तिज्जो, गुड्डे-गुड़िया का ब्याह और दोग्घड
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हरियाली तीज जिसे गंवई भाषा मे “तिज्जो” कहा जाता है, गाँव मे लड़कियों द्वारा बड़े जोश और उत्साह के साथ मनाई जाती थी। तिज्जो वाले दिन सुबह से ही लड़कियों के समूह नए-नए कपड़े पहनकर गाँव की गलियों मे इधर से उधर घूमते हुए दिखाई पड्ने लगते थे। शिवाले मे स्कूल मे सुबह से ही लड़कियां तिज्जो खेलने के लिए इकट्ठा होने लगती थी। उस समय गाँव का वातावरण भी बहुत शुद्ध था। गाँव की हर लड़की की सुरक्षा और सम्मान की गारंटी सुनिश्चित करना हर व्यक्ति की तयशुदा नैतिक जिम्मेदारी थी। शिवाले वाले प्राथमिक स्कूल मे इकट्ठा होकर लड़कियां दो गुटो मे बंटकर तिज्जो खेलती थी। लगभग 15-15 लड़कियों के गुट तिज्जो खेलते थे। आमने सामने एक निष्चित दूरी पर लड़कियां एक दूसरे के हाथ मे अपना हाथ फँसाकर एक सघन मानव श्रंखला बनाकर दोनों हाथों से हथेलियाँ बजाते हुए और तिज्जो के गीत गाते हुए एक दूसरे की और आती थी। बिलकुल सामने तक आने के बाद यह पूरी पंक्ति उल्टे पैरों से पीछे उसी स्थान तक जाती थी जहां से उन्होने चलना शुरू किया था। तेज आवाज मे लड़कियों के “तिज्जो-गान” से पूरा माहौल गुंजायमान रहता था, वातावरण मे गूँजते खुशियों के गीत मानो पूरे गाँव की प्रसन्नता का उदघोष करते थे। सावन महीना शुरू होते हुए गाँव मे खुशियों और उल्लास की डालियाँ लहराने लगती थी। हर आँगन, हर पेड़ और हर बरामदे, दहलीज मे झूले पड़ जाते थे। हर तरफ छोटे बच्चे और लड़कियां झूला झूलते हुए दिखाई पड़ती थी।दोपहर तक लड़कियां अपना घर का सारा काम-काज निपटा कर बारी-बारी से पूरे सावन अपनी सहेलियों के घर झूला झूलने जाती थी। पहले दिन यह तय हो जाता था कि कल अमुक सहेली के घर पर झूला झूलेंगे। लड़कियां झूले मे इस प्रकार बैठती थी कि एक के पैर दूसरी के झूले से सटे होते थे। अक्सर शरीर से मजबूत लड़कियां हम जैसे छोटे बच्चों को अपने पैरों से बने “दुसंग” पर बैठाकर अपने साथ झूला देती थी। हमे भी झूले का आनंद और बहनो का प्यार एक साथ मिल जाता था।दो लड़कियां आमने सामने की और से झूले को हिलाकर दूसरी और सहारा देती थी। अन्य लड़कियां झूले के चारों और घेरा बनाकर सावन के गीत गाती थी। “ हरियाला बनना झुक आया बाग मै जी, इंदर राजा झुक आए बाग मै जी” तिज्जो के मधुर गीत खुशियों की मिश्री कानों मे घोलते थे। आधा सावन बीतने पर तिज्जो का त्योंहार आता था। हम स्कूल की दीवारों पर बैठकर “तिज्जो-उत्सव” का आनंद लेते थे।
दोग्घड
