कक्षा 6 गाँव के जूनियर हाई स्कूल से पास करने के बाद सन् 1987 में मैंने डीएवी इंटर कालेज ऊन में प्रवेश ले लिया था। दो वर्ष पहले ही मैं बड़ी शल्यक्रिया से गुजरा था। ऊन जाने के लिए साधन बहुत सीमित थे। उन दिनों कैराना-गंगोह बस सेवा हथछोया से होकर गुजरती थी।यद्यपि आज भी यह सेवा जारी है लेकिन इसकी समयबद्धता न तो उस समय ही निश्चित थी और न ही आज। यदा कदा कोई बस यदि समय से आ जाती थी तो गाँव से डीएवी ऊन जाने वाले छात्र उस बस की निशुल्क सेवा का लाभ उठा लेते थे। एकाध बस जब कभी आती थी तो उसमे पैर रखने तक की जगह नहीं होती थी सीट मिलना तो दूर ।
स्कूल जाने के लिए अक्सर हमे पैदल मार्च ही करना पडता था। घर से डीएवी स्कूल की दूरी एक और से लगभग 9 किलोमीटर पड़ती थी।यानि अध्ययन करने के लिए हमें प्रतिदिन 18 किलोमीटर पैदल चलकर जाना होता था। बरसात क दिनों में बहुत ज्यादा समस्या का सामना करना पडता था। ऊन में घुसते ही एक तरफ जोहड़ में जबरदस्त पानी चढ़ता था तो दूसरी और एल लगभग 30 फुट गहरी झिलनुमा खाई थी । यहाँ 4-4 फुट पानी सड़क के ऊपर चढ़ाना एक सामान्य सी बात थी। यह दरिया भी हमें पैदल चलकर ही पार करना पड़ता था। सारे कपडे भीग जाया करते थे।कई बार पैर फिसल जान पर गिर जाते थे तो सारी किताबे भी पानी में भीग जाती थी। कभी कभी भाग्यवश किसी ट्रेक्टर ट्रॉली में लिफ्ट मिल जाती थी तो लगता था कि जैसे कोई उड़न खटोला मिल गया हो।
सुजानखेड़ी..में बगिया
शुक्रवार, 10 जुलाई 2015
पढाई नहीं चढ़ाई
बुधवार, 8 जुलाई 2015
लाल सिंह परिवार
चौधरी लाल सिंह के 6 पुत्र व् एक पुत्री थे। चौधरी करता राम,चौ. सरधा राम, चौ. अतर सिंह, चौ. नेमचंद, चौ. आशाराम एवं चौ. बलवंत सिंह । चौधरी अतर सिंह, के प्रयासों से गाँव में कुछ विकास कार्य हुए। उनके प्रयासों से ही गाँव को ऊन के विद्युत उपकेन्द्र से जोड़ा गया था बाद में तेजपाल गुर्जर के द्वारा गाँव का सम्पूर्ण विद्युतीकरण तब हुआ जब उन्होंने अपनी निजी भूमि पर गाँव के विद्युत उपकेन्द्र का निर्माण करवाया। गाँव में पक्की सड़कों का निर्माण एवं रुहाड़ा (नाला) खुदाई में चौ. अतर सिंह का बहुमूल्य योगदान रहा है। वह एक दूरदर्शी राजनेता के समस्त गुण रखते थे। ब्लॉक प्रमुख,सरपंच,प्रधान सभी पद उनके रहते किसी अन्य गाँव में नहीं गए। पूर्व राज्यपाल वीरेंद्र वर्मा से उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा। चौ. अतर सिंह की मृत्यु के बाद चौ. आशाराम ग्राम प्रधान तथा मनोनीत जिला पंचायत सदस्य रहे। 1995 में पंचायत राज अधिनियम 1993 के बाद हुए जिला पंचायत के प्रथम चुनाव में वह भारी मतों से विजयी होकर सदस्य चुने गए। चौ. आशाराम जेल विजिटर के पद पर भी मनोनीत हुए। उनके बाद चौ. अतर सिंह के पुत्र सत्यपाल सिंह ग्राम प्रधान चुने गए। वह जिला सहकारी बैंक के डायरेक्टर पद पर भी विराजमान रहे।
लाला गीताराम
लाला गीताराम "रईस" हथछोया की एक महान शख्शियत थे। उनका जन्म सन् 1903 में स्वर्गीय लाला कन्हैयालाल के घर हुआ था। वह एक शिक्षित एवं दूरदर्शी व्यक्ति थे। पंच फैसलों के लिए लाला गीताराम की ख्याति दूर दूर तक थी। गाँव में कोई भी सरकारी व्यक्ति आता था तो उसका ठहराव लाला जी के पास ही होता था। वह ग्राम की ब्रिटिश न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ थे। सन् 1938 से 1940 तक वह अंग्रेज कलेक्टर (जज) की मुख्य कार्यसमिति में असेसर मनोनीत रहे। जिले की मुख्य कार्यसमिति में कुल 5 असेसर होते थे , जो न्याय-निर्णय के समय जज के साथ बैठते थे तथा जिनका कार्य किसी केस में अपना निर्णय सुनाने से पहले विदेशी (अंग्रेज) जज को स्थानीय रीति रिवाजो,परम्पराओं एवं स्थानीय विधि के बारे में अवगत करना होता था ताकि जज तदनुकूल अपना निर्णय सुना सके। यद्यपि असेसर की राय मानना जज के लिए बाध्यकारी नही होता था । लाला गीताराम एक कुशल आयुर्वेद चिकित्सक भी थे। वह क्षेत्र के लोगों को निशुल्क अपनी चिकित्सा सेवाएं देते थे।
यदि उनको अपने समय का हथछोया का दानवीर कर्ण कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने गाँव को बड़े पैमाने पर भूदान दिया। गाँव के प्रसिद्द शिवाले (शिव मंदिर) का निर्माण लाला गीताराम द्वारा दान की गई भूमि पर ही हुआ है।इसके अतिरिक्त उन्होंने शिवाले को प्रचुर मात्रा में धन भी दान में दिया। गाँव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र एवं केंद्रीय चौपाल को भी उन्होंने भूमिदान की थी।
