाहित नही था।ये गृहस्थ सन्त थे।समस्त मानवीय अवगुणों से ये भी अछूते नही थे।अतः धर्म प्रचार के सिलसिले में भ्रमण के दौरान इन्होंने विवाहेत्तर संबंध स्थापित किये जिससे पैदा संताने पीरज़ादा कहलाये।बादशाही दरबार मे अपने संबंधों का लाभ उठाकर इन्होंने अपनी उन नाजायज़ संतान "पीरज़ादों" को छोटी छोटी जागीर आवंटित करा दी।जागीरी इलाके में ही रहकर ये पीरज़ादे लगान वसूली के साथ साथ जोर जबरदस्ती स्थानीय लोगों का धर्मान्तरण करते थे।हथछोया में भी इन्हीं पीरज़ादों द्वारा कई हिन्दू गुर्जर परिवारों को छल एवं लालच के द्वारा इस्लाम धर्म मे परिवर्तित किया।लेकिन जमींदार रोढ़ा सिंह के प्रबल प्रतिरोध के कारण पीरज़ादों को हथछोया के एक हिन्दू परिवार के अलावा धर्म परिवर्तन में अधिक सफलता नही मिल पाई।वे गांव के एक गुर्जर परिवारों को छोड़कर अन्य किसी भी बिरादरी के किसी भी परिवार के इस्लाम मे धर्मान्तरण में सफलता प्राप्त नही कर पाए।
जमींदार रोढ़ा सिंह का परिवार अपने अक्खड़पन एवम् दबंगई के लिए दूर दूर तक मशहूर था।उन्होंने कभी भी पीरजादों के सामने सिर नहीं झुकाया ।इतना ही नहीं वे हमेशा पीरज़ादों के हुक्मों की नाफरमानी करते थे।पीरज़ादों ने लालच,दबंगई,जोर जबरदस्ती समस्त नैतिक अनैतिक तरीकों से जमींदार रोढ़ा सिंह को इस्लाम मे धर्मांतरित करने के प्रयास किये।रोढ़ा सिंह की दबंगई एवं अक्खड़पन के कारण पीरज़ादों का विश्वास था कि यदि वे उनका धर्म परिवर्तन करने में सफल हो गए तो क्षेत्र में इस बात का एक बड़ा सन्देश जाएगा और पीरज़ादों को धर्मांतरण की मुहिम चलाने के लिए एक बड़ा नैतिक बल प्राप्त होगा।पीरज़ादों का कोई हथकंडा जमींदार परिवार के धर्मपरिवर्तन के लिए काम नही आया। इस कारण पीरज़ादा सैय्यद अली, जमींदार रोढ़ा सिंह परिवार को नापसंद करने लगा और उसने अपनी सारी शक्ति उनके परिवार के उत्पीड़न एवं सार्वजनिक रुप से अपमानित करने पर लगा दी।सैय्यद अली ने जमींदार के लिए फरमान जारी किया कि वह उनके डेरे पर हाज़िरी दे और उन्हें सलाम करे तथा उनके हुक्म की तामीली करें।लेकिन जमींदार किसी भी कीमत पर झुकने को तैयार नही था।
रोढ़ा सिंह परिवार के पास एक लगभग 50 मीटर लम्बी दहलीज़ (गैलरी) थी।वे शरणागत वत्सल थे अर्थात उनके पास यदि किसी ने शरण लेली तो उसकी रक्षा वे अपनी जान पर खेलकर करते थे।यदि किसी ने किसी व्यक्ति की हत्या करने के बाद भी उनके पास आकर शरण लेली तो किसी की मज़ाल नहीं थी कि उस शरणार्थी का कोई बाल भी बांका कर सके।लम्बी दहलीज़ अक्सर एक सुरक्षित शरणगाह का काम करती थी। इस बात से पीरज़ादा सैय्यद अली न केवल परेशान था बल्कि जमींदार के बागी तेवर से अपनी सुरक्षा को लेकर सजग भी रहता था।
बहुत सोच विचार करने के बाद पीरज़ादों ने तय किया कि गाँव के मुख्यद्वार, जो डेरे के पास ही था, पर एक दीवार का निर्माण कराया जाये जिसमे एक मोरी (छोटा दरवाजा) बनवाई जाए ताकि गाँव के अंदर बाहर जाने के लिए हर किसी को मोरी से गुजरना पड़े और मोरी से गुजरते समय हर किसी को अपना सिर झुकाना पड़े।इस बात की खबर जब जमींदार रोढ़ा सिंह को लगी तो उन्होंने तय किया कि मोरी में से पार निकलने के लिए सिर की बजाय पैर के बल घुसा जाये ताकि उन्हें सिर न झुकाना पड़े।इस प्रकार दिलावरों ने कभी भी पीरज़ादों के सामने समर्पण करना और धर्मपरिवर्तन करना स्वीकार नही किया।
