बर्बादी के फूल - 2
("हथछोया-कुछ इतिहास,कुछ बातें" के अंश)
विशाल डाब्बर पर शुरू से ही लोगों की गिद्द दृष्टि रही है। शोक-समंदर इस लालच की पूर्ति का एक बड़ा माध्यम बना। यह स्थिति सिर्फ हथछोया की नहीं है वरन ग्रामीण जीवन की एक कड़वी सच्चाई है। शोक समंदर एक जलीय कुकुरमुत्ता है जो दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ता है। यदि हम शोक-समंदर को "जलीय दानव" की संज्ञा दे तो बिलकुल भी गलत नहीं होगा। हथछोया मे इस जलीय दानव का सबसे पहले प्रवेश गुल्ही मे किसी शातिर "भू-भक्षक" ने कराया। देखते ही देखते इस दानव ने सम्पूर्ण गुल्ही का भक्षण कर लिया । इस की एक खास विशेषता यह है कि यह जल की समस्त ऑक्सिजन को ग्रस जाता है और जलीय जीवन का खात्मा कर देता है। इसका जो भी हिस्सा जल की एक विशेष मात्रा से ऊपर रह जाता है वह तेजी से सूख जाता है और तालाब के भराव का सबसे सुलभ और सस्ता साधन है। गुल्ही के बाद देववाला और विशाल डाब्बर इस "जलीय दानव" के शिकार बने। पशुओं के गोबर और घरेलू कूड़े के साथ मिलकर यह तालाबों के भराव के लिए बेहतरीन उपाय है। इसी विधि से गाँव के सभी तालाबों का शिकार किया गया।
गाँव की जैव-विविधता पर भी इस भू-भक्षण का विपरीत प्रभाव पड़ा। गाँव मे मुर्गाबी, बत्तख,नाकू आदि अनेक जलीय जीव बहुतायत मे पाये जाते थे जो अब सिर्फ चिड़िया घरों मे ही देखने को मिलते है। सिंघाड़े की खेती से भी गाँव के बहुत से कश्यप परिवार एक अच्छी ख़ासी धन राशि कमाते थे जो अब बिलकुल समाप्त हो गया। वर्षाकाल के बाद भभूल के फूल ( सफ़ेद रंग के कमल के समान फूल) गाँव की शोभा को चार चंद लगाया करते थे , जो अब देखने को नहीं मिलते है। हम लोग अक्सर "भभूल के फूल" से हार बनाकर पहना करते थे।कल जहां खुशियो और आबादी के भभूल खिला करते थे, आज वहाँ शोक-समंदर के "बर्बादी के फूल" गाँव के दुर्भाग्य पर अपनी कुटिल मुस्कान बिखेर रहे है।
गाँव के विशाल तालाब एक और जहां इसके भूमिगत जल के प्रमुख साधन थे, वहीं दूसरी और ये पशुपालन के भी बड़े प्रेरक कारक थे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार सदियों से पशुपालन रहा है। हरा चारा और प्रचुर जल पशुपालन के प्रमुख अवयव है। तालाबों के विनाश के कारण गाँव मे पशुपालन पर भी विपरीत असर पड़ा है। रोजाना शाम के समय तालाबों मे पशुओं के झुंडों का नहाना एक आम दृश्य हुआ करता था। लोग अपने पशुओं को पानी पिलाने और नहलाने के लिए इन तालाबों मे उतारा करते थे। लेकिन अब जब गाँव मे तालाब लगभग नष्ट हो गए है, पशुपालन के लिए जल उपलब्धता समाप्त प्राय हो गई है। लगभग 200 फीट ज़मीन का सीना चीरकर पशुओं के लिए जल व्यवस्था करना हर ग्रामीण के बस की बात नहीं है। अतः कल तक जो ग्रामीण 15-20 तक गाय-भैंस पालते थे वे आज 1-2 पशु रख पाने मे भी कठिनाई महसूस करते है। कुछ ने तो अपने "खूँटे" बिलकुल ही खाली कर दिये है। कल तक दूध बेचने का कारोबार करने वाले ग्रामीण आज खुद चाय बनाने के लिए किलो दो किलो दूध खरीदते है। बहुत से पशुविहीन ग्रामीण अपने लिए गाँव के किसानों के घर से लस्सी मांग कर ले जाते थे जो उनके भोजन का एक "स्नेहक" हुआ करता था। आज किसीके घर मे खुद के लिए भी यदि लस्सी उपलब्ध है तो वह भाग्यशाली है,आम ग्रामीण के लिए लस्सी की सहज उपल्ब्ध्ता के दिन अब लद गए है। विशाल तालाबों के नष्ट होने के बाद से ही मानसून की मजबूती का एक लोकल आधार भी नष्ट हो गया है