फ़ूलसिंह दिलावरे.-अदभुद कर्मयोगी
जब आप खुद लेखक हों और अपने किसी सगे पर लिखना हो तो लाख कोसिश करने पर भी पक्षपात की गुंजाइश बची रहती है। यह स्वाभाविक भी होता है क्योंकि लिखने वाला भी आखिर इंसान ही होता है और उसमे समस्त मानवीय अवगुणों का भंडार होता है। पुस्तक का सह-लेखक होने के नाते और साथ ही एक संवेदनशील लेखक के नाते भी, मै पूरा प्रयास करूंगा कि स्वयं को तटस्थ रखकर अपने बाबा चौधरी फूल सिंह दिलावरे का वास्तविक चरित्र चित्रण कर सकूँ।
सुजानखेड़ी के संस्थापक चौधरी सुजान सिंह की पाँचवी पीढ़ी के प्रतिनिधि मेरे बाबा फूल सिंह दिलावरे अपने पिता चौधरी मामराज सिंह दिलावरे के ज्येष्ठ पुत्र थे। इनके छोटे भाई चौधरी मंगल सिंह दिलावरे थे । दो बहने थी। जिनमे एक बुगली देवी सहारनपुर के घाड़ क्षेत्र के गाँव मेघनमजरा मे और दूसरी बहन गेंदी देवी गंगोह के पास मेनपुरा मे ब्याही थी। युवावस्था मे ही पिता की मृत्यु के बाद घर की ज़िम्मेदारी बड़े पुत्र होने के नाते फूल सिंह के कंधों पर आ गई थी। इस कारण कक्षा चार के बाद स्कूली शिक्षा को अलविदा कहना पड़ा। बचपन मे मासूम कंधों पर पहाड़ सा बोझ लिए दो-दो बहनों की शादी और छोटे भाई की शिक्षा सभी कार्य बड़ी सहजता और कुशलता से सम्पन्न किए। अंग्रेज़ो से टकराव और जंग ने दिलावरे परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ खड़ा कर दिया था। रौढ़ा सिंह दिलावरे और भजन सिंह दिलावरे (दोनों पिता-पुत्र) की शहादत के बाद कोई पुरुष परिवार मे शेष नहीं बचा था। शामली तहसील लूट के बाद बनत मोर्चे मे क्रांतिकारियों की हार सुनिश्चित जानकार भजन सिंह ने भूमिगत हो जाना ही देश और क्रान्ति के हित मे समझा था। भजन सिंह अपने साथियों और पत्नी सहित संदल-नवादा चले गए, जहां से जाकर हरियाणा मे करनाल के पास दिलावरा गाँव बसाया। एक मुखबिर द्वारा अंग्रेज़ हुकूमत को भजन सिंह के दिलावरा गाँव मे छुपे होने की खबर दे दी गई। अंग्रेज़ फौज ने दिलावरा गाँव को चारों और से घेरकर जला दिया। भजन सिंह को गिरफ्तार करके बिना मुकदमा चलाये दिलावरा गाँव मे ही पेड़ पर लटका कर तत्काल फांसी दे दी गई। उनकी गर्भवती पत्नी लाड़ो गूजरी किसी तरह बचकर निकलने मे सफल हो गई। इधर गाँव मे दिलावरे परिवार की सारी संपत्ति अंग्रेज़ सरकार ने हड़प कर अपने चहेतों मे बाँट दी। लगभग दो वर्ष इधर-उधर भटकने के बाद लड़ों अपने एक वर्षीय पुत्र नथवा सिंह को लेकर पुनः हथछोया आ गई, जहां अब रहने के लिए टूटी-फूटी छत के अलावा कुछ शेष नहीं बचा था। लाड़ों ने हार नहीं मानी। गरीबी और अभाव के बावजूद उन्होने पुत्र नथवा की परवरिश की। अब न तो उनके पास जमींदारी बची थी और न ही आजीविका का सुरक्षित साधन। लाड़ो ने बड़ी विषम परिस्थितियों मे दिलावरे परिवार का पुनर्निर्माण किया। अपनी मेहनत से खेती के लिए जंगल साफ करके जमीन जुटाई, घर बनाया, बच्चे को बाप का प्यार भी खुद ही दिया। नथवा सिंह के चार पुत्र हुए बख्तावर सिंह, राजाराम, मामराज सिंह और सूरज सिंह। जिनमे ममराज सिंह के बड़े पुत्र फूल सिंह थे।
दिलावरो का वंश वृक्ष
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सुजान सिंह (सुजान खेड़ी के संस्थापक)
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रौढ़ा सिंह (1824 के किसान आंदोलन के सैनिक,फांसी)
