मेरे ग्राम देवता
(हथछोया; कुछ इतिहास, कुछ यादे- के अंश)
@ सुनील सत्यम
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संघ से संपर्क के बाद मेरे बालमन से ऊंच-नीच का भाव बिलकुल ही नष्ट हो गया था। कक्षा 4 तक गाँव के हर वर्ग के लड़के मेरे अच्छे दोस्त बन गए थे। धर्मेंद्र सिंह (यशपाल सिंह)महीपाल सिंह, रणपाल सिंह, जगवीर सिंह, नेत्रपाल सिंह, कुलवीर सिंह, धर्मेन्द्र सिंह (अजमेर सिंह), कंवरपाल कश्यप (मामचंद), बिजेन्द्र बाल्मीकी( अतर सिंह), सुभाष कश्यप, योगेन्द्र कश्यप, तेजपाल सैनी (तेज्जु), सौराज सिंह (इंदराज खेवड़िया), जगपाल गड़रिया (कल्लण), राजवीर सिंह गड़रिया, फरीद अहमद, शकील (छोटा, पुत्र ताऊ फिमू), फुरकान (मंजूर अहमद), आदि से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। साथ खेलना-कूदना, खाना-पीना होता था। जाति भाव ने कभी कोई असर इसकाल के बाद नहीं दिखाया। संघ के कार्यक्रमों मे सहभोज मुझे सबसे प्रिय था। हम गाँव मे अक्सर सहभोज का आयोजन करते थे। सभी के घर से भोजन बनकर आता था, जिसे एक जगह मिलाकर पंगत लगाकर सभी को परोसा जाता था। भोजनमंत्र के बाद सभी एक साथ भोजन करते थे। यह वैसे तो एक छोटा कार्यक्रम होता था। लेकिन दिलों-दिमाग पर से इसका प्रभाव आज तक नहीं गया। समरसता और समानता का जो भाव सहभोज के समय मन मे उत्पन्न होता था,वह आज तक यथावत है। बड़ी कक्षाओं मे जाने के बाद गाँव मे मेरे मित्रों की सूची और भी ज्यादा लंबी हो गई थी। अब इस सूची मे अनिल खेवड़िया, नरेश खेवड़िया, मुनेश खेवड़िया जैसे अजीज मित्र भी जुड़ गए थे, इन सभी के साथ एक साथ खाना पीना मेरे लिए आम बात थी। कुछ लोग इस बारे मे दबे कानो बात भी करते थे। कुछ ने तो बाकायदा मुझे इसके लिए मना भी किया था जिनके नाम यहाँ उल्लेख करना ठीक नहीं होगा।अनिल खेवड़िया तो थानाभावन मे कुछ दिन मेरे साथ रूम पार्टनर भी रहे।
यहाँ बचपन की दो रोचक रोचक बातें उल्लखित करना चाहूँगा जो आज भी मेरे जेहन मे हैं। कंटू चूहड़ा (बाल्मीकी) हमारा पारिवारिक सफ़ाई कर्मचारी था। कंटू मुझसे बेहद प्यार करता था। एक बार उसने किसी फेरि वाले से बुरादा बर्फ खाने के लिए खरीदा।मै पास मे ही खड़ा था। कंटू बर्फ खाने ही वाला था कि उसकी मुझ पर निगाह पड़ी। उसने मुझसे पूछा “ बर्फ खाओगे, लंबरदार ?” मैंने हाँ कहने मे तनिक भी देर नहीं की। मेरे हाँ कहते ही कंटू ने बर्फ मेरे हाथ मे थमा दिया और मै बड़े मजे से बर्फ खाने लगा। जब थोड़ा सा बर्फ बचा तो कंटू ने देखा कि मै तो सारा ही बर्फ खा जाऊंगा। उसने याचनात्म्क लहजे मे कहा “ थोड़ा सा बर्फ मेरे लिए भी छोड़ दियो लंबरदार !” मैंने बचा हुआ बर्फ कंटू के हाथ मे दे दिया । कंटू ने वह बचा हुआ बर्फ खाया और मुझे आशीर्वाद देकर चला गया। उस समय मेरी उम्र लगभग 8-10 वर्ष रही होगी।
कंटू की लड़की बती जो मुझसे उम्र मे लगभग 10-12 वर्ष बड़ी रही होगी, भी मुझसे बहुत लगाव रखती थी। वह अपने परिवार के लिए गाँव से रोटियाँ मांग कर लाती थी। उन दिनों गाँव मे कोई भी बाल्मीकी परिवार अपने घर पर खाना नहीं बनाता था। अपने यजमानों के घर से मांग कर ही वे अपने दोनों वक्त के भोजन का प्रबंध करते थे। बती अपने भोजन संग्रह के क्रम मे जब भी हमारे घर आती थी, मुझसे जरूर पूछती थी कि “ खाना खाओगे ?” जब भी उसके पास कोई अच्छी चीज होती तो मै कभी मना नहीं करता था। शादी विवाह के समय वह किसी के घर से रसगुल्ले आदि मिठाई लेकर आती, तो मुझसे जरूर पूछती। मै बड़े चाव से खाता था, बती मुझे कुछ भी खिलाने के बाद बड़ा अच्छा महसूस करती थी। मेरे घर वालों ने मुझे कभी यह नहीं सिखाया कि बती से लेकर खाना नहीं खाना है। बचपन के संस्कार आज और भी ज्यादा सुदृढ़ हो चुके है। जातीय भाव मुझे गौरवान्वित नहीं करता है, मेरा गाँव, मेरा सर्वसमाज मुझे सबसे प्यारा है। हर ग्रामवासी मेरा “ देवता” है और गाँव का हर घर “मेरा मंदिर” ।
सुजानखेड़ी..में बगिया
शुक्रवार, 26 जून 2015
मेरे ग्राम देवता..