निर्धनों की सेवा एवं निर्धन कन्याओं की शादी से उन्हें विशेष सुकून मिलता था। वह अहिंसा के पुजारी एवं गौ-सेवक तथा रक्षक थे। चौधरी कमालुद्दीन के साथ मिलकर उन्होंने गाँव में गौ हत्या एवं पशु कटान पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगवाया जिसके प्रति आज भी हथछोया के हिन्दू-मुस्लिम पूर्णतः कटिबद्ध हैं।
सन् 1980 में लाला गीताराम अपनी यादें एवं सिद्धांत धरोहर के रूप में छोड़कर अपना शरीर पूर्ण कर प्रभु चरणों में चले गए ।
मंगलवार, 7 जुलाई 2015
चौधरी कमालुद्दीन
चौधरी कमालुदीन "लम्बरदार"
------------@ सरवेज चौधरी
"जब जब हथछोया का ग्राम इतिहास पढ़ा जायेगा, चौधरी कमालुदीन का नाम जरूर जरूर लिया जायेगा"
कल्लु वंश मे जन्मे कमालुदीन बेहद दयालु स्वाभाव के व्यक्ति थे| इनके पिता का नाम ज़नाब साबर चौधरी एवं माता का नाम मोहतरमा सरिया था । इनके पिता ज़नाब साबर चौधरी एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते थे । चौ.कमालुदीन ने अपने पिता से ईमानदारी और अनुशाशन का गुण विरासत में प्राप्त किया था तो अपनी माता से ईश्वर में आस्था तथा करुणा का उपहार |
इनकी शादी बचपन में ही कर दी गयी थी । चौ. कमालुदीन में गज़ब की नेतृत्व क्षमता थी ।अपनी नेतृत्व क्षमता के चलते ही उन्हें ग्राम समाज में दी जाने वाली "लंबरदार"जैसी उपाधि से नवाज़ा गया| ग्राम में कोई भी पंचायत हो या सभा, उनकी अध्यक्षता में ही होती थी |
चौधरी कमालुदीन की ईमानदारी के किस्से आज भी हथछोया एवं आस-पास के गाँवो में मशहूर है। बताया जाता है की एक बार कच्ची गढ़ी के लाला महावीर के लड़के की शादी के समय, बारात में जाते वक़्त "बरी का सामान" जिसमे सोने की मोहरे एवं अन्य कीमती समान था, रास्ते में कहीं गिर गया । चौधरी कामालुद्दीन पीछे से अपनी घोड़ी पर सवार होकर विवाह में शामिल होने जा रहे थे । उनकी नज़र रास्ते में पड़े "बरी" के समान पर पड़ी । उन्होंने घोड़ी से उतरकर वह सामन उठाया और अपनी घोड़ी के ऊपर रखकर विवाह स्थल की तरफ चलपड़े । उधर जब बरी की रश्म निभाने की तैयारी हुई तो बरी का समान न देखकर वर पक्ष व्याकुल हो उठा । लाला महावीर ने कमालुदीन से सोने की मोहरे और बरी के लिए जरुरी अन्य समान का प्रबन्ध करने का अनुरोध किया|तब कमालुदीन ने अपनी घोड़ी से उतारकर वह कीमती समान उसके सही मालिक लाला महावीर को सौप दिया । उसी दिन से उनकी ईमान्दारी की चर्चा पूरे क्षेत्र में फ़ैल गई और लोग उनकी ईमानदारी के कायल हो गए ।उसके बाद पूरे कल्लू वंश में बरी प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया, जिसे आज भी पूरा कल्लुवंश निभा रहा है।
वह हिन्दू-मुस्लिम एकता के दूत थे। उन्होंने हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि गाँव के हिन्दू भाइयों की धार्मिक भावनाएं किसी भी कीमत पर आहत न होने पाये। इसी बात को ध्यान में रखकर उन्होंने ग्राम में पशु कटान पर प्रतिबन्ध लगाया था जिस परम्परा को आज भी पूरा गाँव निभा रहा है।
ग्राम का भूमि कर (मालगुजारी)भी चौधरी कामालुद्दीन के पास इकट्ठा होता था जो तहसील में उनके द्वारा ही जमा किया जाता था।
एक बार गाँव के कुछ लोगों ने चौधरी कमालुदीन की लोकप्रियता से डर कर उनकी हत्या का षडयंत्र रचा। वर्तमान में जहाँ हाज़ी अशरफ अली का खेत है वहां उस समय नागर बनिये की आम की बगीची थी । उस बगीची में षडयंत्रकारी चौ.कमालुदीन की हत्या के इरादे से घात लगाये बैठे थे । चौधरी फूल सिंह दिलावरे, जो उनके करीबी मित्र थे, को इस षडयंत्र की भनक लग गई । उन्होंने अपनी जान पर खेलकर उस षडयंत्र की सूचना चौधरी कमालुदीन को दी और उनकी जान बचाई। चौधरी फूल सिंह दिलावरे से उनके पारिवारिक सम्बंध थे और वो उनके घनिष्टम मित्रो में से एक थे । इस घटना के बाद उनके समबन्ध और भी अधिक मजबूत हो गए। आज भी दोनों परिवारों के घनिष्ट समबन्ध किसी भी प्रकार से कमजोर नहीं हुए है। चौधरी कुंदन सिंह और "रईस" लाल गीता राम, जो उस समय तहसील में मुख़्य न्याय अधिकारियो में से एक थे ,भी उनके घनिष्टम मित्रो में से एक थे । उस समय ग्राम हथछोया की न्यायिक प्रक्रिया इन तीनो के ऊपर ही निर्भर थी। वीरेंद्र वर्मा जो शामली से सांसद और पंजाब के पूर्व राज्यपाल भी रहे, के साथ भी उनके अच्छे सम्बन्ध थे । उनके ग्राम के हर वर्ग के साथ अच्छे सम्बन्ध थे ।ऊंच-नीच, जातिपक्ष कोई बेदभाव उनके मन में नही रहता था । कट्टरता के वह धुर विरोधी थे।
