छायाचित्र
सुजानखेड़ी..में बगिया
गुरुवार, 24 दिसंबर 2015
दिलावरों का पीरज़ादों पर आक्रमण
पीरज़ादों पर दिलावरों का आक्रमण एवं धर्म रक्षा

-------अतीत-मंथन--------------------
भारत में इस्लाम के प्रचार का अघोषित विभाग था सूफी फकीरों का।ये सूफी फ़क़ीर अक्सर छल प्रयोग अथवा लालच देकर हिंदुओं का इस्लाम में धर्मान्तरण कराने का कार्य करते थे।धर्मांतरण इनका प्रमुख उद्देश्य था।चिश्ती सिलसिले ने भारत में छल के द्वारा सर्वाधिक हिंदुओं का धर्मांतरण किया।चिश्ती सूफियों की खानकाहे कव्वाली गायन का बड़ा केंद्र होती थी,भारत में कथित गंगा-जमुनी तहजीब इसी सिलसिले की कल्पना की उपज है।इन्होंने हिंदुओं को खानकाहों में लाकर,छल से उन्हें प्रसाद के नाम पर गौ मांस खिलाकर धर्मान्तरण कराया।इसके अतिरिक्त जजिया से बचाव के लालच में कुछ जमींदारों ने धर्मान्तरण स्वीकार किया तो कुछ ने आर्थिक लालच में इस्लाम अपनाया।शासकों ने तलवार को धर्मान्तरण का जरिया बनाया।लेकिन सूफ़ियों ने छल एवं लालच के द्वारा ही अधिकांश धर्मान्तरण कराया।
यमुना खादर का हथछोया गांव चिश्ती सूफी सिलसिले के प्रसिद्ध सूफी शेख सैयद अब्दुल कद्दुस गंगोही के नाती , पीरज़ादा सैयद अली को मिला एक राजस्व ग्राम था।कद्दुस का केंद्र गंगोह था।आज भी गंगोह में उसकी मजार है।इस मजार पर हजारों की संख्या में मूर्ख हिन्दू चादर चढ़ाने जाते हैं। असल में पीरज़ादे, सूफी सन्तों (पीर) की जायज़/नाज़ायज़ औलाद होते थे।अक्सर ये सूफी अपनी इन संतानों को कोई गाँव तत्कालीन हुक्मरानों से दिलवा दिया करते थे जिसकी समस्त मालगुज़ारी इन पीरज़ादों द्वारा ही वसूली जाती थी।
हथछोया में इन पीरज़ादों दो डेरे थे जिनमे पीरज़ादे ठहरा करते थे।एक डेरा गुल्ही के किनारे, पुरानी मस्जिद के स्थान पर था जहाँ आजकल अबलु एवम् मोम्मद का परिवार रहता है।दूसरा डेरा पुरानी डाब्बर के किनारे पर था जो जुगल किशोर दिलावरे के घेर के बराबर में था जहाँ आजकल मामचंद पंडित का परिवार रहता है।इस डेरे को हथछोया एवं सुजानखेड़ी का राजस्व लेने का सनद प्राप्त था।इसका प्रमुख पीरज़ादा शेख सैयद अली था, जो अब्दुल कद्दुस गंगोही का नाती था।पूरा गाँव शेख सैयद अली को देखते ही झुककर सलाम करता था।गाँव के दीवानी और फौजदारी के मामलों का निस्तारण पीरज़ादा सैय्यद अली की निजामत के द्वारा किया जाता था।मुगलकाल में ये लोग "सद्र उस सुदूर" (धार्मिक मामलों का विभाग) के तहत कार्य करते थे जिनका प्रमुख कार्य शरीयत का अनुपालन करवाना होता था।अक्सर पीरज़ादे मुहतसिब के तौर पर नियुक्त होते थे। ‘शरियत’ के प्रतिकूल कार्य करने वालों को रोकना, आम जनता (विषेषकर मुस्लिम ) को दुश्चरित्रता से बचाना, सार्वजनिक सदाचार की देखभाल करना, शराब, भांग के उपयोग पर रोक लगाना, जुए के खेल को प्रतिबन्धत करना, मंदिरों को तुड़वाना (औरंगज़ेब के समय में),हिंदुओं का धर्मपरिवर्तन करवाना आदि मुहतसिब के महत्त्वपूर्ण कार्य थे। इस पद की स्थापना औरंगज़ेब ने की थी। ये पीरज़ादे गाँव में ही अपना कैम्प किया करते थे जिसे अक्सर डेरा कहा जाता था।पीरज़ादों के कैम्प में अक्सर चिश्ती एवं नक्शबंदी सिलसिले के सूफियों का आना होता रहता था।उन दिनों निकटवर्ती कस्बा गंगोह सूफी संतों का बड़ा केंद्र था।गंगोह में चिश्ती सिलसिले के प्रमुख सूफी संत "शेख शाह अब्दुल कद्दुस गंगोही" की खानकाह थी।अब्दुल कद्दुस गंगोही प्राणायाम एवं अन्य यौगिक क्रियाओं में पारंगत था।वह "अलखगिरी" उपनाम से लिखा भी करते था इसलिए "अलख" नाम से भी जाने जाते थे।इस कारण उन्हें हिंदुओं के गोरखपंथी सन्तों से अलग करना सामान्य जन के लिए भ्रमित करने वाला था।गोरखपंथी भी "अलख निरंजन" का उदघोष करते हैं।सूफी संतों ने हिन्दू धर्म से प्राणायाम,यौगिक क्रियाएं एवं हठयोग जैसी पद्दत्तियाँ ज्यों की त्यों अपना ली थी।अब्दुल कद्दुस,शाह साबिर कलियारी का शिष्य था और चिश्ती सिलसिले का सूफी था।