बुधवार, 24 जून 2015
हथछोया-राजनीती
हथछोया वर्तमान शामली जनपद की ऊन तहसील का गाँव है,हाल ही तक यह कैराना तहसील मे शामिल था। 2015 में ऊन का तहसील के रूप में गठन होने के बाद अब यह गाँव इस तहसील के अंतर्गत आता है।ऊन तहसील निर्माण के लिए हथछोया के प्रसिद्द समाजसेवी तेजपाल गुर्जर ने व्यापक आंदोलन किया जिसके फलस्वरूप अंततः 2015 में ऊन को प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार ने तहसील का दर्जा दे दिया।
गाँव का राजनीतिक इतिहास कुछ इस प्रकार है।
पंडित कालूराम शर्मा- ग्राम सदर (ब्रिटिश काल)
चौधरी सरधा राम: प्रधान
चौधरी अतर सिंह: प्रधान
चौधरी गेंदा सिंह: प्रधान
चौधरी आशाराम: प्रधान 1985-1990
चौधरी सतपाल सिंह प्रधान 1990-1995
चौ. सतबीर लम्बरदार प्रधान 1995-2000
चौधरी रणपाल सिंह प्रधान 2000-2005
श्रीमती राजेश तोमर प्रधान 2005-2010
श्री चमन सिंह बाल्मिकी प्रधान 2010-2015
श्रीमती राणो प्रधान
2015-
सोमवार, 22 जून 2015
तिज्जो, गुड्डे-गुड़िया का ब्याह और दोग्घड
तिज्जो, गुड्डे-गुड़िया का ब्याह और दोग्घड
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हरियाली तीज जिसे गंवई भाषा मे “तिज्जो” कहा जाता है, गाँव मे लड़कियों द्वारा बड़े जोश और उत्साह के साथ मनाई जाती थी। तिज्जो वाले दिन सुबह से ही लड़कियों के समूह नए-नए कपड़े पहनकर गाँव की गलियों मे इधर से उधर घूमते हुए दिखाई पड्ने लगते थे। शिवाले मे स्कूल मे सुबह से ही लड़कियां तिज्जो खेलने के लिए इकट्ठा होने लगती थी। उस समय गाँव का वातावरण भी बहुत शुद्ध था। गाँव की हर लड़की की सुरक्षा और सम्मान की गारंटी सुनिश्चित करना हर व्यक्ति की तयशुदा नैतिक जिम्मेदारी थी। शिवाले वाले प्राथमिक स्कूल मे इकट्ठा होकर लड़कियां दो गुटो मे बंटकर तिज्जो खेलती थी। लगभग 15-15 लड़कियों के गुट तिज्जो खेलते थे। आमने सामने एक निष्चित दूरी पर लड़कियां एक दूसरे के हाथ मे अपना हाथ फँसाकर एक सघन मानव श्रंखला बनाकर दोनों हाथों से हथेलियाँ बजाते हुए और तिज्जो के गीत गाते हुए एक दूसरे की और आती थी। बिलकुल सामने तक आने के बाद यह पूरी पंक्ति उल्टे पैरों से पीछे उसी स्थान तक जाती थी जहां से उन्होने चलना शुरू किया था। तेज आवाज मे लड़कियों के “तिज्जो-गान” से पूरा माहौल गुंजायमान रहता था, वातावरण मे गूँजते खुशियों के गीत मानो पूरे गाँव की प्रसन्नता का उदघोष करते थे। सावन महीना शुरू होते हुए गाँव मे खुशियों और उल्लास की डालियाँ लहराने लगती थी। हर आँगन, हर पेड़ और हर बरामदे, दहलीज मे झूले पड़ जाते थे। हर तरफ छोटे बच्चे और लड़कियां झूला झूलते हुए दिखाई पड़ती थी।दोपहर तक लड़कियां अपना घर का सारा काम-काज निपटा कर बारी-बारी से पूरे सावन अपनी सहेलियों के घर झूला झूलने जाती थी। पहले दिन यह तय हो जाता था कि कल अमुक सहेली के घर पर झूला झूलेंगे। लड़कियां झूले मे इस प्रकार बैठती थी कि एक के पैर दूसरी के झूले से सटे होते थे। अक्सर शरीर से मजबूत लड़कियां हम जैसे छोटे बच्चों को अपने पैरों से बने “दुसंग” पर बैठाकर अपने साथ झूला देती थी। हमे भी झूले का आनंद और बहनो का प्यार एक साथ मिल जाता था।