बर्बादी के फूल...!
("हथछोया-कुछ इतिहास,कुछ बातें" पुस्तक के अंश)
----------------@ सुनील सत्यम
बरसों बाद गाँव में प्राचीन डाब्बर (जोहड़) को देखा । उसमे शोक-समंदर का भरा-पूरा मातमी कुनबा गाँव के जल भंडार "जोहड़" की क्रमिक मौत पर इठला रहा था, साथ ही मैंने देखे गाँव के दुर्भाग्य का जश्न मानते हुए इसी शोक-समंदर पर खिले बैंगनी रंग के बर्बादी के फूल..!
हथछोया का नाम ही इसके विशाल जल भंडारों की वजह से पड़ा था। प्राचीन हथछोया में चार विशालकाय तालाब थे- डाब्बर,गुल्ही,देववाला और बराला. चारो तालाबों का सम्मिलित क्षेत्रफल लगभग 300 बीघे का था। इनमे सबसे विशाल डाब्बर नामक तालाब था जो लगभग 500 मीटर चौड़ाई और 1500 मीटर लम्बाई में फैला हुआ था। इन तालाबों की वजह से अक्सर चोमासे (वर्षाकाल) में गाँव के अधिकाँश रास्ते अवरुद्ध हो जाते थे। रास्ते कच्चे होने के कारण गाँव चोमासे में अक्सर दलदल में बदल जाया करता था। देववाला तालाब ग्राम देवता को समर्पित था। जो गाँव के पश्चिम भाग में था। गाँव की बढती आबादी के कारण जनसंख्या के दबाव ने तालाबों को डसना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने भूमि के अभाव में तो कुछ ने अपने आर्थिक-सामजिक प्रभाव से तालाबों की कीमत पर अपने अधिवासों का विस्तार करना शुरू कर दिया था, यह प्रक्रिया आज भी अनवरत जारी है। हालत यह है की गुल्ही का सम्पूर्ण अस्तित्व मिट चुका है। आज की पीढ़ी नहीं जानती है कि कभी गाँव में इस नाम का कोई तालाब था भी या नहीं। यदि कोई गुल्ही का नाम जानता भी है तो निश्चित रूप से वह यह तो बिलकुल नहीं जानता कि गुल्ही की गाँव में भौगोलिक अवस्थिति कहाँ थी। पुरानी मस्जिद से सटे हुए उत्तर की और जहाँ आज कामिल का घर है। इस मस्जिद के सामने से होकर गुजरने वाला रास्ता जो उत्तर में और फिर पूर्व की और मुड़कर भगतों वाली गली तक जाता है, अभागी गुल्ही की छाती को पाटकर ही बना है।
गुल्ही का लालच की मौत मरना, डाब्बर का मात्र एक छोटे गंदे नाले में बदल जाना,देववाले पर अतिक्रमण और उसका दफन हो जाना और बराले का लगातार भरते जाना ग्राम में जलाभाव और जल की घटिया होती गुणवत्ता तथा इसके कारण होने वाली बीमारियों का पैमाना है। मुझे याद है कि बचपन में मेरे घर के आहाते में मात्र 20 फुट की एक "नाल" से लगे नल का पानी बाल्टी में नहीं समाता था। उस समय तक मेरे घर के निकटतम स्थित जोहड़ की चोडाई लगभग 250 मीटर और लम्बाई लगभग 1300 मीटर थी। आज जब कि यह आकार मात्र एक गंदे नाले के रूप में है और शोक-समंदर से पटा हुआ अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है, मेरे उसी घर के आहाते में 230 फिट "नाल" पाताल का सीना चीरकर प्यास मिटाने की जद्दोजहद में जुटी है। यह एक सपाट गणना है। वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए तो इसी तुलना में बढ़ने वाली मृत्युकारक व्याधियों के भयावह आंकड़े भी सामने आ सकते है। वर्ष 2015 के अप्रेल माह में गाँव में अचानक 10-12 लोग आसमयिक मृत्यु के ग्रास बन गए। इसका एक संभावित कारण गाँव में जल-जहर हो सकता है। जहरीले जल के कारण उत्पन्न शारीरिक उपापचय में गड़बड़ी के कारण हृदयाघात और अन्य व्याधियां उत्पन्न होने के आसार बढ़ जाते है।
विशाल डाब्बर के विनष्ट होने का सबसे विनाशकारी प्रभाव हथछोया पर पड़ा। पहला प्रभाव प्राकृतिक संसाधन के रूप में पेयजल की उपलब्धता और गुणवत्ता पर पड़ा तो दूसरा विनाशकारी प्रभाव सीमांत कृषकों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा।