सहारनपुर,मुज़फ्फरनगर और शामली के क्षेत्र में चिश्ती सिलसिले ने हिंदुओं के धर्मांतरण की एक बड़ी मुहिम चलाई।धर्मांतरण के औरंगजेबी और सूफी तरीके में एक बड़ा अंतर था कि सूफियों ने छल एवं शांतिपूर्ण तरीके से गरीबों को आर्थिक मदद का लालच देकर धर्मांतरण की प्रक्रिया को सम्पन्न किया ।सूफी अपने इस प्रयास में काफी सफल भी रहे।सूफी निजामुद्दीन औलिया के अलावा कोई भी सूफी अविवाहित नही था।ये गृहस्थ सन्त थे।समस्त मानवीय अवगुणों से ये भी अछूते नही थे।अतः धर्म प्रचार के सिलसिले में भ्रमण के दौरान इन्होंने विवाहेत्तर संबंध स्थापित किये जिससे पैदा संताने पीरज़ादा कहलाये।बादशाही दरबार मे अपने संबंधों का लाभ उठाकर इन्होंने अपनी उन नाजायज़ संतान "पीरज़ादों" को छोटी छोटी जागीर आवंटित करा दी।जागीरी इलाके में ही रहकर ये पीरज़ादे लगान वसूली के साथ साथ जोर जबरदस्ती स्थानीय लोगों का धर्मान्तरण करते थे।हथछोया में भी इन्हीं पीरज़ादों द्वारा कई हिन्दू गुर्जर परिवारों को छल एवं लालच के द्वारा इस्लाम धर्म मे परिवर्तित किया।लेकिन जमींदार रोढ़ा सिंह के प्रबल प्रतिरोध के कारण पीरज़ादों को हथछोया के एक हिन्दू परिवार के अलावा धर्म परिवर्तन में अधिक सफलता नही मिल पाई।वे गांव के एक गुर्जर परिवारों को छोड़कर अन्य किसी भी बिरादरी के किसी भी परिवार के इस्लाम मे धर्मान्तरण में सफलता प्राप्त नही कर पाए।
जमींदार रोढ़ा सिंह का परिवार अपने अक्खड़पन एवम् दबंगई के लिए दूर दूर तक मशहूर था।उन्होंने कभी भी पीरजादों के सामने सिर नहीं झुकाया ।इतना ही नहीं वे हमेशा पीरज़ादों के हुक्मों की नाफरमानी करते थे।पीरज़ादों ने लालच,दबंगई,जोर जबरदस्ती समस्त नैतिक अनैतिक तरीकों से जमींदार रोढ़ा सिंह को इस्लाम मे धर्मांतरित करने के प्रयास किये।रोढ़ा सिंह की दबंगई एवं अक्खड़पन के कारण पीरज़ादों का विश्वास था कि यदि वे उनका धर्म परिवर्तन करने में सफल हो गए तो क्षेत्र में इस बात का एक बड़ा सन्देश जाएगा और पीरज़ादों को धर्मांतरण की मुहिम चलाने के लिए एक बड़ा नैतिक बल प्राप्त होगा।पीरज़ादों का कोई हथकंडा जमींदार परिवार के धर्मपरिवर्तन के लिए काम नही आया। इस कारण पीरज़ादा सैय्यद अली, जमींदार रोढ़ा सिंह परिवार को नापसंद करने लगा और उसने अपनी सारी शक्ति उनके परिवार के उत्पीड़न एवं सार्वजनिक रुप से अपमानित करने पर लगा दी।सैय्यद अली ने जमींदार के लिए फरमान जारी किया कि वह उनके डेरे पर हाज़िरी दे और उन्हें सलाम करे तथा उनके हुक्म की तामीली करें।लेकिन जमींदार किसी भी कीमत पर झुकने को तैयार नही था।
रोढ़ा सिंह परिवार के पास एक लगभग 50 मीटर लम्बी दहलीज़ (गैलरी) थी।वे शरणागत वत्सल थे अर्थात उनके पास यदि किसी ने शरण लेली तो उसकी रक्षा वे अपनी जान पर खेलकर करते थे।यदि किसी ने किसी व्यक्ति की हत्या करने के बाद भी उनके पास आकर शरण लेली तो किसी की मज़ाल नहीं थी कि उस शरणार्थी का कोई बाल भी बांका कर सके।लम्बी दहलीज़ अक्सर एक सुरक्षित शरणगाह का काम करती थी। इस बात से पीरज़ादा सैय्यद अली न केवल परेशान था बल्कि जमींदार के बागी तेवर से अपनी सुरक्षा को लेकर सजग भी रहता था।
बहुत सोच विचार करने के बाद पीरज़ादों ने तय किया कि गाँव के मुख्यद्वार, जो डेरे के पास ही था, पर एक दीवार का निर्माण कराया जाये जिसमे एक मोरी (छोटा दरवाजा) बनवाई जाए ताकि गाँव के अंदर बाहर जाने के लिए हर किसी को मोरी से गुजरना पड़े और मोरी से गुजरते समय हर किसी को अपना सिर झुकाना पड़े।इस बात की खबर जब जमींदार रोढ़ा सिंह को लगी तो उन्होंने तय किया कि मोरी में से पार निकलने के लिए सिर की बजाय पैर के बल घुसा जाये ताकि उन्हें सिर न झुकाना पड़े।इस प्रकार दिलावरों ने कभी भी पीरज़ादों के सामने समर्पण करना और धर्मपरिवर्तन करना स्वीकार नही किया।