जब पहली बार चौधरी चरण सिंह ग्राम हथछोया में आये तो उस समय ग्राम की बागडोर चौधरी कमालुद्दीन के हाथो में थी। चौधरी चरण सिंह उस समय अपनी राजनितिक पारी की शुरुवात ही कर रहे थे । उन्होंने ग्राम के प्राइमरी स्कूल (शिवाला) में आयोजित कार्क्रम में चौधरी कामालुद्दीन से चुनाव में सहयोग की अपील की थी। चौधरी कमालुदीन बहुत परिश्रमी थे। वह अपने खेतो में भी बहुत मेहनत किया करते थे।कुछ समय पश्चात बीमारी के चलते इनकी मौत हो गयी।अपने पीछे ये पांच पुत्र छोड़ गए|
1-मरहूम दिन्ना चौधरी
2- हाजी नूरा चौधरी
3-मरहूम हाजी फिमु चौधरी
4-मरहूम हाजी असगर चौधरी
5-चौधरी हाजी अनवर अली
(इस लेख के तथ्य स्वर्गीय फूल सिंह दिलावरे और रोशनलाल हरिजन तथा चौधरी कामालुद्दीन के सबसे छोटे पुत्र हाजी अनवर अली एव हाजी नूरा से की गई वार्ता पर आधारित हैं)
शुक्रवार, 26 जून 2015
मेरे ग्राम देवता..
मेरे ग्राम देवता
(हथछोया; कुछ इतिहास, कुछ यादे- के अंश)
@ सुनील सत्यम
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संघ से संपर्क के बाद मेरे बालमन से ऊंच-नीच का भाव बिलकुल ही नष्ट हो गया था। कक्षा 4 तक गाँव के हर वर्ग के लड़के मेरे अच्छे दोस्त बन गए थे। धर्मेंद्र सिंह (यशपाल सिंह)महीपाल सिंह, रणपाल सिंह, जगवीर सिंह, नेत्रपाल सिंह, कुलवीर सिंह, धर्मेन्द्र सिंह (अजमेर सिंह), कंवरपाल कश्यप (मामचंद), बिजेन्द्र बाल्मीकी( अतर सिंह), सुभाष कश्यप, योगेन्द्र कश्यप, तेजपाल सैनी (तेज्जु), सौराज सिंह (इंदराज खेवड़िया), जगपाल गड़रिया (कल्लण), राजवीर सिंह गड़रिया, फरीद अहमद, शकील (छोटा, पुत्र ताऊ फिमू), फुरकान (मंजूर अहमद), आदि से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। साथ खेलना-कूदना, खाना-पीना होता था। जाति भाव ने कभी कोई असर इसकाल के बाद नहीं दिखाया। संघ के कार्यक्रमों मे सहभोज मुझे सबसे प्रिय था। हम गाँव मे अक्सर सहभोज का आयोजन करते थे। सभी के घर से भोजन बनकर आता था, जिसे एक जगह मिलाकर पंगत लगाकर सभी को परोसा जाता था। भोजनमंत्र के बाद सभी एक साथ भोजन करते थे। यह वैसे तो एक छोटा कार्यक्रम होता था। लेकिन दिलों-दिमाग पर से इसका प्रभाव आज तक नहीं गया। समरसता और समानता का जो भाव सहभोज के समय मन मे उत्पन्न होता था,वह आज तक यथावत है। बड़ी कक्षाओं मे जाने के बाद गाँव मे मेरे मित्रों की सूची और भी ज्यादा लंबी हो गई थी। अब इस सूची मे अनिल खेवड़िया, नरेश खेवड़िया, मुनेश खेवड़िया जैसे अजीज मित्र भी जुड़ गए थे, इन सभी के साथ एक साथ खाना पीना मेरे लिए आम बात थी। कुछ लोग इस बारे मे दबे कानो बात भी करते थे। कुछ ने तो बाकायदा मुझे इसके लिए मना भी किया था जिनके नाम यहाँ उल्लेख करना ठीक नहीं होगा।अनिल खेवड़िया तो थानाभावन मे कुछ दिन मेरे साथ रूम पार्टनर भी रहे।
यहाँ बचपन की दो रोचक रोचक बातें उल्लखित करना चाहूँगा जो आज भी मेरे जेहन मे हैं। कंटू चूहड़ा (बाल्मीकी) हमारा पारिवारिक सफ़ाई कर्मचारी था। कंटू मुझसे बेहद प्यार करता था। एक बार उसने किसी फेरि वाले से बुरादा बर्फ खाने के लिए खरीदा।मै पास मे ही खड़ा था। कंटू बर्फ खाने ही वाला था कि उसकी मुझ पर निगाह पड़ी। उसने मुझसे पूछा “ बर्फ खाओगे, लंबरदार ?” मैंने हाँ कहने मे तनिक भी देर नहीं की। मेरे हाँ कहते ही कंटू ने बर्फ मेरे हाथ मे थमा दिया और मै बड़े मजे से बर्फ खाने लगा। जब थोड़ा सा बर्फ बचा तो कंटू ने देखा कि मै तो सारा ही बर्फ खा जाऊंगा। उसने याचनात्म्क लहजे मे कहा “ थोड़ा सा बर्फ मेरे लिए भी छोड़ दियो लंबरदार !” मैंने बचा हुआ बर्फ कंटू के हाथ मे दे दिया । कंटू ने वह बचा हुआ बर्फ खाया और मुझे आशीर्वाद देकर चला गया। उस समय मेरी उम्र लगभग 8-10 वर्ष रही होगी।