जिससे वर्षा की मात्रा एवं अवधि भी पहले से काफी कम हो गई है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते है कि जंगल और तालाब स्थानीय रूप मानसून की मजबूती के गौण-सहायक कारक है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चहुं और से इन तालाबों के विनाश ने गहरे तक प्रभावित किया है। गाँव की कोई भी जाति या वर्ग इसेक कुप्रभाव से बच नहीं पाया है। गाँव मे धोबियों के कई परिवार है जो गाँव के संभ्रांत लोगों के कपड़े धोने के लिए खासकर विशाल डाब्बर के जल का उपयोग करते थे। लेकिन आज उनके लिए कपड़े धोने के लिए यह निशुल्क एवं प्रचुर जल सपने की बात मात्र है। जल की अनुपलब्धता का धोबियों के पैतृक व्यवसाय पर विपरीत एवं विनाशकारी प्रभाव पड़ा है।
इतिहास को निश्चित रूप से बदला नहीं जा सकता है लेकिन उससे सबक लेकर गलतियों को सुधारा जा सकता है। तालाबों की कीमत पर गाँव मे अनेक अधिवासों का निर्माण हो चुका है। मेरे विचार से तालाबों का पुनरप्राप्तिकरण अव्यवाहरिक ही नहीं वरन कठिन और त्रासदिकारक भी होगा। सबसे सहज, सरल और व्यवाहरिक समाधान यह होगा कि तालाब के अवशेषों का सरंक्षण किया जाए। लोग भावी पीढ़ी के विनाश पर अपने लालच की पूर्ति न करें। जितने तालाब शेष बचे है उन्हे समस्त ग्रामवासी मिलकर स्वच्छ बनाए और उसमे व्याप्त शोक-समंदर का समूल-विनाश करे। ग्रामवासी इस बात का संकल्प ले कि हम तलाबों के नाम पर आखिर कुछ तो अपनी भावी पीढ़ियों को सौंपेंगे। अवशेष तलाबों का न केवल सरंक्षण अनिवार्य है बल्कि इनको पक्का किया जाना भी जरूरी है। तालाबों का सौंदर्यीकरण करके हम भावी पीढ़ी को कम से कम रहने लायक गाँव तो दे ही सकते हैं.
("हथछोया-कुछ इतिहास,कुछ बातें" के अंश)
विशाल डाब्बर पर शुरू से ही लोगों की गिद्द दृष्टि रही है। शोक-समंदर इस लालच की पूर्ति का एक बड़ा माध्यम बना। यह स्थिति सिर्फ हथछोया की नहीं है वरन ग्रामीण जीवन की एक कड़वी सच्चाई है। शोक समंदर एक जलीय कुकुरमुत्ता है जो दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ता है। यदि हम शोक-समंदर को "जलीय दानव" की संज्ञा दे तो बिलकुल भी गलत नहीं होगा। हथछोया मे इस जलीय दानव का सबसे पहले प्रवेश गुल्ही मे किसी शातिर "भू-भक्षक" ने कराया। देखते ही देखते इस दानव ने सम्पूर्ण गुल्ही का भक्षण कर लिया । इस की एक खास विशेषता यह है कि यह जल की समस्त ऑक्सिजन को ग्रस जाता है और जलीय जीवन का खात्मा कर देता है। इसका जो भी हिस्सा जल की एक विशेष मात्रा से ऊपर रह जाता है वह तेजी से सूख जाता है और तालाब के भराव का सबसे सुलभ और सस्ता साधन है। गुल्ही के बाद देववाला और विशाल डाब्बर इस "जलीय दानव" के शिकार बने। पशुओं के गोबर और घरेलू कूड़े के साथ मिलकर यह तालाबों के भराव के लिए बेहतरीन उपाय है। इसी विधि से गाँव के सभी तालाबों का शिकार किया गया।
गाँव की जैव-विविधता पर भी इस भू-भक्षण का विपरीत प्रभाव पड़ा। गाँव मे मुर्गाबी, बत्तख,नाकू आदि अनेक जलीय जीव बहुतायत मे पाये जाते थे जो अब सिर्फ चिड़िया घरों मे ही देखने को मिलते है। सिंघाड़े की खेती से भी गाँव के बहुत से कश्यप परिवार एक अच्छी ख़ासी धन राशि कमाते थे जो अब बिलकुल समाप्त हो गया। वर्षाकाल के बाद भभूल के फूल ( सफ़ेद रंग के कमल के समान फूल) गाँव की शोभा को चार चंद लगाया करते थे , जो अब देखने को नहीं मिलते है। हम लोग अक्सर "भभूल के फूल" से हार बनाकर पहना करते थे।कल जहां खुशियो और आबादी के भभूल खिला करते थे, आज वहाँ शोक-समंदर के "बर्बादी के फूल" गाँव के दुर्भाग्य पर अपनी कुटिल मुस्कान बिखेर रहे है।