इस घटना से पीरज़ादों और जमींदार के बीच काफी कड़वाहट आ गई।रोढ़ा सिंह भी पीरज़ादों से गांव को हमेशा के लिए मुक्त कराने की योजना पर कार्य कर रहे थे। पीरज़ादों के घर पीसने के लिए गाँव की दलित महिलाएं सुबह सुबह जाया करती थी।रोढ़ा सिंह एवं उनके पुत्र भजन सिंह ने एक योजना बनाई।उन्होंने पिसाई करने वाली एक दलित महिला को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि जब वह सुबह पीरज़ादे के घर गेंहू पीसने जायेगी तो उसे शौर मचाना है कि पीरज़ादा उसके साथ जबरदस्ती कर बलात्कार करने की कोशिश कर रहा है। उस महिला ने अगले दिन सुबह ऐसा ही किया। पहले से तैयार बैठे जमींदार रोढ़ा सिंह परिवार के लोगों ने योजनाबध्द तरीके से अन्य ग्रामीण जनों के साथ उस महिला की मदद के करने के लिए हथियारों सहित पीरज़ादों के डेरे पर आक्रमण कर दिया जिससे उनमे हड़कम्प मच गया। पीरज़ादा शेख सैयद अली ने भागकर जान बचानी चाही लेकिन मौके पर मारा गया बाकी ने भागकर अपनी प्राणरक्षा की।तय योजनानुसार दोनों डेरों पर एक साथ आक्रमण किया गया था। सुबह होने तक दोनों डेरों से पीरज़ादे भाग चुके थे।ग्रामीणों ने डेरों में जमकर लूटपाट की।शेख सैयद अली की लाश कई दिन तक जंगल में पड़ी रही।आते जाते लोग उसकी लाश को ठोकर मारते थे।इसी कारण इस जगह का नाम भी "ठोकरों वाला जंगल" (बाद में टोखरों) पड़ गया। कोई सैयद अली की लाश तक लेने के लिए नही आया।कई दिन बाद, जमींदार रोढ़ा सिंह और उनके साथी,सैय्यद अली की लाश को घसीटकर लाये और नाले के किनारे गड्ढा खोदकर दबा दिया तथा उसके ऊपर ईंट रख दी।कालान्तर में वर्षों बाद कुछ लोगों ने उसे मजार समझकर पूजना ही शुरू कर दिया।सैयद अली की मजार बिगड़कर सैदली कहलाने लगी।पीरजादों पर आक्रमण और शेख सैय्यद अली की हत्या की घटना के बाद पीरज़ादों ने दोबारा से कभी हथछोया में वापस आने का प्रयास नही किया। इस घटना के बाद हथछोया को पीरज़ादों के आतंक से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई और जमींदार रोढ़ा सिंह की ख्याति दूर दूर तक फ़ैल गई।इसी घटना के कारण गांव के लोगों ने जमींदार रोढ़ा सिंह को "दिलावरा-अर्थात दिल वाला" की उपाधि से नवाजा।इसके बाद जमींदार परिवार दिलावरे नाम से जाना जाने लगा।
हथछोया में कुछ गुर्जर परिवारों का धर्म परिवर्तन क्योंकि सूफियों द्वारा करवाया गया था अतः सूफीमत में हिन्दू एवं बौद्ध पद्दतियों जैसे प्रणायाम,बौद्ध,पीरी-मुरीदी, रहस्यवाद, हठयोग, ध्यान,संगीत(समा) आदि का मिश्रण था इसलिए इस्लाम मे परिवर्तित गुर्जर परिवारों में कभी धार्मिक कट्टरपन जगह नही बना पाया।फलस्वरूप हिन्दू गुर्जर और धर्मांतरित मुस्लिम गुर्जर परिवारों में आज भी वही समन्वय एवं प्यार देखने को मिलता है।भारतीय इस्लाम पर सूफी आंदोलन का एक सकारात्मक प्रभाव यह है कि भारतीय मुस्लिम आज भी शांति एवं अमन पसन्द है एवं भाई चारे में विश्वास रखता है।आजकल कुछ नवयुवक जरूर कट्टर इस्लामी पन्थ "अहले-हदीस/सल्फी/वहाबी की चपेट में आकर नफरत की विचारधारा को गले लगा रहे हैं।तमाम नकरात्मताओं के बावजूद हिंदुत्व के अतिरिक्त सूफ़ियत में ही वह ताकत है जो दुनिया को कट्टर इस्लामी वहाबी आतंकवाद के साये से बाहर निकाल सकता है।सूफीमत धार्मिक समन्वय का प्रतिफल है जिसमें हिंदुत्व, इस्लाम और बौद्ध धर्म का वह सारतत्व निहित है जो दुनिया को शांति का संदेश देता है।।
(प्रस्तुत लेख लेखक द्वय का संयुक्त शौध-पत्र है)
शुक्रवार, 10 जुलाई 2015
पढाई नहीं चढ़ाई
कक्षा 6 गाँव के जूनियर हाई स्कूल से पास करने के बाद सन् 1987 में मैंने डीएवी इंटर कालेज ऊन में प्रवेश ले लिया था। दो वर्ष पहले ही मैं बड़ी शल्यक्रिया से गुजरा था। ऊन जाने के लिए साधन बहुत सीमित थे। उन दिनों कैराना-गंगोह बस सेवा हथछोया से होकर गुजरती थी।यद्यपि आज भी यह सेवा जारी है लेकिन इसकी समयबद्धता न तो उस समय ही निश्चित थी और न ही आज। यदा कदा कोई बस यदि समय से आ जाती थी तो गाँव से डीएवी ऊन जाने वाले छात्र उस बस की निशुल्क सेवा का लाभ उठा लेते थे। एकाध बस जब कभी आती थी तो उसमे पैर रखने तक की जगह नहीं होती थी सीट मिलना तो दूर ।