सावन मे छोटे से लेकर बड़े तक सभी गाँव-वासी आसमान की और देखते रहते थे। कभी कभी “बार (शनिवार) की झड़ी लग जाती थी तो लगातार दसों दिन बारिश होती रहती थी लेकिन कभी लोग बारिश को तरस जाते थे। बारिश के लिए भगवान को खुश करने के लिए लोग तरह-तरह के जतन करते थे। पूरे गाँव मे जग (यज्ञ किया जाता था, लोगों को भोजन कराया जाता था।) दी जाती थी ताकि भगवान प्रसन्न होकर बारिश कर दे।कभी कभी जग के बाद बारिश हो जाती थी तो लोग मानते थे कि भगवान प्रसन्न हो गए है। बारिश न होने की स्थिति मे लोग गाँव मे घूमकर यह देखते थे कि किसी ने अपने घर की छत पर बिटौड़ा तो नहीं बना रखा है। गाँव मे आज भी छत पर बिटौड़ा रखने को गलत माना जाता है। यदि ऐसा पाया जाता था तो लोग छत पर बिटौड़ा रखने वाले परिवार को नसीहत करके बिटौड़ा उतरवा देते थे। गाँव की लड़कियां बारिश के लिए भगवान को प्रसन्न करने के लिए अनोखे उपाय करती थी। अक्सर गाँव मे लड़कियां कपड़े के गुड्डे-गुड़िया बनाकर खेलती थी। कोई लड़की गुड्डा बनती थी, तो कोई गुड़िया तो कोई दोनों। लड़कियां आपस मे गुड्डे-गुड़ियाँ की शादी भी करती थी। एक लड़की का गुड्डा तो दूसरी की गुड़िया आपस मे शादी करती थी। किसी एक लड़की को लड़के का वेश बनाकर दूल्हा बनाया जाता था, गुड्डे की बारात निकलती थी। बारात मे सारी लड़कियां जाती। बाकायदा, छोटी-छोटी कूल्हो मे दाल-चावल के रूप मे खाना पकाया जाता था। प्रसाद के रूप मे थोड़ा थोड़ा सबको मिलता था। अक्सर हमारे भी हाथ दो-चार चावल के दाने लग जाते थे। उसका स्वाद गज़ब होता था। इस पर भी बारिस न होती तो लड़कियां दो-चार दिन बाद गुड्डे-गुड़ियाँ को मरा हुआ मानकर, गाँव की "भेंटों" पर जाकर उनका अंतिम संस्कार करती, ज़ोर ज़ोर से दहाड़ मार-मार कर रोती। सुत्तक निकालने के लिए सारी लड़कियां मंदिर जाकर सिर धोती थी। शिवाले स्थित शिवलिंग को कुएं से पानी निकाल-निकाल कर चोटी तक डुबोती थी। इस काम मे उन्हे घंटों लग जाते थे, क्योंकि इसका नियम यह था का मंदिर के गर्भग्रह के जल निकास मार्ग को भी बंद नहीं करना होता था। मंदिर मे जल भरने के बाद का काम बड़ा ही रोचक होता था। इसके बाद लड़कियां एक हांडी मे कीचड़ भर लेती थी जिसे वह दोग्घड कहती थी। लड़कियां इस दोग्घड को किसी ऐसी महिला के घर मे दीवार से फेंक कर फोड़ती (तोड़ती) थी जो ऐसा होने के बाद खूब झगड़ा करती हो। हमारे पड़ोस मे खजानी नामक महिला अक्सर लड़कियों के लिए सटीक निशाना होती थी। दोग्घड फूटने के बाद खजानी सब लड़कियों को खूब कोसती थी, खूब झगड़ा करती थी। ऐसा करने से कभी कभी हफ्ते भर के अंदर बारिश हो जाती थी तो लड़कियां मान लेती थी कि उनकी मेहनत कामयाब हो गई है।
आज न लड़कियों मे तिज्जो के प्रति वह उत्साह है और न ही गाँव मे उस तरह का वातावरण। तिज्जो का रोमांच हमारे समय के साथ ही समाप्त हो गया लगता है।
सुजानखेड़ी..में बगिया
सोमवार, 22 जून 2015
तिज्जो, गुड्डे-गुड़िया का ब्याह और दोग्घड
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