इस घटना से पीरज़ादों और जमींदार के बीच काफी कड़वाहट आ गई।रोढ़ा सिंह भी पीरज़ादों से गांव को हमेशा के लिए मुक्त कराने की योजना पर कार्य कर रहे थे। पीरज़ादों के घर पीसने के लिए गाँव की दलित महिलाएं सुबह सुबह जाया करती थी।रोढ़ा सिंह एवं उनके पुत्र भजन सिंह ने एक योजना बनाई।उन्होंने पिसाई करने वाली एक दलित महिला को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि जब वह सुबह पीरज़ादे के घर गेंहू पीसने जायेगी तो उसे शौर मचाना है कि पीरज़ादा उसके साथ जबरदस्ती कर बलात्कार करने की कोशिश कर रहा है। उस महिला ने अगले दिन सुबह ऐसा ही किया। पहले से तैयार बैठे जमींदार रोढ़ा सिंह परिवार के लोगों ने योजनाबध्द तरीके से अन्य ग्रामीण जनों के साथ उस महिला की मदद के करने के लिए हथियारों सहित पीरज़ादों के डेरे पर आक्रमण कर दिया जिससे उनमे हड़कम्प मच गया। पीरज़ादा शेख सैयद अली ने भागकर जान बचानी चाही लेकिन मौके पर मारा गया बाकी ने भागकर अपनी प्राणरक्षा की।तय योजनानुसार दोनों डेरों पर एक साथ आक्रमण किया गया था। सुबह होने तक दोनों डेरों से पीरज़ादे भाग चुके थे।ग्रामीणों ने डेरों में जमकर लूटपाट की।शेख सैयद अली की लाश कई दिन तक जंगल में पड़ी रही।आते जाते लोग उसकी लाश को ठोकर मारते थे।इसी कारण इस जगह का नाम भी "ठोकरों वाला जंगल" (बाद में टोखरों) पड़ गया। कोई सैयद अली की लाश तक लेने के लिए नही आया।कई दिन बाद, जमींदार रोढ़ा सिंह और उनके साथी,सैय्यद अली की लाश को घसीटकर लाये और नाले के किनारे गड्ढा खोदकर दबा दिया तथा उसके ऊपर ईंट रख दी।कालान्तर में वर्षों बाद कुछ लोगों ने उसे मजार समझकर पूजना ही शुरू कर दिया।सैयद अली की मजार बिगड़कर सैदली कहलाने लगी।पीरजादों पर आक्रमण और शेख सैय्यद अली की हत्या की घटना के बाद पीरज़ादों ने दोबारा से कभी हथछोया में वापस आने का प्रयास नही किया। इस घटना के बाद हथछोया को पीरज़ादों के आतंक से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई और जमींदार रोढ़ा सिंह की ख्याति दूर दूर तक फ़ैल गई।इसी घटना के कारण गांव के लोगों ने जमींदार रोढ़ा सिंह को "दिलावरा-अर्थात दिल वाला" की उपाधि से नवाजा।इसके बाद जमींदार परिवार दिलावरे नाम से जाना जाने लगा।
हथछोया में कुछ गुर्जर परिवारों का धर्म परिवर्तन क्योंकि सूफियों द्वारा करवाया गया था अतः सूफीमत में हिन्दू एवं बौद्ध पद्दतियों जैसे प्रणायाम,बौद्ध,पीरी-मुरीदी, रहस्यवाद, हठयोग, ध्यान,संगीत(समा) आदि का मिश्रण था इसलिए इस्लाम मे परिवर्तित गुर्जर परिवारों में कभी धार्मिक कट्टरपन जगह नही बना पाया।फलस्वरूप हिन्दू गुर्जर और धर्मांतरित मुस्लिम गुर्जर परिवारों में आज भी वही समन्वय एवं प्यार देखने को मिलता है।भारतीय इस्लाम पर सूफी आंदोलन का एक सकारात्मक प्रभाव यह है कि भारतीय मुस्लिम आज भी शांति एवं अमन पसन्द है एवं भाई चारे में विश्वास रखता है।आजकल कुछ नवयुवक जरूर कट्टर इस्लामी पन्थ "अहले-हदीस/सल्फी/वहाबी की चपेट में आकर नफरत की विचारधारा को गले लगा रहे हैं।तमाम नकरात्मताओं के बावजूद हिंदुत्व के अतिरिक्त सूफ़ियत में ही वह ताकत है जो दुनिया को कट्टर इस्लामी वहाबी आतंकवाद के साये से बाहर निकाल सकता है।सूफीमत धार्मिक समन्वय का प्रतिफल है जिसमें हिंदुत्व, इस्लाम और बौद्ध धर्म का वह सारतत्व निहित है जो दुनिया को शांति का संदेश देता है।।