स्कूल जाने के लिए अक्सर हमे पैदल मार्च ही करना पडता था। घर से डीएवी स्कूल की दूरी एक और से लगभग 9 किलोमीटर पड़ती थी।यानि अध्ययन करने के लिए हमें प्रतिदिन 18 किलोमीटर पैदल चलकर जाना होता था। बरसात क दिनों में बहुत ज्यादा समस्या का सामना करना पडता था। ऊन में घुसते ही एक तरफ जोहड़ में जबरदस्त पानी चढ़ता था तो दूसरी और एल लगभग 30 फुट गहरी झिलनुमा खाई थी । यहाँ 4-4 फुट पानी सड़क के ऊपर चढ़ाना एक सामान्य सी बात थी। यह दरिया भी हमें पैदल चलकर ही पार करना पड़ता था। सारे कपडे भीग जाया करते थे।कई बार पैर फिसल जान पर गिर जाते थे तो सारी किताबे भी पानी में भीग जाती थी। कभी कभी भाग्यवश किसी ट्रेक्टर ट्रॉली में लिफ्ट मिल जाती थी तो लगता था कि जैसे कोई उड़न खटोला मिल गया हो।
बुधवार, 8 जुलाई 2015
लाल सिंह परिवार
चौधरी लाल सिंह के 6 पुत्र व् एक पुत्री थे। चौधरी करता राम,चौ. सरधा राम, चौ. अतर सिंह, चौ. नेमचंद, चौ. आशाराम एवं चौ. बलवंत सिंह । चौधरी अतर सिंह, के प्रयासों से गाँव में कुछ विकास कार्य हुए। उनके प्रयासों से ही गाँव को ऊन के विद्युत उपकेन्द्र से जोड़ा गया था बाद में तेजपाल गुर्जर के द्वारा गाँव का सम्पूर्ण विद्युतीकरण तब हुआ जब उन्होंने अपनी निजी भूमि पर गाँव के विद्युत उपकेन्द्र का निर्माण करवाया। गाँव में पक्की सड़कों का निर्माण एवं रुहाड़ा (नाला) खुदाई में चौ. अतर सिंह का बहुमूल्य योगदान रहा है। वह एक दूरदर्शी राजनेता के समस्त गुण रखते थे। ब्लॉक प्रमुख,सरपंच,प्रधान सभी पद उनके रहते किसी अन्य गाँव में नहीं गए। पूर्व राज्यपाल वीरेंद्र वर्मा से उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा। चौ. अतर सिंह की मृत्यु के बाद चौ. आशाराम ग्राम प्रधान तथा मनोनीत जिला पंचायत सदस्य रहे। 1995 में पंचायत राज अधिनियम 1993 के बाद हुए जिला पंचायत के प्रथम चुनाव में वह भारी मतों से विजयी होकर सदस्य चुने गए। चौ. आशाराम जेल विजिटर के पद पर भी मनोनीत हुए। उनके बाद चौ. अतर सिंह के पुत्र सत्यपाल सिंह ग्राम प्रधान चुने गए। वह जिला सहकारी बैंक के डायरेक्टर पद पर भी विराजमान रहे।
लाला गीताराम
लाला गीताराम "रईस" हथछोया की एक महान शख्शियत थे। उनका जन्म सन् 1903 में स्वर्गीय लाला कन्हैयालाल के घर हुआ था। वह एक शिक्षित एवं दूरदर्शी व्यक्ति थे। पंच फैसलों के लिए लाला गीताराम की ख्याति दूर दूर तक थी। गाँव में कोई भी सरकारी व्यक्ति आता था तो उसका ठहराव लाला जी के पास ही होता था। वह ग्राम की ब्रिटिश न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ थे। सन् 1938 से 1940 तक वह अंग्रेज कलेक्टर (जज) की मुख्य कार्यसमिति में असेसर मनोनीत रहे। जिले की मुख्य कार्यसमिति में कुल 5 असेसर होते थे , जो न्याय-निर्णय के समय जज के साथ बैठते थे तथा जिनका कार्य किसी केस में अपना निर्णय सुनाने से पहले विदेशी (अंग्रेज) जज को स्थानीय रीति रिवाजो,परम्पराओं एवं स्थानीय विधि के बारे में अवगत करना होता था ताकि जज तदनुकूल अपना निर्णय सुना सके। यद्यपि असेसर की राय मानना जज के लिए बाध्यकारी नही होता था । लाला गीताराम एक कुशल आयुर्वेद चिकित्सक भी थे। वह क्षेत्र के लोगों को निशुल्क अपनी चिकित्सा सेवाएं देते थे।
यदि उनको अपने समय का हथछोया का दानवीर कर्ण कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने गाँव को बड़े पैमाने पर भूदान दिया। गाँव के प्रसिद्द शिवाले (शिव मंदिर) का निर्माण लाला गीताराम द्वारा दान की गई भूमि पर ही हुआ है।इसके अतिरिक्त उन्होंने शिवाले को प्रचुर मात्रा में धन भी दान में दिया। गाँव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र एवं केंद्रीय चौपाल को भी उन्होंने भूमिदान की थी।