कंटू की लड़की बती जो मुझसे उम्र मे लगभग 10-12 वर्ष बड़ी रही होगी, भी मुझसे बहुत लगाव रखती थी। वह अपने परिवार के लिए गाँव से रोटियाँ मांग कर लाती थी। उन दिनों गाँव मे कोई भी बाल्मीकी परिवार अपने घर पर खाना नहीं बनाता था। अपने यजमानों के घर से मांग कर ही वे अपने दोनों वक्त के भोजन का प्रबंध करते थे। बती अपने भोजन संग्रह के क्रम मे जब भी हमारे घर आती थी, मुझसे जरूर पूछती थी कि “ खाना खाओगे ?” जब भी उसके पास कोई अच्छी चीज होती तो मै कभी मना नहीं करता था। शादी विवाह के समय वह किसी के घर से रसगुल्ले आदि मिठाई लेकर आती, तो मुझसे जरूर पूछती। मै बड़े चाव से खाता था, बती मुझे कुछ भी खिलाने के बाद बड़ा अच्छा महसूस करती थी। मेरे घर वालों ने मुझे कभी यह नहीं सिखाया कि बती से लेकर खाना नहीं खाना है। बचपन के संस्कार आज और भी ज्यादा सुदृढ़ हो चुके है। जातीय भाव मुझे गौरवान्वित नहीं करता है, मेरा गाँव, मेरा सर्वसमाज मुझे सबसे प्यारा है। हर ग्रामवासी मेरा “ देवता” है और गाँव का हर घर “मेरा मंदिर” ।
बुधवार, 24 जून 2015
हथछोया-राजनीती
हथछोया वर्तमान शामली जनपद की ऊन तहसील का गाँव है,हाल ही तक यह कैराना तहसील मे शामिल था। 2015 में ऊन का तहसील के रूप में गठन होने के बाद अब यह गाँव इस तहसील के अंतर्गत आता है।ऊन तहसील निर्माण के लिए हथछोया के प्रसिद्द समाजसेवी तेजपाल गुर्जर ने व्यापक आंदोलन किया जिसके फलस्वरूप अंततः 2015 में ऊन को प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार ने तहसील का दर्जा दे दिया।
गाँव का राजनीतिक इतिहास कुछ इस प्रकार है।
पंडित कालूराम शर्मा- ग्राम सदर (ब्रिटिश काल)
चौधरी सरधा राम: प्रधान
चौधरी अतर सिंह: प्रधान
चौधरी गेंदा सिंह: प्रधान
चौधरी आशाराम: प्रधान 1985-1990
चौधरी सतपाल सिंह प्रधान 1990-1995
चौ. सतबीर लम्बरदार प्रधान 1995-2000
चौधरी रणपाल सिंह प्रधान 2000-2005
श्रीमती राजेश तोमर प्रधान 2005-2010
श्री चमन सिंह बाल्मिकी प्रधान 2010-2015
श्रीमती राणो प्रधान
2015-
सोमवार, 22 जून 2015
तिज्जो, गुड्डे-गुड़िया का ब्याह और दोग्घड
तिज्जो, गुड्डे-गुड़िया का ब्याह और दोग्घड
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हरियाली तीज जिसे गंवई भाषा मे “तिज्जो” कहा जाता है, गाँव मे लड़कियों द्वारा बड़े जोश और उत्साह के साथ मनाई जाती थी। तिज्जो वाले दिन सुबह से ही लड़कियों के समूह नए-नए कपड़े पहनकर गाँव की गलियों मे इधर से उधर घूमते हुए दिखाई पड्ने लगते थे। शिवाले मे स्कूल मे सुबह से ही लड़कियां तिज्जो खेलने के लिए इकट्ठा होने लगती थी। उस समय गाँव का वातावरण भी बहुत शुद्ध था। गाँव की हर लड़की की सुरक्षा और सम्मान की गारंटी सुनिश्चित करना हर व्यक्ति की तयशुदा नैतिक जिम्मेदारी थी। शिवाले वाले प्राथमिक स्कूल मे इकट्ठा होकर लड़कियां दो गुटो मे बंटकर तिज्जो खेलती थी। लगभग 15-15 लड़कियों के गुट तिज्जो खेलते थे। आमने सामने एक निष्चित दूरी पर लड़कियां एक दूसरे के हाथ मे अपना हाथ फँसाकर एक सघन मानव श्रंखला बनाकर दोनों हाथों से हथेलियाँ बजाते हुए और तिज्जो के गीत गाते हुए एक दूसरे की और आती थी। बिलकुल सामने तक आने के बाद यह पूरी पंक्ति उल्टे पैरों से पीछे उसी स्थान तक जाती थी जहां से उन्होने चलना शुरू किया था। तेज आवाज मे लड़कियों के “तिज्जो-गान” से पूरा माहौल गुंजायमान रहता था, वातावरण मे गूँजते खुशियों के गीत मानो पूरे गाँव की प्रसन्नता का उदघोष करते थे। सावन महीना शुरू होते हुए गाँव मे खुशियों और उल्लास की डालियाँ लहराने लगती थी। हर आँगन, हर पेड़ और हर बरामदे, दहलीज मे झूले पड़ जाते थे। हर तरफ छोटे बच्चे और लड़कियां झूला झूलते हुए दिखाई पड़ती थी।दोपहर तक लड़कियां अपना घर का सारा काम-काज निपटा कर बारी-बारी से पूरे सावन अपनी सहेलियों के घर झूला झूलने जाती थी। पहले दिन यह तय हो जाता था कि कल अमुक सहेली के घर पर झूला झूलेंगे। लड़कियां झूले मे इस प्रकार बैठती थी कि एक के पैर दूसरी के झूले से सटे होते थे। अक्सर शरीर से मजबूत लड़कियां हम जैसे छोटे बच्चों को अपने पैरों से बने “दुसंग” पर बैठाकर अपने साथ झूला देती थी। हमे भी झूले का आनंद और बहनो का प्यार एक साथ मिल जाता था।दो लड़कियां आमने सामने की और से झूले को हिलाकर दूसरी और सहारा देती थी। अन्य लड़कियां झूले के चारों और घेरा बनाकर सावन के गीत गाती थी। “ हरियाला बनना झुक आया बाग मै जी, इंदर राजा झुक आए बाग मै जी” तिज्जो के मधुर गीत खुशियों की मिश्री कानों मे घोलते थे। आधा सावन बीतने पर तिज्जो का त्योंहार आता था। हम स्कूल की दीवारों पर बैठकर “तिज्जो-उत्सव” का आनंद लेते थे।