(प्रस्तुत लेख लेखक द्वय का संयुक्त शौध-पत्र है)


  
                                                               # सुनील सत्यम




 

शनिवार, 16 जुलाई 2011

शुक्रवार, 14 मार्च 2008

असर !

सोचता हूँ कभी-कभी॥
क्या मेरे होने का,
है कुछ मतलब भी।
मेरा होना न होना ,
क्या डालता है कहीं कुछ ,
असर भी॥?
तो समझ मे आता
है कि मुझे बहुत कुछ करना है
और जाना भी है दूर अभी...
कुछ सकारात्मक, कुछ रचनात्मक
तभी तो मेरे होने का कुछ मतलब होगा॥
तभी तो डालूँगा मै कुछ असर भी॥

कुंवर सत्यम.

बुधवार, 12 मार्च 2008

बस्ती-विस्थापन से अस्तित्व में आई अधिकांश वर्तमान बस्तियां.

पुराना इतिहास है हथछोया का.इसका इतिहास जानने के लिए हमें इतिहास के धूल-धूसरित पन्नो को खंगालना होगा,जो बहुत श्रम साध्य और शौध का विषय है.अपने इतिहास ज्ञान,इतिहास-लेखन की तकनीकियों और जनश्रुतियों का सहारा लेकर भी हम हथछोया के अतीत पर दृष्टिपात कर सकते हैं.

हथछोया का शाब्दिक अर्थ:
हथछोया मूलतः दो शब्दों से मिलकर बना है-
हद (सीमा,अति)+चोया (जल स्तर). यह इस शब्द का संधिविच्छेद न होकर स्थानीय भाषा के दो शब्दों का एक साथ मिलकर प्रयोग है.
अर्थात ऐसा क्षेत्र जहाँ जल स्तर बहुत ऊपर ही उपलब्ध हो. गाँव की वर्तमान बस्ती के स्थान पर विशाल भौगोलिक क्षेत्र पर तालाब होने के कारण भूमिगत जल स्तर (चोया) की हद भूसतह के एकदम समीपस्थ थी.इसी कारण हद्चोया शब्द की उत्पत्ति हुई जो कालांतर में बिगड़कर हथछोया बन गया.
वास्तव में हथछोया के अधिवास का अध्ययन कई पहलुओं पर हमारा ध्यान केन्द्रित कर देता है, जो काफी मजेदार है.
हथछोया के बस्ती प्रारूप और प्रकार का विश्लेषण करे तो हम आसानी से समझ सकते है कि इस गाँव का इतिहास 160-200 वर्षो से अधिक पुराना नहीं होना चाहिए..इसका कारण स्पष्ट रूप से यह है कि यह वह समय है जब भवन निर्माण में लखौरी ईंटो का प्रयोग होता था..लखौरी ईंटो से निर्मित ही कुछ मकान/घर
 इस गाँव में मिलते है जो आजकल अवशेष मात्र है.मुख्य रूप से गाँव की प्राचीन चौपाल जो 50 वर्ष से पुरानी नहीं है और लाला गीताराम का घर लखौरी ईंटो से बना है.इसके अतिरिक्त कोई भी ऐसी सरंचना गाँव में नहीं मिलती है जो इसके अपने इतिहास को 160-200 वर्षों से पीछे ले जाती हो.
लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि गाँव की बस्ती से कहीं अधिक पुराना गाँव वासियों का इतिहास है.
हथछोया गाँव की बस्ती की स्थापना के पीछे मै " बस्ती विस्थापन" सिद्धांत को मूल कारण मानता हूँ.हडप्पा सभ्यता के पतन के लिए इतिहासकारों ने अनेक सिद्धांत दिए है. लेकिन इतिहास का जागरूक विद्यार्थी होने के कारण हड़प्पा के पतन को लेकर मेरा अपना मत है जिसे मै "बस्ती-विस्थापन" सिद्धांत कहता हूँ.मेरा मत है कि क्योंकि आज से 3000 से 4000 वर्ष पूर्व चिकित्सा सुविधाएँ सुलभ नहीं थी.उस समय महामारी और बाढ़ जैसी आपदाएं आम थी.महामारी की स्थिति में लोग अपनी बस्ती को छोड़कर समीप के ही अन्य स्थान पर विस्थापित होकर नई बस्ती बसा लेते थे.यदि हम हडप्पा कालीन बस्तियों का अध्ययन करे तो हम पायेंगे कि जहाँ भी हमें हड्प्पाई अधिवासों के अवशेष मिले है उनके 1-10 किलोमीटर की परिधि में ही हमे आधुनिक जीवंत बस्तियां भी मिलती है. उदाहरण के रूप में हम हथछोया और हुलास को ले सकते है. हुलास जो कि सहारनपुर जनपद में हड्प्पाई अधिवास है, के 1-5 किलोमीटर की परिधि में बरसी,टिकरोल,और मनोहरा आदि कई गाँव है.इसी प्रकार हथछोया के समीप ही स्थित "छोटी और बड़ी भेंट" तथा सुजानखेड़ी की स्थिति बस्ती विस्थापन के पक्ष में प्रमाण हैं.हुलास,बड़ी और छोटी भेंट, एवं सुजानखेडी के पतन और बरसी,टिकरोल,मनोहरा तथा हथछोया की उतपत्ति में निकट का सम्बन्ध है.आज हमारे पास यदि अवशिष्ट बस्तियों के पतन के साक्ष्य नहीं है तो इनके समीपस्थ वर्तमान बस्तियों की उत्पत्ति के भी पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है.अतः यह न मानने का कोई कारण नहीं है कि महामारी जैसे कारणों से अवशिष्ट बस्तियों से वर्तमान बस्तियों में बस्ती का विस्थापन होने से अधिकांश वर्तमान अधिवास अस्तित्व में आये.