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भजन सिंह दिलावरे( 1857 की क्रांति के शामली क्षेत्र के प्रमुख यौद्धा,फांसी) पत्नी लाडो गुजरी
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नथवा सिंह –(पत्नी दरबों देवी)
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बख्तावर सिंह राजाराम मामराज सिंह(पत्नी धर्मी देवी) सूरज सिंह
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1-बारू सिंह 1-घसीटा राम 1- फूल सिंह 1-मेहर सिंह
2- मुल्तान सिंह 2- मंगल सिंह 2-रतन सिंह
3-पुन्ना सिंह
दिलावरे परिवार ने आज़ादी की लड़ाई की कीमत मुसीबतों और अभावों के रूप मे चुकाई। अपनी मेहनत के बल पर पुनः खेती के लिए जमीन जुटाई। हमारे बाबा जी ने अपनी जमीन के अलावा कुन्दन सिंह और अतर सिंह की जमीन मे बटाई पर खेती की। बाबा जी की शादी गंगोह के पास जुखेड़ी मे हुई थी। दादी बोहती देवी और बाबा फ़ूलसिंह की बारह संतानों ( आठ पुत्र और चार पुत्रियों ) मे से मात्र दो-एक पुत्र (श्री प्रेम सिंह दिलावरे , पुत्री करेशनी देवी) ही जीवित रहे। दस संतानों की अकाल और अपरिपक्व मौत ने बाबा और दादी को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था। इस कारण बाबा जी को प्रभु चरणो मे शांति मिली, बाबा जी श्रीमदभगवदगीता की शरण मे चले गए। बाबा जी अपने साथ हमेशा श्रीमदभगवदगीता रखते थे और इसका नियमित पाठ करते थे। गीता के संस्कार उन्होने मृत्युपर्यंत नहीं छोड़े। अकेले पुत्र की दीर्घायु के लिए बाबा जी ने महीनों तक रात्रि मे “दरिया’ मे जल समाधि लगाई और नियमित अर्घ्य दिया। हनुमान जी के भी बाबा जी पक्के भक्त थे।
हड्डी उतरने (जोड़ से खिसक जाने) और पैर की मोच के उपचार मे बाबा जी को महारत हासिल थी। पंजाब,हरियाणा,दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों से लोग उपचार के लिए बाबा जी के पास आते थे। बाबा जी हमेशा निस्वार्थ और बिना किसी लालच के बीमार लोगों का उपचार करते थे। अनेक लोगो ने उनसे अपना इलाज कराया। कई बार कुछ लोगों ने आराम मिलने के बाद बाबा जी को बदले मे कीमती उपहार अथवा पैसे देने चाहे तो उन्होने बड़ी विनम्रता से यह कहकर लेने से इनकार कर दिया “ जिस दिन मै अपनी सेवा की कीमत ले लूँगा, मेरी विध्या उसी दिन नष्ट हो जाएगी “ उपचार क्रिया, बाबा जी हमेशा सूर्योदय के बाद एवं सूर्यास्त के पहले तक ही करते थे। वे कहते थे “ मेरी विध्या, सूर्यास्त के बाद काम नहीं करती। रात मे उपचार के लिए आने वालों को बाबा जी अपने पास ही ठहराते थे, उनके रहने एवं भोजन पानी की व्यवस्था भी खुद ही बिना किसी शुल्क के करते थे।
उनका शरीर एकदम सधा हुआ था, न पेट न ही शरीर पर अतिरिक्त चर्बी। मुझे याद है कि एक बार बड़े भाई संजय सिंह और उनके मित्र, खेत मे, रस्सी कूद खेल रहे थे। तभी बाबा जी वहाँ आ गए और उन्होने बालको की उस टीम को चुनौती दे डाली “ अगर कूदना ही है तो टोपी के बराबर रस्सी हाथों मे लेकर कूद कर दिखाओ” वहाँ उस समय जितने भी बच्चे थे उनमे कोई भी ऐसा नहीं कर पाया। सब उस समय हैरान रह गए जब बाबा जी ने सिर से अपनी टोपी उतारी और उसे दोनों हाथों मे पकड़कर लगातार 15-20 जंप कर डाले। वह दृश्य आज भी मेरी आँखों के सामने तैरता रहता है। गाँव और पिंडौरा के मेले का हमे बचपन मे बड़ा चाव रहता था। मेले के समय बाबा जी मुझे अक्सर अठन्नी या एक रुपया देते थे ताकि मै मेला देख सकूँ । एक बार