निर्धनों की सेवा एवं निर्धन कन्याओं की शादी से उन्हें विशेष सुकून मिलता था। वह अहिंसा के पुजारी एवं गौ-सेवक तथा रक्षक थे। चौधरी कमालुद्दीन के साथ मिलकर उन्होंने गाँव में गौ हत्या एवं पशु कटान पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगवाया जिसके प्रति आज भी हथछोया के हिन्दू-मुस्लिम पूर्णतः कटिबद्ध हैं।
सन् 1980 में लाला गीताराम अपनी यादें एवं सिद्धांत धरोहर के रूप में छोड़कर अपना शरीर पूर्ण कर प्रभु चरणों में चले गए ।
मंगलवार, 7 जुलाई 2015
चौधरी कमालुद्दीन
चौधरी कमालुदीन "लम्बरदार"
------------@ सरवेज चौधरी
"जब जब हथछोया का ग्राम इतिहास पढ़ा जायेगा, चौधरी कमालुदीन का नाम जरूर जरूर लिया जायेगा"
कल्लु वंश मे जन्मे कमालुदीन बेहद दयालु स्वाभाव के व्यक्ति थे| इनके पिता का नाम ज़नाब साबर चौधरी एवं माता का नाम मोहतरमा सरिया था । इनके पिता ज़नाब साबर चौधरी एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते थे । चौ.कमालुदीन ने अपने पिता से ईमानदारी और अनुशाशन का गुण विरासत में प्राप्त किया था तो अपनी माता से ईश्वर में आस्था तथा करुणा का उपहार |
इनकी शादी बचपन में ही कर दी गयी थी । चौ. कमालुदीन में गज़ब की नेतृत्व क्षमता थी ।अपनी नेतृत्व क्षमता के चलते ही उन्हें ग्राम समाज में दी जाने वाली "लंबरदार"जैसी उपाधि से नवाज़ा गया| ग्राम में कोई भी पंचायत हो या सभा, उनकी अध्यक्षता में ही होती थी |
चौधरी कमालुदीन की ईमानदारी के किस्से आज भी हथछोया एवं आस-पास के गाँवो में मशहूर है। बताया जाता है की एक बार कच्ची गढ़ी के लाला महावीर के लड़के की शादी के समय, बारात में जाते वक़्त "बरी का सामान" जिसमे सोने की मोहरे एवं अन्य कीमती समान था, रास्ते में कहीं गिर गया । चौधरी कामालुद्दीन पीछे से अपनी घोड़ी पर सवार होकर विवाह में शामिल होने जा रहे थे । उनकी नज़र रास्ते में पड़े "बरी" के समान पर पड़ी । उन्होंने घोड़ी से उतरकर वह सामन उठाया और अपनी घोड़ी के ऊपर रखकर विवाह स्थल की तरफ चलपड़े । उधर जब बरी की रश्म निभाने की तैयारी हुई तो बरी का समान न देखकर वर पक्ष व्याकुल हो उठा । लाला महावीर ने कमालुदीन से सोने की मोहरे और बरी के लिए जरुरी अन्य समान का प्रबन्ध करने का अनुरोध किया|तब कमालुदीन ने अपनी घोड़ी से उतारकर वह कीमती समान उसके सही मालिक लाला महावीर को सौप दिया । उसी दिन से उनकी ईमान्दारी की चर्चा पूरे क्षेत्र में फ़ैल गई और लोग उनकी ईमानदारी के कायल हो गए ।उसके बाद पूरे कल्लू वंश में बरी प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया, जिसे आज भी पूरा कल्लुवंश निभा रहा है।
वह हिन्दू-मुस्लिम एकता के दूत थे। उन्होंने हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि गाँव के हिन्दू भाइयों की धार्मिक भावनाएं किसी भी कीमत पर आहत न होने पाये। इसी बात को ध्यान में रखकर उन्होंने ग्राम में पशु कटान पर प्रतिबन्ध लगाया था जिस परम्परा को आज भी पूरा गाँव निभा रहा है।
ग्राम का भूमि कर (मालगुजारी)भी चौधरी कामालुद्दीन के पास इकट्ठा होता था जो तहसील में उनके द्वारा ही जमा किया जाता था।
एक बार गाँव के कुछ लोगों ने चौधरी कमालुदीन की लोकप्रियता से डर कर उनकी हत्या का षडयंत्र रचा। वर्तमान में जहाँ हाज़ी अशरफ अली का खेत है वहां उस समय नागर बनिये की आम की बगीची थी । उस बगीची में षडयंत्रकारी चौ.कमालुदीन की हत्या के इरादे से घात लगाये बैठे थे । चौधरी फूल सिंह दिलावरे, जो उनके करीबी मित्र थे, को इस षडयंत्र की भनक लग गई । उन्होंने अपनी जान पर खेलकर उस षडयंत्र की सूचना चौधरी कमालुदीन को दी और उनकी जान बचाई। चौधरी फूल सिंह दिलावरे से उनके पारिवारिक सम्बंध थे और वो उनके घनिष्टम मित्रो में से एक थे । इस घटना के बाद उनके समबन्ध और भी अधिक मजबूत हो गए। आज भी दोनों परिवारों के घनिष्ट समबन्ध किसी भी प्रकार से कमजोर नहीं हुए है। चौधरी कुंदन सिंह और "रईस" लाल गीता राम, जो उस समय तहसील में मुख़्य न्याय अधिकारियो में से एक थे ,भी उनके घनिष्टम मित्रो में से एक थे । उस समय ग्राम हथछोया की न्यायिक प्रक्रिया इन तीनो के ऊपर ही निर्भर थी। वीरेंद्र वर्मा जो शामली से सांसद और पंजाब के पूर्व राज्यपाल भी रहे, के साथ भी उनके अच्छे सम्बन्ध थे । उनके ग्राम के हर वर्ग के साथ अच्छे सम्बन्ध थे ।ऊंच-नीच, जातिपक्ष कोई बेदभाव उनके मन में नही रहता था । कट्टरता के वह धुर विरोधी थे।