दो लड़कियां आमने सामने की और से झूले को हिलाकर दूसरी और सहारा देती थी। अन्य लड़कियां झूले के चारों और घेरा बनाकर सावन के गीत गाती थी। “ हरियाला बनना झुक आया बाग मै जी, इंदर राजा झुक आए बाग मै जी” तिज्जो के मधुर गीत खुशियों की मिश्री कानों मे घोलते थे। आधा सावन बीतने पर तिज्जो का त्योंहार आता था। हम स्कूल की दीवारों पर बैठकर “तिज्जो-उत्सव” का आनंद लेते थे।
दोग्घड
सावन मे छोटे से लेकर बड़े तक सभी गाँव-वासी आसमान की और देखते रहते थे। कभी कभी “बार (शनिवार) की झड़ी लग जाती थी तो लगातार दसों दिन बारिश होती रहती थी लेकिन कभी लोग बारिश को तरस जाते थे। बारिश के लिए भगवान को खुश करने के लिए लोग तरह-तरह के जतन करते थे। पूरे गाँव मे जग (यज्ञ किया जाता था, लोगों को भोजन कराया जाता था।) दी जाती थी ताकि भगवान प्रसन्न होकर बारिश कर दे।कभी कभी जग के बाद बारिश हो जाती थी तो लोग मानते थे कि भगवान प्रसन्न हो गए है। बारिश न होने की स्थिति मे लोग गाँव मे घूमकर यह देखते थे कि किसी ने अपने घर की छत पर बिटौड़ा तो नहीं बना रखा है। गाँव मे आज भी छत पर बिटौड़ा रखने को गलत माना जाता है। यदि ऐसा पाया जाता था तो लोग छत पर बिटौड़ा रखने वाले परिवार को नसीहत करके बिटौड़ा उतरवा देते थे। गाँव की लड़कियां बारिश के लिए भगवान को प्रसन्न करने के लिए अनोखे उपाय करती थी। अक्सर गाँव मे लड़कियां कपड़े के गुड्डे-गुड़िया बनाकर खेलती थी। कोई लड़की गुड्डा बनती थी, तो कोई गुड़िया तो कोई दोनों। लड़कियां आपस मे गुड्डे-गुड़ियाँ की शादी भी करती थी। एक लड़की का गुड्डा तो दूसरी की गुड़िया आपस मे शादी करती थी। किसी एक लड़की को लड़के का वेश बनाकर दूल्हा बनाया जाता था, गुड्डे की बारात निकलती थी। बारात मे सारी लड़कियां जाती। बाकायदा, छोटी-छोटी कूल्हो मे दाल-चावल के रूप मे खाना पकाया जाता था। प्रसाद के रूप मे थोड़ा थोड़ा सबको मिलता था। अक्सर हमारे भी हाथ दो-चार चावल के दाने लग जाते थे। उसका स्वाद गज़ब होता था। इस पर भी बारिस न होती तो लड़कियां दो-चार दिन बाद गुड्डे-गुड़ियाँ को मरा हुआ मानकर, गाँव की "भेंटों" पर जाकर उनका अंतिम संस्कार करती, ज़ोर ज़ोर से दहाड़ मार-मार कर रोती। सुत्तक निकालने के लिए सारी लड़कियां मंदिर जाकर सिर धोती थी। शिवाले स्थित शिवलिंग को कुएं से पानी निकाल-निकाल कर चोटी तक डुबोती थी। इस काम मे उन्हे घंटों लग जाते थे, क्योंकि इसका नियम यह था का मंदिर के गर्भग्रह के जल निकास मार्ग को भी बंद नहीं करना होता था। मंदिर मे जल भरने के बाद का काम बड़ा ही रोचक होता था। इसके बाद लड़कियां एक हांडी मे कीचड़ भर लेती थी जिसे वह दोग्घड कहती थी। लड़कियां इस दोग्घड को किसी ऐसी महिला के घर मे दीवार से फेंक कर फोड़ती (तोड़ती) थी जो ऐसा होने के बाद खूब झगड़ा करती हो। हमारे पड़ोस मे खजानी नामक महिला अक्सर लड़कियों के लिए सटीक निशाना होती थी। दोग्घड फूटने के बाद खजानी सब लड़कियों को खूब कोसती थी, खूब झगड़ा करती थी। ऐसा करने से कभी कभी हफ्ते भर के अंदर बारिश हो जाती थी तो लड़कियां मान लेती थी कि उनकी मेहनत कामयाब हो गई है।