मैंने और मेरी बहन बबली ने गुल्लक मे पैसे जोड़ने शुरू किए। पैसे हमसे खर्च न हो जाए, इसलिए हमने अपनी-अपनी गुल्लक अपनी दादी के पास रख दी। हमने बड़ी मेहनत से गुल्लक मे सैंकड़ों रुपये उस मंदे जमाने मे इकट्ठा कर लिए थे। बाबा जी ने खेत मे रामकेला का बाग लगाने की योजना बनाई। तीतरों नर्सरी से पेड़ खरीद कर लाते समय दादी ने हम दोनों बहन भाइयो की गुल्लक तोड़कर सारे पैसे बाबा जी को दे दिये। जब पेड़ लाकर बाग भी लग गया तो हमे पता चला कि हमारे पैसों से भी पेड़ खरीद लिए गए है। हमे बड़ा दुख हुआ और हमने अपनी नाराजगी बाबा जी के सामने ज़ाहिर कर दी। बाबा जी ने बड़े सहज शब्दों मे हमे समझाया “ पैसे तुम्हारे थे तो बाग भी तो तुम्हारे लिए ही लगा है।“ हमे बात समझ मे आ गई और हम बहुत खुश हुए।
अपनी मृत्यु के लगभग एक वर्ष पूर्व बाबा जी ने मेरे सामने गंगा स्नान की इच्छा व्यक्त की, मैंने तुरंत हाँ कर दी। अपनी गाड़ी से बाबा जी को लेकर मै हरिद्वार पहुंचा और बाबा जी को गंगा स्नान कराया। बाबा जी बहुत खुश हुए। परिवार मे सबसे छोटा होने के बावजूद भी बाबा जी अस्थियाँ गंगा मे प्रवाहित करने का अवसर भी मुझे ही मिल गया । यह मेरे लिए और भी बड़ा सौभाग्य था।
अपने जीवन के संध्या-काल मे बाबा जी परिवार की उपलब्धियों से बहुत संतुष्ट थे। काफी खुश भी रहते थे। सिर्फ मेरा पी.सी.एस. न बन पाना उन्हे हमेशा कष्टकारी लगा रहता था। यह उनका अंतिम सपना था। मैंने उनके संध्याकाल मे कई बार उनसे उनकी अंतिम इच्छा के बारे मे जानना चाहा तो उन्होने- मेरा पी.सी.एस. मे चयन हो जाना, मेरे द्वारा शाकुंभर मे जब कभी संभव हो,एक कमरे का निर्माण करवाये जाने को अपनी अंतिम इच्छा के रूप मे व्यक्त किया। उन्होने एक अंतिम इच्छा मृत्यु के बाद “जोड़ मे लड्डू’ बनवाना, और उनका अंतिम संस्कार गाँव के शमशानों मे करवाने की भी इच्छा व्यक्त की।
12 अप्रेल 2011 को गिर जाने की वजह से बाबा जी कुल्ली टूट गई जिसके कारण उन्होने चारपाई पकड़ ली। अब घेर मे चारपाई उनका एकमात्र विश्राम स्थल थी। यह समय उनके लिए काफी पीड़ादायक रहा। ठीक एक महीने बाद 12 मई 2011 को दोपहर को बाबा जी ने घेर से किसी व्यक्ति को घर पर भेज कर “बिब्बी’( हमारी माँ) को बुलवाया, बुलावा मिलते ही बिब्बी उनके पास घेर मे पहुँच गई । बाबा जी ने बिब्बी को अपने अंतिम वचन कहे “ आज मेरा अंतिम समय है, भाई (मेरे पिताजी, जिनहे बाबा जी प्यार से हमेशा भाई ही कहते थे ) को कभी अकेले खेत मत जाने देना, अब खेती करने की जरूरत नहीं है, जमीन ठेके पर दे देना। डंगर (पशु) मत रखना, दूध मोल ले लिया करना। अब भगवान ने तुम्हारे घर मे मोज कर रखी है, उसका शुक्रिया करो, किसी का कभी भूल से भी बुरा मत करना।“ इतनी बात कहकर बाबा जी ने बिब्बी के हाथों मे अपनी अंतिम साँसे पूरी की। उनकी मृत्यु के बाद लगभग एक वर्ष बाद 31 मार्च 2012 को उनका अंतिम सपना भी पूरा हो गया, जब मेरा उत्तर प्रदेश पी.सी.एस. 2009 मे अंतिम चयन वाणिज्य कर विभाग मे असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर हुआ। बाबा जी आज हमारे परिवार की असीम श्रद्धा के केंद्र है और भावी पीढ़ियों को भी हमेशा उनसे प्रेरणा मिलेगी। बाबा जी उस भवन की नींव के पत्थर बने है जिसका निर्माण आगे वाली पीढ़ियों को जारी रखना है।
@ सुनील सत्यम
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