दोग्घड
सावन मे छोटे से लेकर बड़े तक सभी गाँव-वासी आसमान की और देखते रहते थे। कभी कभी “बार (शनिवार) की झड़ी लग जाती थी तो लगातार दसों दिन बारिश होती रहती थी लेकिन कभी लोग बारिश को तरस जाते थे। बारिश के लिए भगवान को खुश करने के लिए लोग तरह-तरह के जतन करते थे। पूरे गाँव मे जग (यज्ञ किया जाता था, लोगों को भोजन कराया जाता था।) दी जाती थी ताकि भगवान प्रसन्न होकर बारिश कर दे।कभी कभी जग के बाद बारिश हो जाती थी तो लोग मानते थे कि भगवान प्रसन्न हो गए है। बारिश न होने की स्थिति मे लोग गाँव मे घूमकर यह देखते थे कि किसी ने अपने घर की छत पर बिटौड़ा तो नहीं बना रखा है। गाँव मे आज भी छत पर बिटौड़ा रखने को गलत माना जाता है। यदि ऐसा पाया जाता था तो लोग छत पर बिटौड़ा रखने वाले परिवार को नसीहत करके बिटौड़ा उतरवा देते थे। गाँव की लड़कियां बारिश के लिए भगवान को प्रसन्न करने के लिए अनोखे उपाय करती थी। अक्सर गाँव मे लड़कियां कपड़े के गुड्डे-गुड़िया बनाकर खेलती थी। कोई लड़की गुड्डा बनती थी, तो कोई गुड़िया तो कोई दोनों। लड़कियां आपस मे गुड्डे-गुड़ियाँ की शादी भी करती थी। एक लड़की का गुड्डा तो दूसरी की गुड़िया आपस मे शादी करती थी। किसी एक लड़की को लड़के का वेश बनाकर दूल्हा बनाया जाता था, गुड्डे की बारात निकलती थी। बारात मे सारी लड़कियां जाती। बाकायदा, छोटी-छोटी कूल्हो मे दाल-चावल के रूप मे खाना पकाया जाता था। प्रसाद के रूप मे थोड़ा थोड़ा सबको मिलता था। अक्सर हमारे भी हाथ दो-चार चावल के दाने लग जाते थे। उसका स्वाद गज़ब होता था। इस पर भी बारिस न होती तो लड़कियां दो-चार दिन बाद गुड्डे-गुड़ियाँ को मरा हुआ मानकर, गाँव की "भेंटों" पर जाकर उनका अंतिम संस्कार करती, ज़ोर ज़ोर से दहाड़ मार-मार कर रोती। सुत्तक निकालने के लिए सारी लड़कियां मंदिर जाकर सिर धोती थी। शिवाले स्थित शिवलिंग को कुएं से पानी निकाल-निकाल कर चोटी तक डुबोती थी। इस काम मे उन्हे घंटों लग जाते थे, क्योंकि इसका नियम यह था का मंदिर के गर्भग्रह के जल निकास मार्ग को भी बंद नहीं करना होता था। मंदिर मे जल भरने के बाद का काम बड़ा ही रोचक होता था। इसके बाद लड़कियां एक हांडी मे कीचड़ भर लेती थी जिसे वह दोग्घड कहती थी। लड़कियां इस दोग्घड को किसी ऐसी महिला के घर मे दीवार से फेंक कर फोड़ती (तोड़ती) थी जो ऐसा होने के बाद खूब झगड़ा करती हो। हमारे पड़ोस मे खजानी नामक महिला अक्सर लड़कियों के लिए सटीक निशाना होती थी। दोग्घड फूटने के बाद खजानी सब लड़कियों को खूब कोसती थी, खूब झगड़ा करती थी। ऐसा करने से कभी कभी हफ्ते भर के अंदर बारिश हो जाती थी तो लड़कियां मान लेती थी कि उनकी मेहनत कामयाब हो गई है।
आज न लड़कियों मे तिज्जो के प्रति वह उत्साह है और न ही गाँव मे उस तरह का वातावरण। तिज्जो का रोमांच हमारे समय के साथ ही समाप्त हो गया लगता है।
मंगलवार, 16 जून 2015
बर्बादी के फूल-2
("हथछोया-कुछ इतिहास,कुछ बातें" के अंश)
विशाल डाब्बर पर शुरू से ही लोगों की गिद्द दृष्टि रही है। शोक-समंदर इस लालच की पूर्ति का एक बड़ा माध्यम बना। यह स्थिति सिर्फ हथछोया की नहीं है वरन ग्रामीण जीवन की एक कड़वी सच्चाई है। शोक समंदर एक जलीय कुकुरमुत्ता है जो दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ता है। यदि हम शोक-समंदर को "जलीय दानव" की संज्ञा दे तो बिलकुल भी गलत नहीं होगा। हथछोया मे इस जलीय दानव का सबसे पहले प्रवेश गुल्ही मे किसी शातिर "भू-भक्षक" ने कराया। देखते ही देखते इस दानव ने सम्पूर्ण गुल्ही का भक्षण कर लिया । इस की एक खास विशेषता यह है कि यह जल की समस्त ऑक्सिजन को ग्रस जाता है और जलीय जीवन का खात्मा कर देता है। इसका जो भी हिस्सा जल की एक विशेष मात्रा से ऊपर रह जाता है वह तेजी से सूख जाता है और तालाब के भराव का सबसे सुलभ और सस्ता साधन है। गुल्ही के बाद देववाला और विशाल डाब्बर इस "जलीय दानव" के शिकार बने। पशुओं के गोबर और घरेलू कूड़े के साथ मिलकर यह तालाबों के भराव के लिए बेहतरीन उपाय है। इसी विधि से गाँव के सभी तालाबों का शिकार किया गया।