जब पहली बार चौधरी चरण सिंह ग्राम हथछोया में आये तो उस समय ग्राम की बागडोर चौधरी कमालुद्दीन के हाथो में थी। चौधरी चरण सिंह उस समय अपनी राजनितिक पारी की शुरुवात ही कर रहे थे । उन्होंने ग्राम के प्राइमरी स्कूल (शिवाला) में आयोजित कार्क्रम में चौधरी कामालुद्दीन से चुनाव में सहयोग की अपील की थी। चौधरी कमालुदीन बहुत परिश्रमी थे। वह अपने खेतो में भी बहुत मेहनत किया करते थे।कुछ समय पश्चात बीमारी के चलते इनकी मौत हो गयी।अपने पीछे ये पांच पुत्र छोड़ गए|
1-मरहूम दिन्ना चौधरी
2- हाजी नूरा चौधरी
3-मरहूम हाजी फिमु चौधरी
4-मरहूम हाजी असगर चौधरी
5-चौधरी हाजी अनवर अली
(इस लेख के तथ्य स्वर्गीय फूल सिंह दिलावरे और रोशनलाल हरिजन तथा चौधरी कामालुद्दीन के सबसे छोटे पुत्र हाजी अनवर अली एव हाजी नूरा से की गई वार्ता पर आधारित हैं)
शुक्रवार, 26 जून 2015
मेरे ग्राम देवता..
मेरे ग्राम देवता
(हथछोया; कुछ इतिहास, कुछ यादे- के अंश)
@ सुनील सत्यम
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संघ से संपर्क के बाद मेरे बालमन से ऊंच-नीच का भाव बिलकुल ही नष्ट हो गया था। कक्षा 4 तक गाँव के हर वर्ग के लड़के मेरे अच्छे दोस्त बन गए थे। धर्मेंद्र सिंह (यशपाल सिंह)महीपाल सिंह, रणपाल सिंह, जगवीर सिंह, नेत्रपाल सिंह, कुलवीर सिंह, धर्मेन्द्र सिंह (अजमेर सिंह), कंवरपाल कश्यप (मामचंद), बिजेन्द्र बाल्मीकी( अतर सिंह), सुभाष कश्यप, योगेन्द्र कश्यप, तेजपाल सैनी (तेज्जु), सौराज सिंह (इंदराज खेवड़िया), जगपाल गड़रिया (कल्लण), राजवीर सिंह गड़रिया, फरीद अहमद, शकील (छोटा, पुत्र ताऊ फिमू), फुरकान (मंजूर अहमद), आदि से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। साथ खेलना-कूदना, खाना-पीना होता था। जाति भाव ने कभी कोई असर इसकाल के बाद नहीं दिखाया। संघ के कार्यक्रमों मे सहभोज मुझे सबसे प्रिय था। हम गाँव मे अक्सर सहभोज का आयोजन करते थे। सभी के घर से भोजन बनकर आता था, जिसे एक जगह मिलाकर पंगत लगाकर सभी को परोसा जाता था। भोजनमंत्र के बाद सभी एक साथ भोजन करते थे। यह वैसे तो एक छोटा कार्यक्रम होता था। लेकिन दिलों-दिमाग पर से इसका प्रभाव आज तक नहीं गया। समरसता और समानता का जो भाव सहभोज के समय मन मे उत्पन्न होता था,वह आज तक यथावत है। बड़ी कक्षाओं मे जाने के बाद गाँव मे मेरे मित्रों की सूची और भी ज्यादा लंबी हो गई थी। अब इस सूची मे अनिल खेवड़िया, नरेश खेवड़िया, मुनेश खेवड़िया जैसे अजीज मित्र भी जुड़ गए थे, इन सभी के साथ एक साथ खाना पीना मेरे लिए आम बात थी। कुछ लोग इस बारे मे दबे कानो बात भी करते थे। कुछ ने तो बाकायदा मुझे इसके लिए मना भी किया था जिनके नाम यहाँ उल्लेख करना ठीक नहीं होगा।अनिल खेवड़िया तो थानाभावन मे कुछ दिन मेरे साथ रूम पार्टनर भी रहे।
यहाँ बचपन की दो रोचक रोचक बातें उल्लखित करना चाहूँगा जो आज भी मेरे जेहन मे हैं। कंटू चूहड़ा (बाल्मीकी) हमारा पारिवारिक सफ़ाई कर्मचारी था। कंटू मुझसे बेहद प्यार करता था। एक बार उसने किसी फेरि वाले से बुरादा बर्फ खाने के लिए खरीदा।मै पास मे ही खड़ा था। कंटू बर्फ खाने ही वाला था कि उसकी मुझ पर निगाह पड़ी। उसने मुझसे पूछा “ बर्फ खाओगे, लंबरदार ?” मैंने हाँ कहने मे तनिक भी देर नहीं की। मेरे हाँ कहते ही कंटू ने बर्फ मेरे हाथ मे थमा दिया और मै बड़े मजे से बर्फ खाने लगा। जब थोड़ा सा बर्फ बचा तो कंटू ने देखा कि मै तो सारा ही बर्फ खा जाऊंगा। उसने याचनात्म्क लहजे मे कहा “ थोड़ा सा बर्फ मेरे लिए भी छोड़ दियो लंबरदार !” मैंने बचा हुआ बर्फ कंटू के हाथ मे दे दिया । कंटू ने वह बचा हुआ बर्फ खाया और मुझे आशीर्वाद देकर चला गया। उस समय मेरी उम्र लगभग 8-10 वर्ष रही होगी।