गाँव के विशाल तालाब एक और जहां इसके भूमिगत जल के प्रमुख साधन थे, वहीं दूसरी और ये पशुपालन के भी बड़े प्रेरक कारक थे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार सदियों से पशुपालन रहा है। हरा चारा और प्रचुर जल पशुपालन के प्रमुख अवयव है। तालाबों के विनाश के कारण गाँव मे पशुपालन पर भी विपरीत असर पड़ा है। रोजाना शाम के समय तालाबों मे पशुओं के झुंडों का नहाना एक आम दृश्य हुआ करता था। लोग अपने पशुओं को पानी पिलाने और नहलाने के लिए इन तालाबों मे उतारा करते थे। लेकिन अब जब गाँव मे तालाब लगभग नष्ट हो गए है, पशुपालन के लिए जल उपलब्धता समाप्त प्राय हो गई है। लगभग 200 फीट ज़मीन का सीना चीरकर पशुओं के लिए जल व्यवस्था करना हर ग्रामीण के बस की बात नहीं है। अतः कल तक जो ग्रामीण 15-20 तक गाय-भैंस पालते थे वे आज 1-2 पशु रख पाने मे भी कठिनाई महसूस करते है। कुछ ने तो अपने "खूँटे" बिलकुल ही खाली कर दिये है। कल तक दूध बेचने का कारोबार करने वाले ग्रामीण आज खुद चाय बनाने के लिए किलो दो किलो दूध खरीदते है। बहुत से पशुविहीन ग्रामीण अपने लिए गाँव के किसानों के घर से लस्सी मांग कर ले जाते थे जो उनके भोजन का एक "स्नेहक" हुआ करता था। आज किसीके घर मे खुद के लिए भी यदि लस्सी उपलब्ध है तो वह भाग्यशाली है,आम ग्रामीण के लिए लस्सी की सहज उपल्ब्ध्ता के दिन अब लद गए है। विशाल तालाबों के नष्ट होने के बाद से ही मानसून की मजबूती का एक लोकल आधार भी नष्ट हो गया है जिससे वर्षा की मात्रा एवं अवधि भी पहले से काफी कम हो गई है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते है कि जंगल और तालाब स्थानीय रूप मानसून की मजबूती के गौण-सहायक कारक है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चहुं और से इन तालाबों के विनाश ने गहरे तक प्रभावित किया है। गाँव की कोई भी जाति या वर्ग इसेक कुप्रभाव से बच नहीं पाया है। गाँव मे धोबियों के कई परिवार है जो गाँव के संभ्रांत लोगों के कपड़े धोने के लिए खासकर विशाल डाब्बर के जल का उपयोग करते थे। लेकिन आज उनके लिए कपड़े धोने के लिए यह निशुल्क एवं प्रचुर जल सपने की बात मात्र है। जल की अनुपलब्धता का धोबियों के पैतृक व्यवसाय पर विपरीत एवं विनाशकारी प्रभाव पड़ा है।
इतिहास को निश्चित रूप से बदला नहीं जा सकता है लेकिन उससे सबक लेकर गलतियों को सुधारा जा सकता है। तालाबों की कीमत पर गाँव मे अनेक अधिवासों का निर्माण हो चुका है। मेरे विचार से तालाबों का पुनरप्राप्तिकरण अव्यवाहरिक ही नहीं वरन कठिन और त्रासदिकारक भी होगा। सबसे सहज, सरल और व्यवाहरिक समाधान यह होगा कि तालाब के अवशेषों का सरंक्षण किया जाए। लोग भावी पीढ़ी के विनाश पर अपने लालच की पूर्ति न करें। जितने तालाब शेष बचे है उन्हे समस्त ग्रामवासी मिलकर स्वच्छ बनाए और उसमे व्याप्त शोक-समंदर का समूल-विनाश करे। ग्रामवासी इस बात का संकल्प ले कि हम तलाबों के नाम पर आखिर कुछ तो अपनी भावी पीढ़ियों को सौंपेंगे। अवशेष तलाबों का न केवल सरंक्षण अनिवार्य है बल्कि इनको पक्का किया जाना भी जरूरी है। तालाबों का सौंदर्यीकरण करके हम भावी पीढ़ी को कम से कम रहने लायक गाँव तो दे ही सकते हैं.
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