गाँव की जैव-विविधता पर भी इस भू-भक्षण का विपरीत प्रभाव पड़ा। गाँव मे मुर्गाबी, बत्तख,नाकू आदि अनेक जलीय जीव बहुतायत मे पाये जाते थे जो अब सिर्फ चिड़िया घरों मे ही देखने को मिलते है। सिंघाड़े की खेती से भी गाँव के बहुत से कश्यप परिवार एक अच्छी ख़ासी धन राशि कमाते थे जो अब बिलकुल समाप्त हो गया। वर्षाकाल के बाद भभूल के फूल ( सफ़ेद रंग के कमल के समान फूल) गाँव की शोभा को चार चंद लगाया करते थे , जो अब देखने को नहीं मिलते है। हम लोग अक्सर "भभूल के फूल" से हार बनाकर पहना करते थे।कल जहां खुशियो और आबादी के भभूल खिला करते थे, आज वहाँ शोक-समंदर के "बर्बादी के फूल" गाँव के दुर्भाग्य पर अपनी कुटिल मुस्कान बिखेर रहे है।
गाँव के विशाल तालाब एक और जहां इसके भूमिगत जल के प्रमुख साधन थे, वहीं दूसरी और ये पशुपालन के भी बड़े प्रेरक कारक थे। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार सदियों से पशुपालन रहा है। हरा चारा और प्रचुर जल पशुपालन के प्रमुख अवयव है। तालाबों के विनाश के कारण गाँव मे पशुपालन पर भी विपरीत असर पड़ा है। रोजाना शाम के समय तालाबों मे पशुओं के झुंडों का नहाना एक आम दृश्य हुआ करता था। लोग अपने पशुओं को पानी पिलाने और नहलाने के लिए इन तालाबों मे उतारा करते थे। लेकिन अब जब गाँव मे तालाब लगभग नष्ट हो गए है, पशुपालन के लिए जल उपलब्धता समाप्त प्राय हो गई है। लगभग 200 फीट ज़मीन का सीना चीरकर पशुओं के लिए जल व्यवस्था करना हर ग्रामीण के बस की बात नहीं है। अतः कल तक जो ग्रामीण 15-20 तक गाय-भैंस पालते थे वे आज 1-2 पशु रख पाने मे भी कठिनाई महसूस करते है। कुछ ने तो अपने "खूँटे" बिलकुल ही खाली कर दिये है। कल तक दूध बेचने का कारोबार करने वाले ग्रामीण आज खुद चाय बनाने के लिए किलो दो किलो दूध खरीदते है। बहुत से पशुविहीन ग्रामीण अपने लिए गाँव के किसानों के घर से लस्सी मांग कर ले जाते थे जो उनके भोजन का एक "स्नेहक" हुआ करता था। आज किसीके घर मे खुद के लिए भी यदि लस्सी उपलब्ध है तो वह भाग्यशाली है,आम ग्रामीण के लिए लस्सी की सहज उपल्ब्ध्ता के दिन अब लद गए है। विशाल तालाबों के नष्ट होने के बाद से ही मानसून की मजबूती का एक लोकल आधार भी नष्ट हो गया है जिससे वर्षा की मात्रा एवं अवधि भी पहले से काफी कम हो गई है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते है कि जंगल और तालाब स्थानीय रूप मानसून की मजबूती के गौण-सहायक कारक है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चहुं और से इन तालाबों के विनाश ने गहरे तक प्रभावित किया है। गाँव की कोई भी जाति या वर्ग इसेक कुप्रभाव से बच नहीं पाया है। गाँव मे धोबियों के कई परिवार है जो गाँव के संभ्रांत लोगों के कपड़े धोने के लिए खासकर विशाल डाब्बर के जल का उपयोग करते थे। लेकिन आज उनके लिए कपड़े धोने के लिए यह निशुल्क एवं प्रचुर जल सपने की बात मात्र है। जल की अनुपलब्धता का धोबियों के पैतृक व्यवसाय पर विपरीत एवं विनाशकारी प्रभाव पड़ा है।
इतिहास को निश्चित रूप से बदला नहीं जा सकता है लेकिन उससे सबक लेकर गलतियों को सुधारा जा सकता है। तालाबों की कीमत पर गाँव मे अनेक अधिवासों का निर्माण हो चुका है। मेरे विचार से तालाबों का पुनरप्राप्तिकरण अव्यवाहरिक ही नहीं वरन कठिन और त्रासदिकारक भी होगा। सबसे सहज, सरल और व्यवाहरिक समाधान यह होगा कि तालाब के अवशेषों का सरंक्षण किया जाए। लोग भावी पीढ़ी के विनाश पर अपने लालच की पूर्ति न करें। जितने तालाब शेष बचे है उन्हे समस्त ग्रामवासी मिलकर स्वच्छ बनाए और उसमे व्याप्त शोक-समंदर का समूल-विनाश करे। ग्रामवासी इस बात का संकल्प ले कि हम तलाबों के नाम पर आखिर कुछ तो अपनी भावी पीढ़ियों को सौंपेंगे। अवशेष तलाबों का न केवल सरंक्षण अनिवार्य है बल्कि इनको पक्का किया जाना भी जरूरी है। तालाबों का सौंदर्यीकरण करके हम भावी पीढ़ी को कम से कम रहने लायक गाँव तो दे ही सकते हैं.