आज न लड़कियों मे तिज्जो के प्रति वह उत्साह है और न ही गाँव मे उस तरह का वातावरण। तिज्जो का रोमांच हमारे समय के साथ ही समाप्त हो गया लगता है।
मंगलवार, 16 जून 2015
बर्बादी के फूल-2
("हथछोया-कुछ इतिहास,कुछ बातें" के अंश)
विशाल डाब्बर पर शुरू से ही लोगों की गिद्द दृष्टि रही है। शोक-समंदर इस लालच की पूर्ति का एक बड़ा माध्यम बना। यह स्थिति सिर्फ हथछोया की नहीं है वरन ग्रामीण जीवन की एक कड़वी सच्चाई है। शोक समंदर एक जलीय कुकुरमुत्ता है जो दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ता है। यदि हम शोक-समंदर को "जलीय दानव" की संज्ञा दे तो बिलकुल भी गलत नहीं होगा। हथछोया मे इस जलीय दानव का सबसे पहले प्रवेश गुल्ही मे किसी शातिर "भू-भक्षक" ने कराया। देखते ही देखते इस दानव ने सम्पूर्ण गुल्ही का भक्षण कर लिया । इस की एक खास विशेषता यह है कि यह जल की समस्त ऑक्सिजन को ग्रस जाता है और जलीय जीवन का खात्मा कर देता है। इसका जो भी हिस्सा जल की एक विशेष मात्रा से ऊपर रह जाता है वह तेजी से सूख जाता है और तालाब के भराव का सबसे सुलभ और सस्ता साधन है। गुल्ही के बाद देववाला और विशाल डाब्बर इस "जलीय दानव" के शिकार बने। पशुओं के गोबर और घरेलू कूड़े के साथ मिलकर यह तालाबों के भराव के लिए बेहतरीन उपाय है। इसी विधि से गाँव के सभी तालाबों का शिकार किया गया।
गाँव की जैव-विविधता पर भी इस भू-भक्षण का विपरीत प्रभाव पड़ा। गाँव मे मुर्गाबी, बत्तख,नाकू आदि अनेक जलीय जीव बहुतायत मे पाये जाते थे जो अब सिर्फ चिड़िया घरों मे ही देखने को मिलते है। सिंघाड़े की खेती से भी गाँव के बहुत से कश्यप परिवार एक अच्छी ख़ासी धन राशि कमाते थे जो अब बिलकुल समाप्त हो गया। वर्षाकाल के बाद भभूल के फूल ( सफ़ेद रंग के कमल के समान फूल) गाँव की शोभा को चार चंद लगाया करते थे , जो अब देखने को नहीं मिलते है। हम लोग अक्सर "भभूल के फूल" से हार बनाकर पहना करते थे।कल जहां खुशियो और आबादी के भभूल खिला करते थे, आज वहाँ शोक-समंदर के "बर्बादी के फूल" गाँव के दुर्भाग्य पर अपनी कुटिल मुस्कान बिखेर रहे है।
गाँव के विशाल तालाब एक और जहां इसके भूमिगत जल के प्रमुख साधन थे, वहीं दूसरी और ये पशुपालन के भी बड़े प्रेरक कारक थे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार सदियों से पशुपालन रहा है। हरा चारा और प्रचुर जल पशुपालन के प्रमुख अवयव है। तालाबों के विनाश के कारण गाँव मे पशुपालन पर भी विपरीत असर पड़ा है। रोजाना शाम के समय तालाबों मे पशुओं के झुंडों का नहाना एक आम दृश्य हुआ करता था। लोग अपने पशुओं को पानी पिलाने और नहलाने के लिए इन तालाबों मे उतारा करते थे। लेकिन अब जब गाँव मे तालाब लगभग नष्ट हो गए है, पशुपालन