 गाँव की मूल बस्ती से लगभग 1.5 किलोमीटर दूरी पर सुजानखेड़ी और ",विशाल डाबर (जोहड़) के दूसरी और स्थित हड़प्पा कालीन दो बस्तियों से अलग-अलग कारणों से बस्ती का विस्थापन हुआ और यहाँ के लोग हथछोया के मूल स्थान की भौगोलिक रूप से लाभदायक अवस्थिति के कारण यहाँ आ बसे जिसके पुख्ता प्रमाण हैं.
हथछोया गाँव में जोहड़,गुल्ही,देवावाला और यहाँ से बमुश्किल आधा किलोमीटर की दूरी पर बराला नामक चार विशालकाय तालाबों का 200 बीघे से अधिक का रकबा था, जिसके आज अवशेष मात्र हैं.यह क्षेत्र पूर्व में घने जंगलों से आबाद क्षेत्र था.हड़प्पा कालीन बस्तियों से भयानक महामारी के कारण सम्पूर्ण बस्ती का विस्थापन, विशाल जोहड़ के पश्चिम की और
हो गया, 20 वर्षो पहले तक इन दोनों बस्तियों के अवशेष गाँव में " बड़ी भेंट" और "छोटी भेंट" के नाम से रहा है.ये वास्तव में प्राचीन हड़प्पा कालीन बस्तियों के अवशेष थे जो हरित-क्रान्ति के फलस्वरूप हुए कृषि विकास की भेट चढ़ गये.
जब हम छोटे थे तो चोर सिपाही का खेल खेलते हुए अक्सर जोहड़ के बीच से होकर जाने वाले संकरे मार्ग से निकलकर इन भेंटो की और निकल जाया करते थे.भेंटो के उपर तक चले जाना हमे किसी एडवेंचर से कम नहीं लगता था.परिवार वालो की तरफ से वहां जाने की साफ़ मनाही होती थी क्योंकि ऐसी धारणा गाँव में उस समय प्रचलित थी कि इन "भेंटो" पर जाने से भूत चिपट जाते है.उन दिनों इन भेंटो पर ही शमशान होते थे.छोटी भेंट को चुहड़ो की भेंट कहा जाता था क्योंकि उस समय प्रचलित
भेदभाव के कारण चुहड़ो के मुर्दों का अंतिम संस्कार छोटी भेंट पर ही किया जाता था.
हडप्पा कालीन कुछ इंटे हाल के वर्षो तक गाँव में दिखाई देती रही जो इस बात का प्रमाण है कि इन भेंटो से विस्थापित हुए लोगो ने अपने अधिवासों के निर्माण के लिए पुरानी ईंटो का प्रयोग किया जो वे अपने साथ पुरानी बस्तियों से लाये थे.
दूसरा विस्थापन सुजानखेडी की बस्ती से हथछोया में हुआ जिसके कारण अलग थे.......जारी
@ सुनील सत्यम