बर्बादी के फूल-1
बर्बादी के फूल...!
("हथछोया-कुछ इतिहास,कुछ बातें" पुस्तक के अंश)
----------------@ सुनील सत्यम
बरसों बाद गाँव में प्राचीन डाब्बर (जोहड़) को देखा । उसमे शोक-समंदर का भरा-पूरा मातमी कुनबा गाँव के जल भंडार "जोहड़" की क्रमिक मौत पर इठला रहा था, साथ ही मैंने देखे गाँव के दुर्भाग्य का जश्न मानते हुए इसी शोक-समंदर पर खिले बैंगनी रंग के बर्बादी के फूल..!
हथछोया का नाम ही इसके विशाल जल भंडारों की वजह से पड़ा था। प्राचीन हथछोया में चार विशालकाय तालाब थे- डाब्बर,गुल्ही,देववाला और बराला. चारो तालाबों का सम्मिलित क्षेत्रफल लगभग 300 बीघे का था। इनमे सबसे विशाल डाब्बर नामक तालाब था जो लगभग 500 मीटर चौड़ाई और 1500 मीटर लम्बाई में फैला हुआ था। इन तालाबों की वजह से अक्सर चोमासे (वर्षाकाल) में गाँव के अधिकाँश रास्ते अवरुद्ध हो जाते थे। रास्ते कच्चे होने के कारण गाँव चोमासे में अक्सर दलदल में बदल जाया करता था। देववाला तालाब ग्राम देवता को समर्पित था। जो गाँव के पश्चिम भाग में था। गाँव की बढती आबादी के कारण जनसंख्या के दबाव ने तालाबों को डसना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने भूमि के अभाव में तो कुछ ने अपने आर्थिक-सामजिक प्रभाव से तालाबों की कीमत पर अपने अधिवासों का विस्तार करना शुरू कर दिया था, यह प्रक्रिया आज भी अनवरत जारी है। हालत यह है की गुल्ही का सम्पूर्ण अस्तित्व मिट चुका है। आज की पीढ़ी नहीं जानती है कि कभी गाँव में इस नाम का कोई तालाब था भी या नहीं। यदि कोई गुल्ही का नाम जानता भी है तो निश्चित रूप से वह यह तो बिलकुल नहीं जानता कि गुल्ही की गाँव में भौगोलिक अवस्थिति कहाँ थी। पुरानी मस्जिद से सटे हुए उत्तर की और जहाँ आज कामिल का घर है। इस मस्जिद के सामने से होकर गुजरने वाला रास्ता जो उत्तर में और फिर पूर्व की और मुड़कर भगतों वाली गली तक जाता है, अभागी गुल्ही की छाती को पाटकर ही बना है।
गुल्ही का लालच की मौत मरना, डाब्बर का मात्र एक छोटे गंदे नाले में बदल जाना,देववाले पर अतिक्रमण और उसका दफन हो जाना और बराले का लगातार भरते जाना ग्राम में जलाभाव और जल की घटिया होती गुणवत्ता तथा इसके कारण होने वाली बीमारियों का पैमाना है। मुझे याद है कि बचपन में मेरे घर के आहाते में मात्र 20 फुट की एक "नाल" से लगे नल का पानी बाल्टी में नहीं समाता था। उस समय तक मेरे घर के निकटतम स्थित जोहड़ की चोडाई लगभग 250 मीटर और लम्बाई लगभग 1300 मीटर थी। आज जब कि यह आकार मात्र एक गंदे नाले के रूप में है और शोक-समंदर से पटा हुआ अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है, मेरे उसी घर के आहाते में 230 फिट "नाल" पाताल का सीना चीरकर प्यास मिटाने की जद्दोजहद में जुटी है। यह एक सपाट गणना है। वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए तो इसी तुलना में बढ़ने वाली मृत्युकारक व्याधियों के भयावह आंकड़े भी सामने आ सकते है। वर्ष 2015 के अप्रेल माह में गाँव में अचानक 10-12 लोग आसमयिक मृत्यु के ग्रास बन गए। इसका एक संभावित कारण गाँव में जल-जहर हो सकता है। जहरीले जल के कारण उत्पन्न शारीरिक उपापचय में गड़बड़ी के कारण हृदयाघात और अन्य व्याधियां उत्पन्न होने के आसार बढ़ जाते है।
विशाल डाब्बर के विनष्ट होने का सबसे विनाशकारी प्रभाव हथछोया पर पड़ा। पहला प्रभाव प्राकृतिक संसाधन के रूप में पेयजल की उपलब्धता और गुणवत्ता पर पड़ा तो दूसरा विनाशकारी प्रभाव सीमांत कृषकों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा।