के लिए जल उपलब्धता समाप्त प्राय हो गई है। लगभग 200 फीट ज़मीन का सीना चीरकर पशुओं के लिए जल व्यवस्था करना हर ग्रामीण के बस की बात नहीं है। अतः कल तक जो ग्रामीण 15-20 तक गाय-भैंस पालते थे वे आज 1-2 पशु रख पाने मे भी कठिनाई महसूस करते है। कुछ ने तो अपने "खूँटे" बिलकुल ही खाली कर दिये है। कल तक दूध बेचने का कारोबार करने वाले ग्रामीण आज खुद चाय बनाने के लिए किलो दो किलो दूध खरीदते है। बहुत से पशुविहीन ग्रामीण अपने लिए गाँव के किसानों के घर से लस्सी मांग कर ले जाते थे जो उनके भोजन का एक "स्नेहक" हुआ करता था। आज किसीके घर मे खुद के लिए भी यदि लस्सी उपलब्ध है तो वह भाग्यशाली है,आम ग्रामीण के लिए लस्सी की सहज उपल्ब्ध्ता के दिन अब लद गए है। विशाल तालाबों के नष्ट होने के बाद से ही मानसून की मजबूती का एक लोकल आधार भी नष्ट हो गया है जिससे वर्षा की मात्रा एवं अवधि भी पहले से काफी कम हो गई है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते है कि जंगल और तालाब स्थानीय रूप मानसून की मजबूती के गौण-सहायक कारक है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चहुं और से इन तालाबों के विनाश ने गहरे तक प्रभावित किया है। गाँव की कोई भी जाति या वर्ग इसेक कुप्रभाव से बच नहीं पाया है। गाँव मे धोबियों के कई परिवार है जो गाँव के संभ्रांत लोगों के कपड़े धोने के लिए खासकर विशाल डाब्बर के जल का उपयोग करते थे। लेकिन आज उनके लिए कपड़े धोने के लिए यह निशुल्क एवं प्रचुर जल सपने की बात मात्र है। जल की अनुपलब्धता का धोबियों के पैतृक व्यवसाय पर विपरीत एवं विनाशकारी प्रभाव पड़ा है।
इतिहास को निश्चित रूप से बदला नहीं जा सकता है लेकिन उससे सबक लेकर गलतियों को सुधारा जा सकता है। तालाबों की कीमत पर गाँव मे अनेक अधिवासों का निर्माण हो चुका है। मेरे विचार से तालाबों का पुनरप्राप्तिकरण अव्यवाहरिक ही नहीं वरन कठिन और त्रासदिकारक भी होगा। सबसे सहज, सरल और व्यवाहरिक समाधान यह होगा कि तालाब के अवशेषों का सरंक्षण किया जाए। लोग भावी पीढ़ी के विनाश पर अपने लालच की पूर्ति न करें। जितने तालाब शेष बचे है उन्हे समस्त ग्रामवासी मिलकर स्वच्छ बनाए और उसमे व्याप्त शोक-समंदर का समूल-विनाश करे। ग्रामवासी इस बात का संकल्प ले कि हम तलाबों के नाम पर आखिर कुछ तो अपनी भावी पीढ़ियों को सौंपेंगे। अवशेष तलाबों का न केवल सरंक्षण अनिवार्य है बल्कि इनको पक्का किया जाना भी जरूरी है। तालाबों का सौंदर्यीकरण करके हम भावी पीढ़ी को कम से कम रहने लायक गाँव तो दे ही सकते हैं.
बर्बादी के फूल-1
बर्बादी के फूल...!
("हथछोया-कुछ इतिहास,कुछ बातें" पुस्तक के अंश)
----------------@ सुनील सत्यम
बरसों बाद गाँव में प्राचीन डाब्बर (जोहड़) को देखा । उसमे शोक-समंदर का भरा-पूरा मातमी कुनबा गाँव के जल भंडार "जोहड़" की क्रमिक मौत पर इठला रहा था, साथ ही मैंने देखे गाँव के दुर्भाग्य का जश्न मानते हुए इसी शोक-समंदर पर खिले बैंगनी रंग के बर्बादी के फूल..!