कंटू की लड़की बती जो मुझसे उम्र मे लगभग 10-12 वर्ष बड़ी रही होगी, भी मुझसे बहुत लगाव रखती थी। वह अपने परिवार के लिए गाँव से रोटियाँ मांग कर लाती थी। उन दिनों गाँव मे कोई भी बाल्मीकी परिवार अपने घर पर खाना नहीं बनाता था। अपने यजमानों के घर से मांग कर ही वे अपने दोनों वक्त के भोजन का प्रबंध करते थे। बती अपने भोजन संग्रह के क्रम मे जब भी हमारे घर आती थी, मुझसे जरूर पूछती थी कि “ खाना खाओगे ?” जब भी उसके पास कोई अच्छी चीज होती तो मै कभी मना नहीं करता था। शादी विवाह के समय वह किसी के घर से रसगुल्ले आदि मिठाई लेकर आती, तो मुझसे जरूर पूछती। मै बड़े चाव से खाता था, बती मुझे कुछ भी खिलाने के बाद बड़ा अच्छा महसूस करती थी। मेरे घर वालों ने मुझे कभी यह नहीं सिखाया कि बती से लेकर खाना नहीं खाना है। बचपन के संस्कार आज और भी ज्यादा सुदृढ़ हो चुके है। जातीय भाव मुझे गौरवान्वित नहीं करता है, मेरा गाँव, मेरा सर्वसमाज मुझे सबसे प्यारा है। हर ग्रामवासी मेरा “ देवता” है और गाँव का हर घर “मेरा मंदिर” ।
बुधवार, 24 जून 2015
हथछोया-राजनीती
हथछोया वर्तमान शामली जनपद की ऊन तहसील का गाँव है,हाल ही तक यह कैराना तहसील मे शामिल था। 2015 में ऊन का तहसील के रूप में गठन होने के बाद अब यह गाँव इस तहसील के अंतर्गत आता है।ऊन तहसील निर्माण के लिए हथछोया के प्रसिद्द समाजसेवी तेजपाल गुर्जर ने व्यापक आंदोलन किया जिसके फलस्वरूप अंततः 2015 में ऊन को प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार ने तहसील का दर्जा दे दिया।
गाँव का राजनीतिक इतिहास कुछ इस प्रकार है।
पंडित कालूराम शर्मा- ग्राम सदर (ब्रिटिश काल)
चौधरी सरधा राम: प्रधान
चौधरी अतर सिंह: प्रधान
चौधरी गेंदा सिंह: प्रधान
चौधरी आशाराम: प्रधान 1985-1990
चौधरी सतपाल सिंह प्रधान 1990-1995
चौ. सतबीर लम्बरदार प्रधान 1995-2000
चौधरी रणपाल सिंह प्रधान 2000-2005
श्रीमती राजेश तोमर प्रधान 2005-2010
श्री चमन सिंह बाल्मिकी प्रधान 2010-2015
श्रीमती राणो प्रधान
2015-
सोमवार, 22 जून 2015
तिज्जो, गुड्डे-गुड़िया का ब्याह और दोग्घड
तिज्जो, गुड्डे-गुड़िया का ब्याह और दोग्घड
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हरियाली तीज जिसे गंवई भाषा मे “तिज्जो” कहा जाता है, गाँव मे लड़कियों द्वारा बड़े जोश और उत्साह के साथ मनाई जाती थी। तिज्जो वाले दिन सुबह से ही लड़कियों के समूह नए-नए कपड़े पहनकर गाँव की गलियों मे इधर से उधर घूमते हुए दिखाई पड्ने लगते थे। शिवाले मे स्कूल मे सुबह से ही लड़कियां तिज्जो खेलने के लिए इकट्ठा होने लगती थी। उस समय गाँव का वातावरण भी बहुत शुद्ध था। गाँव की हर लड़की की सुरक्षा और सम्मान की गारंटी सुनिश्चित करना हर व्यक्ति की तयशुदा नैतिक जिम्मेदारी थी। शिवाले वाले प्राथमिक स्कूल मे इकट्ठा होकर लड़कियां दो गुटो मे बंटकर तिज्जो खेलती थी। लगभग 15-15 लड़कियों के गुट तिज्जो खेलते थे। आमने सामने एक निष्चित दूरी पर लड़कियां एक दूसरे के हाथ मे अपना हाथ फँसाकर एक सघन मानव श्रंखला बनाकर दोनों हाथों से हथेलियाँ बजाते हुए और तिज्जो के गीत गाते हुए एक दूसरे की और आती थी। बिलकुल सामने तक आने के बाद यह पूरी पंक्ति उल्टे पैरों से पीछे उसी स्थान तक जाती थी जहां से उन्होने चलना शुरू किया था। तेज आवाज मे लड़कियों के “तिज्जो-गान” से पूरा माहौल गुंजायमान रहता था, वातावरण मे गूँजते खुशियों के गीत मानो पूरे गाँव की प्रसन्नता का उदघोष करते थे। सावन महीना शुरू होते हुए गाँव मे खुशियों और उल्लास की डालियाँ लहराने लगती थी। हर आँगन, हर पेड़ और हर बरामदे, दहलीज मे झूले पड़ जाते थे। हर तरफ छोटे बच्चे और लड़कियां झूला झूलते हुए दिखाई पड़ती थी।