जोहड़ के पूर्वी किनारों पर मामचंद कश्यप सहित अन्य कई कश्यप परिवारों के पास जमीन के कुछ पट्टे थे जहाँ ये लोग सब्जी की खेती करके अच्छी खासी कमाई कर लेते थे। सब्जी की इन पट्टों पर की जाने वाली खेती को गाँव की भाषा में "प्लेज" कहते थे। प्लेज में टमाटर, लौकी,खीरा,ककड़ी,तुरई,प्याज आदि की फसल उगाई जाती थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि तिलका जुलाहे के घेर के सामने से होकर एक पतली सी मेढ़ से होकर जोहड़ को पार करके मामचंद कश्यप की प्लेज में पहुंचा जा सकता था। जब हम छोटे थे घर से गेंहू लेकर प्लेज में जाते थे और वहां से टमाटर,मिर्च आदि खरीद कर लाते थे। यह खरीद वस्तुतः वस्तु विनिमय पर आधारित होती थी। कश्यप परिवार जमीन के छोटे टुकड़ों पर एकदम सटे हुए तालाब से "ढेंकली" के द्वारा अपनी प्लेज की सिंचाई करते थे। जोहड़ उनके लिए सिंचाई हेतु भगवान् के वरदान से कम नहीं था। एकदम निशुल्क और बारहों महीने सिंचाई हेतु जल उपलब्धता ने इन कश्यप परिवारों की अर्थव्यवस्था को काफी मजबूत आधार प्रदान किया था।अक्सर सिंचाई के अभाव में सीमान्त किसान खेती नहीं कर पाते है और उनके जमीन के छोटे टुकडे पूरी तरह अनुत्पादक पड़े रहते है। हथछोया के कश्यप परिवारों को मैंने बचपन में फेरी लगाकर सब्जी बेचते हुए शायद ही कभी देखा हो ! प्लेज इनके लिए दो तरह से वरदान थी
1- निशुल्क सिंचाई जल के कारण सब्जी की उत्पादन लागत नगण्य थी (स्वयं की मजदूरी को छोड़कर)
2-लोग प्लेज में आकर स्वयं खरीदारी करते थे जिससे फेरी में लगने वाला उनका श्रम बच जाता था जिसे वे अधिक उत्पादन के लिए प्लेज में लगा देते थे।
जोहड़ का विनाश गाँव के कश्यप परिवारों के लिए भयंकर बर्बादी लाया।
प्लेज की संजीवनी के रूप में निशुल्क एवं सहज उपलब्ध सिंचाई हेतु जल संसाधन नष्ट हो जाने से प्लेज का नामो निशान मिट गया। छोटे जामिन के टुकड़ो पर ट्यूबवेल लगाना किसी भी प्रकार से अनार्थिक ही था। कश्यप परिवार प्लेज छोड़कर खेतिहर मजदूर बन गए और अपनी जमीन समीपस्थ किसानों को औने-पौने दामो पर बेचने के लिए मजबूर हो गए। आज ये कश्यप परिवार लगभग भूमिहीन हो चुके है। कुछ कश्यप कच्ची गढ़ी से सब्जी लाकर फेरी लगाकर बेचते है। फेरी से सब्जी की बिक्री से मुश्किल से परिवार का गुजारा होता है। इनके लिए पुराने दिनों का लौट आना सिर्फ "मुंगेरीलाल का एक हसीन सपना भर है।
विशाल डाब्बर पर शुरू से ही लोगों की गिद्द दृष्टि रही है। शोक-समंदर इस लालच की पूर्ति का एक बड़ा माध्यम बना। यह स्थिति सिर्फ हथछोया की नहीं है वरन ग्रामीण जीवन की एक कड़वी सच्चाई है। शोक समंदर एक जलीय कुकुरमुत्ता है जो दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ता है। यदि हम शोक-समंदर को "जलीय दानव" की संज्ञा दे तो बिलकुल भी गलत नहीं होगा। हथछोया मे इस जलीय दानव का सबसे पहले प्रवेश गुल्ही मे किसी शातिर "भू-भक्षक" ने कराया। देखते ही देखते इस दानव ने सम्पूर्ण गुल्ही का भक्षण कर लिया । इस की एक खास विशेषता यह है कि यह जल की समस्त ऑक्सिजन को ग्रस जाता है और जलीय जीवन का खात्मा कर देता है। इसका जो भी हिस्सा जल की एक विशेष मात्रा से ऊपर रह जाता है वह तेजी से सूख जाता है और तालाब के भराव का सबसे सुलभ और सस्ता साधन है। गुल्ही के बाद देववाला और विशाल डाब्बर इस "जलीय दानव" के शिकार बने। पशुओं के गोबर और घरेलू कूड़े के साथ मिलकर यह तालाबों के भराव के लिए बेहतरीन उपाय है। इसी विधि से गाँव के सभी तालाबों का शिकार किया गया।
गाँव की जैव-विविधता पर भी इस भू-भक्षण का विपरीत प्रभाव पड़ा। गाँव मे मुर्गाबी, बत्तख,नाकू आदि अनेक जलीय जीव बहुतायत मे पाये जाते थे जो अब सिर्फ चिड़िया घरों मे ही देखने को मिलते है। सिंघाड़े की खेती से भी गाँव के बहुत से कश्यप परिवार एक अच्छी ख़ासी धन राशि कमाते थे जो अब बिलकुल समाप्त हो गया। वर्षाकाल के बाद भभूल के फूल ( सफ़ेद रंग के कमल के समान फूल) गाँव की शोभा को चार चंद लगाया करते थे , जो अब देखने को नहीं मिलते है। हम लोग अक्सर "भभूल के फूल" से हार बनाकर पहना करते थे।कल जहां खुशियो और आबादी के भभूल खिला करते थे, आज वहाँ शोक-समंदर के "बर्बादी के फूल" गाँव के दुर्भाग्य पर अपनी कुटिल मुस्कान बिखेर रहे है।