हथछोया का नाम ही इसके विशाल जल भंडारों की वजह से पड़ा था। प्राचीन हथछोया में चार विशालकाय तालाब थे- डाब्बर,गुल्ही,देववाला और बराला. चारो तालाबों का सम्मिलित क्षेत्रफल लगभग 300 बीघे का था। इनमे सबसे विशाल डाब्बर नामक तालाब था जो लगभग 500 मीटर चौड़ाई और 1500 मीटर लम्बाई में फैला हुआ था। इन तालाबों की वजह से अक्सर चोमासे (वर्षाकाल) में गाँव के अधिकाँश रास्ते अवरुद्ध हो जाते थे। रास्ते कच्चे होने के कारण गाँव चोमासे में अक्सर दलदल में बदल जाया करता था। देववाला तालाब ग्राम देवता को समर्पित था। जो गाँव के पश्चिम भाग में था। गाँव की बढती आबादी के कारण जनसंख्या के दबाव ने तालाबों को डसना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने भूमि के अभाव में तो कुछ ने अपने आर्थिक-सामजिक प्रभाव से तालाबों की कीमत पर अपने अधिवासों का विस्तार करना शुरू कर दिया था, यह प्रक्रिया आज भी अनवरत जारी है। हालत यह है की गुल्ही का सम्पूर्ण अस्तित्व मिट चुका है। आज की पीढ़ी नहीं जानती है कि कभी गाँव में इस नाम का कोई तालाब था भी या नहीं। यदि कोई गुल्ही का नाम जानता भी है तो निश्चित रूप से वह यह तो बिलकुल नहीं जानता कि गुल्ही की गाँव में भौगोलिक अवस्थिति कहाँ थी। पुरानी मस्जिद से सटे हुए उत्तर की और जहाँ आज कामिल का घर है। इस मस्जिद के सामने से होकर गुजरने वाला रास्ता जो उत्तर में और फिर पूर्व की और मुड़कर भगतों वाली गली तक जाता है, अभागी गुल्ही की छाती को पाटकर ही बना है।
गुल्ही का लालच की मौत मरना, डाब्बर का मात्र एक छोटे गंदे नाले में बदल जाना,देववाले पर अतिक्रमण और उसका दफन हो जाना और बराले का लगातार भरते जाना ग्राम में जलाभाव और जल की घटिया होती गुणवत्ता तथा इसके कारण होने वाली बीमारियों का पैमाना है। मुझे याद है कि बचपन में मेरे घर के आहाते में मात्र 20 फुट की एक "नाल" से लगे नल का पानी बाल्टी में नहीं समाता था। उस समय तक मेरे घर के निकटतम स्थित जोहड़ की चोडाई लगभग 250 मीटर और लम्बाई लगभग 1300 मीटर थी। आज जब कि यह आकार मात्र एक गंदे नाले के रूप में है और शोक-समंदर से पटा हुआ अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है, मेरे उसी घर के आहाते में 230 फिट "नाल" पाताल का सीना चीरकर प्यास मिटाने की जद्दोजहद में जुटी है। यह एक सपाट गणना है। वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए तो इसी तुलना में बढ़ने वाली मृत्युकारक व्याधियों के भयावह आंकड़े भी सामने आ सकते है। वर्ष 2015 के अप्रेल माह में गाँव में अचानक 10-12 लोग आसमयिक मृत्यु के ग्रास बन गए। इसका एक संभावित कारण गाँव में जल-जहर हो सकता है। जहरीले जल के कारण उत्पन्न शारीरिक उपापचय में गड़बड़ी के कारण हृदयाघात और अन्य व्याधियां उत्पन्न होने के आसार बढ़ जाते है।
विशाल डाब्बर के विनष्ट होने का सबसे विनाशकारी प्रभाव हथछोया पर पड़ा। पहला प्रभाव प्राकृतिक संसाधन के रूप में पेयजल की उपलब्धता और गुणवत्ता पर पड़ा तो दूसरा विनाशकारी प्रभाव सीमांत कृषकों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा।
जोहड़ के पूर्वी किनारों पर मामचंद कश्यप सहित अन्य कई कश्यप परिवारों के पास जमीन के कुछ पट्टे थे जहाँ ये लोग सब्जी की खेती करके अच्छी खासी कमाई कर लेते थे। सब्जी की इन पट्टों पर की जाने वाली खेती को गाँव की भाषा में "प्लेज" कहते थे। प्लेज में टमाटर, लौकी,खीरा,ककड़ी,तुरई,प्याज आदि की फसल उगाई जाती थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि तिलका जुलाहे के घेर के सामने से होकर एक पतली सी मेढ़ से होकर जोहड़ को पार करके मामचंद कश्यप की प्लेज में पहुंचा जा सकता था। जब हम छोटे थे घर से गेंहू लेकर प्लेज में जाते थे और वहां से टमाटर,मिर्च आदि खरीद कर लाते थे। यह खरीद वस्तुतः वस्तु विनिमय पर आधारित होती थी। कश्यप परिवार जमीन के छोटे टुकड़ों पर एकदम सटे हुए तालाब से "ढेंकली" के द्वारा अपनी प्लेज की सिंचाई करते थे। जोहड़ उनके लिए सिंचाई हेतु भगवान् के वरदान से कम नहीं था। एकदम निशुल्क और बारहों महीने सिंचाई हेतु जल उपलब्धता ने इन कश्यप परिवारों की अर्थव्यवस्था को काफी मजबूत आधार प्रदान किया था।