दोपहर तक लड़कियां अपना घर का सारा काम-काज निपटा कर बारी-बारी से पूरे सावन अपनी सहेलियों के घर झूला झूलने जाती थी। पहले दिन यह तय हो जाता था कि कल अमुक सहेली के घर पर झूला झूलेंगे। लड़कियां झूले मे इस प्रकार बैठती थी कि एक के पैर दूसरी के झूले से सटे होते थे। अक्सर शरीर से मजबूत लड़कियां हम जैसे छोटे बच्चों को अपने पैरों से बने “दुसंग” पर बैठाकर अपने साथ झूला देती थी। हमे भी झूले का आनंद और बहनो का प्यार एक साथ मिल जाता था।दो लड़कियां आमने सामने की और से झूले को हिलाकर दूसरी और सहारा देती थी। अन्य लड़कियां झूले के चारों और घेरा बनाकर सावन के गीत गाती थी। “ हरियाला बनना झुक आया बाग मै जी, इंदर राजा झुक आए बाग मै जी” तिज्जो के मधुर गीत खुशियों की मिश्री कानों मे घोलते थे। आधा सावन बीतने पर तिज्जो का त्योंहार आता था। हम स्कूल की दीवारों पर बैठकर “तिज्जो-उत्सव” का आनंद लेते थे।
दोग्घड
सावन मे छोटे से लेकर बड़े तक सभी गाँव-वासी आसमान की और देखते रहते थे। कभी कभी “बार (शनिवार) की झड़ी लग जाती थी तो लगातार दसों दिन बारिश होती रहती थी लेकिन कभी लोग बारिश को तरस जाते थे। बारिश के लिए भगवान को खुश करने के लिए लोग तरह-तरह के जतन करते थे। पूरे गाँव मे जग (यज्ञ किया जाता था, लोगों को भोजन कराया जाता था।) दी जाती थी ताकि भगवान प्रसन्न होकर बारिश कर दे।कभी कभी जग के बाद बारिश हो जाती थी तो लोग मानते थे कि भगवान प्रसन्न हो गए है। बारिश न होने की स्थिति मे लोग गाँव मे घूमकर यह देखते थे कि किसी ने अपने घर की छत पर बिटौड़ा तो नहीं बना रखा है। गाँव मे आज भी छत पर बिटौड़ा रखने को गलत माना जाता है। यदि ऐसा पाया जाता था तो लोग छत पर बिटौड़ा रखने वाले परिवार को नसीहत करके बिटौड़ा उतरवा देते थे। गाँव की लड़कियां बारिश के लिए भगवान को प्रसन्न करने के लिए अनोखे उपाय करती थी। अक्सर गाँव मे लड़कियां कपड़े के गुड्डे-गुड़िया बनाकर खेलती थी। कोई लड़की गुड्डा बनती थी, तो कोई गुड़िया तो कोई दोनों। लड़कियां आपस मे गुड्डे-गुड़ियाँ की शादी भी करती थी। एक लड़की का गुड्डा तो दूसरी की गुड़िया आपस मे शादी करती थी। किसी एक लड़की को लड़के का वेश बनाकर दूल्हा बनाया जाता था, गुड्डे की बारात निकलती थी। बारात मे सारी लड़कियां जाती। बाकायदा, छोटी-छोटी कूल्हो मे दाल-चावल के रूप मे खाना पकाया जाता था। प्रसाद के रूप मे थोड़ा थोड़ा सबको मिलता था। अक्सर हमारे भी हाथ दो-चार चावल के दाने लग जाते थे। उसका स्वाद गज़ब होता था। इस पर भी बारिस न होती तो लड़कियां दो-चार दिन बाद गुड्डे-गुड़ियाँ को मरा हुआ मानकर, गाँव की "भेंटों" पर जाकर उनका अंतिम संस्कार करती, ज़ोर ज़ोर से दहाड़ मार-मार कर रोती। सुत्तक निकालने के लिए सारी लड़कियां मंदिर जाकर सिर धोती थी। शिवाले स्थित शिवलिंग को कुएं से पानी निकाल-निकाल कर चोटी तक डुबोती थी। इस काम मे उन्हे घंटों लग जाते थे, क्योंकि इसका नियम यह था का मंदिर के गर्भग्रह के जल निकास मार्ग को भी बंद नहीं करना होता था। मंदिर मे जल भरने के बाद का काम बड़ा ही रोचक होता था। इसके बाद लड़कियां एक हांडी मे कीचड़ भर लेती थी जिसे वह दोग्घड कहती थी। लड़कियां इस दोग्घड को किसी ऐसी महिला के घर मे दीवार से फेंक कर फोड़ती (तोड़ती) थी जो ऐसा होने के बाद खूब झगड़ा करती हो। हमारे पड़ोस मे खजानी नामक महिला अक्सर लड़कियों के लिए सटीक निशाना होती थी। दोग्घड फूटने के बाद खजानी सब लड़कियों को खूब कोसती थी, खूब झगड़ा करती थी। ऐसा करने से कभी कभी हफ्ते भर के अंदर बारिश हो जाती थी तो लड़कियां मान लेती थी कि उनकी मेहनत कामयाब हो गई है।
आज न लड़कियों मे तिज्जो के प्रति वह उत्साह है और न ही गाँव मे उस तरह का वातावरण। तिज्जो का रोमांच हमारे समय के साथ ही समाप्त हो गया लगता है।