जोहड़ के पूर्वी किनारों पर मामचंद कश्यप सहित अन्य कई कश्यप परिवारों के पास जमीन के कुछ पट्टे थे जहाँ ये लोग सब्जी की खेती करके अच्छी खासी कमाई कर लेते थे। सब्जी की इन पट्टों पर की जाने वाली खेती को गाँव की भाषा में "प्लेज" कहते थे। प्लेज में टमाटर, लौकी,खीरा,ककड़ी,तुरई,प्याज आदि की फसल उगाई जाती थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि तिलका जुलाहे के घेर के सामने से होकर एक पतली सी मेढ़ से होकर जोहड़ को पार करके मामचंद कश्यप की प्लेज में पहुंचा जा सकता था। जब हम छोटे थे घर से गेंहू लेकर प्लेज में जाते थे और वहां से टमाटर,मिर्च आदि खरीद कर लाते थे। यह खरीद वस्तुतः वस्तु विनिमय पर आधारित होती थी। कश्यप परिवार जमीन के छोटे टुकड़ों पर एकदम सटे हुए तालाब से "ढेंकली" के द्वारा अपनी प्लेज की सिंचाई करते थे। जोहड़ उनके लिए सिंचाई हेतु भगवान् के वरदान से कम नहीं था। एकदम निशुल्क और बारहों महीने सिंचाई हेतु जल उपलब्धता ने इन कश्यप परिवारों की अर्थव्यवस्था को काफी मजबूत आधार प्रदान किया था।अक्सर सिंचाई के अभाव में सीमान्त किसान खेती नहीं कर पाते है और उनके जमीन के छोटे टुकडे पूरी तरह अनुत्पादक पड़े रहते है। हथछोया के कश्यप परिवारों को मैंने बचपन में फेरी लगाकर सब्जी बेचते हुए शायद ही कभी देखा हो ! प्लेज इनके लिए दो तरह से वरदान थी
1- निशुल्क सिंचाई जल के कारण सब्जी की उत्पादन लागत नगण्य थी (स्वयं की मजदूरी को छोड़कर)
2-लोग प्लेज में आकर स्वयं खरीदारी करते थे जिससे फेरी में लगने वाला उनका श्रम बच जाता था जिसे वे अधिक उत्पादन के लिए प्लेज में लगा देते थे।
जोहड़ का विनाश गाँव के कश्यप परिवारों के लिए भयंकर बर्बादी लाया।
प्लेज की संजीवनी के रूप में निशुल्क एवं सहज उपलब्ध सिंचाई हेतु जल संसाधन नष्ट हो जाने से प्लेज का नामो निशान मिट गया। छोटे जामिन के टुकड़ो पर ट्यूबवेल लगाना किसी भी प्रकार से अनार्थिक ही था। कश्यप परिवार प्लेज छोड़कर खेतिहर मजदूर बन गए और अपनी जमीन समीपस्थ किसानों को औने-पौने दामो पर बेचने के लिए मजबूर हो गए। आज ये कश्यप परिवार लगभग भूमिहीन हो चुके है। कुछ कश्यप कच्ची गढ़ी से सब्जी लाकर फेरी लगाकर बेचते है। फेरी से सब्जी की बिक्री से मुश्किल से परिवार का गुजारा होता है। इनके लिए पुराने दिनों का लौट आना सिर्फ "मुंगेरीलाल का एक हसीन सपना भर है।
विशाल डाब्बर पर शुरू से ही लोगों की गिद्द दृष्टि रही है। शोक-समंदर इस लालच की पूर्ति का एक बड़ा माध्यम बना। यह स्थिति सिर्फ हथछोया की नहीं है वरन ग्रामीण जीवन की एक कड़वी सच्चाई है। शोक समंदर एक जलीय कुकुरमुत्ता है जो दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ता है। यदि हम शोक-समंदर को "जलीय दानव" की संज्ञा दे तो बिलकुल भी गलत नहीं होगा। हथछोया मे इस जलीय दानव का सबसे पहले प्रवेश गुल्ही मे किसी शातिर "भू-भक्षक" ने कराया। देखते ही देखते इस दानव ने सम्पूर्ण गुल्ही का भक्षण कर लिया । इस की एक खास विशेषता यह है कि यह जल की समस्त ऑक्सिजन को ग्रस जाता है और जलीय जीवन का खात्मा कर देता है। इसका जो भी हिस्सा जल की एक विशेष मात्रा से ऊपर रह जाता है वह तेजी से सूख जाता है और तालाब के भराव का सबसे सुलभ और सस्ता साधन है। गुल्ही के बाद देववाला और विशाल डाब्बर इस "जलीय दानव" के शिकार बने। पशुओं के गोबर और घरेलू कूड़े के साथ मिलकर यह तालाबों के भराव के लिए बेहतरीन उपाय है। इसी विधि से गाँव के सभी तालाबों का शिकार किया गया।
गाँव की जैव-विविधता पर भी इस भू-भक्षण का विपरीत प्रभाव पड़ा। गाँव मे मुर्गाबी, बत्तख,नाकू आदि अनेक जलीय जीव बहुतायत मे पाये जाते थे जो अब सिर्फ चिड़िया घरों मे ही देखने को मिलते है। सिंघाड़े की खेती से भी गाँव के बहुत से कश्यप परिवार एक अच्छी ख़ासी धन राशि कमाते थे जो अब बिलकुल समाप्त हो गया। वर्षाकाल के बाद भभूल के फूल ( सफ़ेद रंग के कमल के समान फूल) गाँव की शोभा को चार चंद लगाया करते थे , जो अब देखने को नहीं मिलते है। हम लोग अक्सर "भभूल के फूल" से हार बनाकर पहना करते थे।कल जहां खुशियो और आबादी के भभूल खिला करते थे, आज वहाँ शोक-समंदर के "बर्बादी के फूल" गाँव के दुर्भाग्य पर अपनी कुटिल मुस्कान बिखेर रहे है।
सुजानखेड़ी..में बगिया
मंगलवार, 16 जून 2015
बर्बादी के फूल-1
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