अक्सर सिंचाई के अभाव में सीमान्त किसान खेती नहीं कर पाते है और उनके जमीन के छोटे टुकडे पूरी तरह अनुत्पादक पड़े रहते है। हथछोया के कश्यप परिवारों को मैंने बचपन में फेरी लगाकर सब्जी बेचते हुए शायद ही कभी देखा हो ! प्लेज इनके लिए दो तरह से वरदान थी
1- निशुल्क सिंचाई जल के कारण सब्जी की उत्पादन लागत नगण्य थी (स्वयं की मजदूरी को छोड़कर)
2-लोग प्लेज में आकर स्वयं खरीदारी करते थे जिससे फेरी में लगने वाला उनका श्रम बच जाता था जिसे वे अधिक उत्पादन के लिए प्लेज में लगा देते थे।
जोहड़ का विनाश गाँव के कश्यप परिवारों के लिए भयंकर बर्बादी लाया।
प्लेज की संजीवनी के रूप में निशुल्क एवं सहज उपलब्ध सिंचाई हेतु जल संसाधन नष्ट हो जाने से प्लेज का नामो निशान मिट गया। छोटे जामिन के टुकड़ो पर ट्यूबवेल लगाना किसी भी प्रकार से अनार्थिक ही था। कश्यप परिवार प्लेज छोड़कर खेतिहर मजदूर बन गए और अपनी जमीन समीपस्थ किसानों को औने-पौने दामो पर बेचने के लिए मजबूर हो गए। आज ये कश्यप परिवार लगभग भूमिहीन हो चुके है। कुछ कश्यप कच्ची गढ़ी से सब्जी लाकर फेरी लगाकर बेचते है। फेरी से सब्जी की बिक्री से मुश्किल से परिवार का गुजारा होता है। इनके लिए पुराने दिनों का लौट आना सिर्फ "मुंगेरीलाल का एक हसीन सपना भर है।
विशाल डाब्बर पर शुरू से ही लोगों की गिद्द दृष्टि रही है। शोक-समंदर इस लालच की पूर्ति का एक बड़ा माध्यम बना। यह स्थिति सिर्फ हथछोया की नहीं है वरन ग्रामीण जीवन की एक कड़वी सच्चाई है। शोक समंदर एक जलीय कुकुरमुत्ता है जो दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ता है। यदि हम शोक-समंदर को "जलीय दानव" की संज्ञा दे तो बिलकुल भी गलत नहीं होगा। हथछोया मे इस जलीय दानव का सबसे पहले प्रवेश गुल्ही मे किसी शातिर "भू-भक्षक" ने कराया। देखते ही देखते इस दानव ने सम्पूर्ण गुल्ही का भक्षण कर लिया । इस की एक खास विशेषता यह है कि यह जल की समस्त ऑक्सिजन को ग्रस जाता है और जलीय जीवन का खात्मा कर देता है। इसका जो भी हिस्सा जल की एक विशेष मात्रा से ऊपर रह जाता है वह तेजी से सूख जाता है और तालाब के भराव का सबसे सुलभ और सस्ता साधन है। गुल्ही के बाद देववाला और विशाल डाब्बर इस "जलीय दानव" के शिकार बने। पशुओं के गोबर और घरेलू कूड़े के साथ मिलकर यह तालाबों के भराव के लिए बेहतरीन उपाय है। इसी विधि से गाँव के सभी तालाबों का शिकार किया गया।
गाँव की जैव-विविधता पर भी इस भू-भक्षण का विपरीत प्रभाव पड़ा। गाँव मे मुर्गाबी, बत्तख,नाकू आदि अनेक जलीय जीव बहुतायत मे पाये जाते थे जो अब सिर्फ चिड़िया घरों मे ही देखने को मिलते है। सिंघाड़े की खेती से भी गाँव के बहुत से कश्यप परिवार एक अच्छी ख़ासी धन राशि कमाते थे जो अब बिलकुल समाप्त हो गया। वर्षाकाल के बाद भभूल के फूल ( सफ़ेद रंग के कमल के समान फूल) गाँव की शोभा को चार चंद लगाया करते थे , जो अब देखने को नहीं मिलते है। हम लोग अक्सर "भभूल के फूल" से हार बनाकर पहना करते थे।कल जहां खुशियो और आबादी के भभूल खिला करते थे, आज वहाँ शोक-समंदर के "बर्बादी के फूल" गाँव के दुर्भाग्य पर अपनी कुटिल मुस्कान बिखेर रहे है।
सोमवार, 8 जून 2015
हथछोया एवं आंकड़े..
हथछोया जनपद शामली, उत्तर प्रदेश की जनसँख्या.....जनगणना-2011
हथछोया जनपद शामली, उत्तर प्रदेश की कैराना तहसील का एक ऐतिहासिक गाँव है जिसमे 2011 की जनगणना के अनुसार कुल 994 परिवार रहते. हथछोया ग्राम की कुल जनसँख्या (2011की जनगणना के अनुसार) 6240 है जिसमे 3331 पुरुष तथा 2909 महिलाएं हैं. इस ग्राम की कुल जनसँख्या का 14.78% , 0-6 वर्ष आयु के शिशु है अर्थात कुल 922 शिशु ।
हथछोया का कुल लिंगानुपात 873 है जो उत्तर प्रदेश के लिंगानुपात 912 से 35 कम है। इस एतिहासिक ग्राम का शिशु लिंगानुपात 913 है जो उत्तर प्रदेश के शिशु लिंगानुपात 902 से 11 अधिक है.
प्रदेश की कुल साक्षरता दर 67.68% है जबकि इस ग्राम की साक्षरता दर इसकी तुलना में काफी कम है जो कुल 63.76% है. ग्राम की पुरुष साक्षरता74.31% जबकि महिला साक्षरता कुल 51.60% है.
भारतीय संविधान एवं पंचायती राज अधिनियम के अंतर्गत हथछोया व्यस्क मताधिकार द्वारा चयनित ग्राम प्रधान द्वारा शासित है। वर्तमान में श्री चमन सिंह बाल्मिकी (2010-2015) हथछोया के चयनित ग्राम प्रधान है.
हथछोया से राज्य सिविल सेवा (पी.सी.एस.) में दो व्यक्तियों ने सफलता प्राप्त की है. श्री सतीश सिंघल एवं श्री सुनील सत्यम ग्राम से उत्तर प्रदेश पी.सी.एस. में चयनित दो PCS अधिकारी है.
डॉ.अमित तोमर इस गाँव के एक मात्र MBBS डिग्री धारक है।
श्री सुनील सत्यम इतिहास में UGC-NET एवं JRF एवं दिल्ली विश्वविद्यालय से अफ़्रीकी अध्ययन में एम्.फिल. है तथा डॉ सुशील उपाध्याय हिंदी में पी.एच.डी. एवं NET है। डॉ सुशील इस समय उत्तराखंड विश्वविद्यालय,हरिद्वार में हिंदी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर है, डॉ अजीत तोमर हिंदी एवं पत्रकारिता दो-दो विषयों में NET पास है.श्री अनिल खेवडिया शिक्षाशास्त्र में NET/JRF उत्तीर्ण है.
श्री सत्यम जी के बडे भाई श्री संजय सिंह तोमर गाँव से एक मात्र कानूनगो (राजस्व निरीक्षक) है। श्री जितेन्द्र तोमर बी.एस.एन.एल. में उच्च पद पर कार्यरत है.
डॉ महीपाल सिंह तोमर ,डी.ए.वी.डिग्री कालेज गुलावटी(बुलंदशहर) में प्रधानाचार्य है.श्री तोमर स्कॉटलैंड से समाजशास्त्र में पी.एच.डी. धारक है. डॉ जयमल सिंह तोमर गोचर महाविद्यालय, रामपुर मनिहारन (सहारनपुर) के पूर्व-प्रधानाचार्य है जिन्होंने अमेरिका से रसायनशास्त्र में पी.एच..डी.प्राप्त की है.
जातीय सरंचना:
ग्राम की कुल जनसँख्या का 14.39% अनुसूचित जाति है जो कुल 898 है जबकि इस ग्राम में अनुसूचित जनजाति निवास नहीं करती है.
Work Profile
In Hath Chhoya village out of total population, 2051 were engaged in work activities. 84.25 % of workers describe their work as Main Work (Employment or Earning more than 6 Months) while 15.75 % were involved in Marginal activity providing livelihood for less than 6 months. Of 2051 workers engaged in Main Work, 687 were cultivators (owner or co-owner) while 644 were Agricultural labourer.
कुल घर(परिवार) 994 -
जनसँख्या
कुल पुरुष महिला
6240 3,331 2,909
शिशु (0-6) 922 482 440
अनु.जाति 898 459 439
साक्षरता 63.76% 74.31%51.60 %
Total Workers 2,051 1,719 332
Main Worker 1,728 0 0
Marginal Worker 323 0 0U